पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/५

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रोकड़-रोग रोकड़ ( हि स्त्री० ) १ नगद रुपया पैसा आदि विशेषतः , पक्षाघात, अक्षिनाश, महापातकन, जलोदर, यकृन्, लोहा, __ वह रकम जिसमेंसे आय-व्यय होता हो । २ जमा, शूल, श्वास, अजीर्ण, ज्वर, सहि, रक्ताळद, विसर्प पूजी। आदि रोग उपपातकज हैं। किस पापसे कौन रोग होता रोकड़ वही ( हि० स्त्री० ) वह वही या फिताव जिसमें | है उसका विषय कर्मविपाकमें लिखा जा चुका है। नकद रुपयेका लेन देन लिखा रहता है। कर्मविपाक शब्द देखो। रोकडविक्री ( हिं० स्त्रो० ) नकद दाम पर की हुई विक्रो। जो पथ्याशी, जितेन्द्रिय, देवहिजभक्त और स्वधर्मा रोकडिया ( हि पु०) रोड़ रखनेवाला, खजानचो। नुष्ठानकारी हैं उन्हें रोग नहीं होता। वैधकके मतसे रोकना (हिं० कि० ) १ गतिका अवरोध करना, चलते रोग और रोगके कारणादिका विषय संक्षेपमें नीचे लिखा गया है। हुएको थामना । ३. जाने न देना, कही जानेसे मना "रोगस्नु दोपवैषम्य दोषसाम्यमरो गता। करना । ३ अडचन डालना, बाधा डालना। ४ किसी रोगा दुःखस्य दातारो ज्वरप्रभृतयो हि ते ॥" (वाग्भट) क्रिया या व्यापारको स्थगित करना, जारी न रखना ।। ५ऊपर लेना, ओढ़ना । ६ वशमें रखेना, कावूमें रखना। दोपके चैपम्यको रोग कहते हैं। वायु, पित्त और मार्गमे इस प्रकार पड़ना कि कोई वरतु दूसरी ओर न कफ इन तीन दोपोंमें जव विषमता होती है तव ही रोग जो सके, छेकना । ८ वढतो हुई सेना या दलका सामना होता है। दोपके साम्य रहनेसे शरीर नोरोग रहता है। करना । ६ बाज़ रेखेना, मना करना। आहार विहारादि इस प्रकार करना होगा, जिससे दोपमें रोग (सं० पु०) रुज्यतेऽनेनेति रोजनमिति वा रुज घञ् पिमता न होने पावे। रोगमें विषमता होनेसे ही रोग यद्वा रुजतीति रुज (पदरुजविशस्पृशो धञ् । पा ३३१६) होगा। रोग शरीरका दुःखदायक है। इति कर्तरि घम् । १ कुष्ठोपध । २ वह अवस्था जिससे ___निज और आगन्तुके भेदसे रोग दो प्रकारका है। अच्छी तरह न चले और जिसके बढ़ने पर जीवनमें पहले वायु आदि दोष विगड़ कर पीछे जहां रोग संदेह हो, वीमारी, मर्ज । पर्याय-रुज, रुजा, उपताप, उत्पादन करता है वहां उसे निज और जहां रोग उत्पन्न हो कर पीछे वातादि दोष कुपित होता है वहां उसे व्याधि, गद, ओमय, अपाटव, आम, आतङ्क, भय, उपघात, भङ्ग, आरी, तमोविकार, ग्लानि, क्षय, अनाज च, आगन्तु रोग कहते हैं। इन सब रोगोंका अधिष्ठान यह मृत्युभृत्य, सम, मान्ध, आकल्प । (हेम) पापका फल रोग | और मन है। उनमें से ज्वर आदि रोगोंका अधिष्ठान देह तथा मद, मुर्छा, संन्यास आदिका आधार मन है । है। पाप करनेसे रोग होता है पापकी कमी वेशी होने- (वागभट) से रोग भी कमी वेशी हुआ करता है। पाप अतिपातक, | __पहले ही लिखा जा चुका है, कि दोपकी विषमता महापातक और अनुपातकके भेदसे तीन प्रकारका है। रोग तथा समता ही आरोग्य है। रीगमात ही प्राणियों ___अतिपातकादि पापका अनुष्ठान करनेसे पहले नरक का विशेष क्लेशदायक है। यह रोग चार प्रकारका है, भुगतना होता है। पूर्वजन्मकृत वह पाप नरकभोगके स्वाभाविक, आगुन्तक, मानसिक और कायिक । इनमेंसे वाद फिर व्याधिरूपम दहको पाड़ित करता है। अतएव जो रोग स्वभावजात है उसे स्वाभाविक कहते हैं, पाप ही एकमात्र रोगका कारण है। निष्पाप व्यक्तिके, जैसे- धा, पिपासा, निद्रा, वाक्य और मृत्यु यह कमी रोग नहीं होता। रोग होनेसे रोगका कारण जो स्वभावजात रोग सभीको भोग करना होगा। फिर पाप है उसका प्रायश्चित्त करना होता है। पापका क्षय जन्मसे जो रोग उत्पन्न होता है उसे भी सहज रोग होनेसे रोगका भी क्षय होता है। इष्टमन्त्रजप, होम, दान | कहते हैं जैसे जन्मान्ध इत्यादि । और सुरार्चन आदि द्वारा भी रोगको शान्ति होती है। अभिघातादि जनित अथवा जन्मान्तर भाविरोगका अर्श आदि रोग अतिपातकज, कुष्ठ, राजयक्ष्मा, प्रमेह, नाम आगन्तुक रोग है । जैसे- काम, क्रोध, लोभ, मोह, ग्रहणी, मूत्रकृच्छ, अश्मरी, कास, दुष्टत्रण, गरामाला, | भय, अभिमान, दीनता, क्रूरता, शोक, विषाद, ईर्षा,