पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/४८७

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४६४ घट्नलाभापा-बगला साहित्य 'पयार' का नहीं दी धृा नाम रखा गया है।। ओलन्दाज, दिनेमार यादि चैटेगिकोंसे नित्य व्यवहार्य पचारमे यमगे जिस प्रकार १४ अक्षर रहते हैं, पहले इस शिमी किसी मदने भी बदलाम स्थान पाया है। प्रकार कोई छानवीन न थी, माताको ही ओर विशेप वत्तमान युगमें अगरेजी महीने के नाम और Paradle लक्ष्य रहता था। उसी प्रकार पूर्व-प्रचलित पयारमें कोई March, Raily, Rahng, Monument, Tort, Stconer, Engine, Poilcr. Vat, Talth, Gate, Share, सुश्शुलला नहीं है । नाचाडी मी पहले धृावी तरह गाया Lock.gate आदि शब्द तथा विचारालयको अनेक संडा जाता था। क्सिी पिसीके मतसे लाचाडी 'लहरी' शब्द का अपभ्रंश है। ऐमा मालम होता है, कि रटत 'नृत्य सी बदलामे प्रचलित है । Tiherinometcr. Stethoscope परी' वा 'नृनालि' प्राकृत अपन्न शसे 'णञ्चरो' तथा वहीं Testtubc आदि वैमानिक, पाबंदिर मीर रासाय- निक शन्दोंने इसी प्रकार व गलामे स्थान पाया है। पीछे वङ्गालामें 'नाचाडो' हुआ है । गायक नाच नाच पर गरेजी अमल में इस प्राार सैक्डों अगरेजी शब्द जो सब पद गाते थे, वही पीछे नाचाडो नामसे प्रसिद्ध बङ्गलामें घुस गये हे त्या आज भी घुम रहे है। मंग- हुआ। रेजी अमलम किग प्रकार बदलाभापान परिपुष्ट और ___ वर्तमान लिपदीक म्यानमें ही पहले लाबाडीका । । वर्तमान आकार धारण किया, उसका विस्तृत विवरण प्रचलन था। लाचाडो 'दीर्वछन्द' या अन्य किमी। 'बङ्गटामाहित्य' शब्दमें लिया गया है। नागिणीके नामानुसार मी देखा जाता है। यद्गला साहित्य-अति प्राचीन कालसे ले कर आज तक सच पूछा जाय, तो छन्दकी कोई प्रणाली नहीं देग्बी लाभापामेजो जो ग्रन्य अयवा भाग निदर्शन जाती. डाक और खनाके वचन छन्दोवन्ध थे या नही यह पाये जाते है, वे ही बंगला साहित्य कहलाते हैं। विचारनेका विषय है। रमाई पण्डितके शून्यपुराण बोर हम लोग बंगला साहित्य प्राचीन तथा आधु- माणिकचांदके गाना अक्षर यनि वा मिलका बैना नियम निक, इन दोनोंमे प्रधानतः विभाग कर सकते हैं। नहीं है। भावरक्षाके लिये कहीं चोवीस अक्षर, कहीं मुद्रायन्तकी सृएिक पूर्व अर्थात् मंगरेज-प्रभावके पहले दश अक्षर, इस प्रकार अधिकारी अधिक २६ और कमने । । जो साहित्य प्रचलित था, उसे प्राचीन पव अंगरेज- कम १०११२तक अक्षर देखे जाते हैं। प्रमावसे ले कर वर्तमान काल पर्यन्त जो साहित्य चल कालक्रम जिस समय गान टार कबिताए पृथक रहा है, उसे हा आधुनिक साहित्य रहने है। भावम निर्दिष्ट हाने लगी, तभीसे यहला रविताके मध्य प्राचीन नशा क्रमशः यति अक्षर तथा एकनामे भी छानबीन का आरम्भ । दगला साहित्यसरी उत्पत्ति । हुआ है। बङ्गला छन्दोमात्र ही संस्कृत और प्राकृतका । जिन दिनों बंगलाभापा लिग्विन भाषा रूपमै गण्य । अनुकरण है। हुई, उन दिनों जनमाधारणके ममझाने के लिये जिन जिन बदलामापा छन्दोचिशेपमें अभी अत्यन्त हीनावस्थामें । ग्रन्थोकी रचना हुई, वे ही बगलाके आदि साहित्य है। है। जो दो बार अनुकरण हुए है. वे भी असीम संस्कृत : लिखित बगलाभापाके प्रचलनके साथ बंगला साहित्यका ई, यहां तक कि प्रारतके निट भी नगण्य है। सूत्रपात हुआ। कब और किस समय वगला साहित्य वैदेगिक प्रभाव । । की उत्पत्ति हुई, इम्शे स्थिर करना एक प्रकारसं पहले लिग आये हैं, कि प्राकृत तीन प्रकारकी है,, असम्भव । वगलाभापाके प्रस्ताव पर हम लोग अनु सस्कृतम्म, सस्कृतभय और देशी। प्राकृत देखो। इन मान करते हैं कि, १२वी शताब्दीमें गौडी नापाको प्राकृत लोन प्रकारको प्राकृतका प्रभाव हो प्राचीन बङ्गलार्म व्याकरणके मध्य स्थान मिला । पहले साहित्यकी सृष्टि दिखाई देता है। इसके सिवा मुसलमानी अमल में अरबी हुई ततपश्चान् व्याकरणका प्रयोजन हुआ। इस तरहसे पारसी शब्दमे घुस गया है । नवावी अमलको शेपा रवी शताब्दीके वहुत पहले हो गौडीय बंगमादित्यको वस्था तथा अगरेजी-मलके आरम्भमे पुर्तगीज, मग, उत्पत्तिको कल्पना की जाती है।