पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/५०४

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वाला साहित्य ५११ इत १६५ पदकर्नाओं के नाम पाये जाते हैं। इन सब, इन सब प्रधोंके अलावा महाप्रभुकी लाला घटित पदार्तगणम प्राय ममी हो चैतन्यदेवक समसाम और भी कामय पाये जाते हैं। जैस-प्रेमदासका यिक एव कोइ कोई परवत्तों ये। सिक चण्डिदास तथा चैतन्यच द्रोदयकौमुदी रामगोपालदासका चैान्यतत्त्व विद्यापनि पूरित्ती थे। इनका परिचय पहले ही ३ | सार, हरिदासका चैतन्यमहाप्रभु पर गावि पदासका चुके हैं। गौराण्यान। उनमें प्रेमदासका चैतन्य र द्रोदयीमुदी चरित शासा। अपेक्षाकृत वृहत् प्राय है । इमर्म प्राय ४ हजार ग्लोक हैं। श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके आधिभारके समयमे पगला यह प्रय चैतन्यच द्रादय नाटकका प्राचीन पद्यानुवाद है। मायाम चरितरचना विशेषरूपमे प्रार्शित हा प्रसिद्ध रस कवि पीताम्बरदास पिता रामगोपाल श्रीचैतन्यचरित सम्ब धमें निम्नलिम्वित पुस्तके | दासने 'चैतन्यतत्त्वसार" लिखा है। यह प्रय छोरा है, हम लोगोंक दृष्टिगाचर होती है। यदावन दानका इसम चैतन्य महाप्रभुके तरचको समझानेका चेष्टा की गई चैतन्यमागपत, जयानदका चैतन्यमनाल, लोवन दामका | है। गौरात्यानप्रय 'रिगम' भी कहलाता है। यह मह चैतन्यमलाल कृष्णदाम परिरानका चैतन्यचरितामृत।। जिया सम्प्रदायशप्रय है। के अलावे व या य प्रयोके आशिक भारमें चैतन्य ____ महाप्रभुका रोलाचरित ले कर निस तरह बहुतसे चरितकी घटनाविशेष दृष्टिगोचर होती है। जैसे कवियोंने चैतन्यचरितको रचनाकी ६, उमी तरह क्तिने गोयि दशा काउचा प्रभृति । इन सभी प्रथोम प्रत्येक हो कवियोंी अद्वैत, पित्यानद प्रभृति का महात्माओंकी प्रथको विशिष्टता परिलक्षित होती है। जैसे चैतन्यभाग सोला प्रकाश करके यगला माहित्यको पुष्टि की है। घतम महाप्रभुका नरद्वापलाला तथा पित्यानद प्रभुको । हरिचरण नामक एक महापुरुपने अद्वैतमगल' य लाला विशेषरूपसे वर्णन का गइ हैं। महाप्रभुको लीला लिया है। इशान नागरने अद्वैतप्रकाश को रसना की थी। के भौगोलिक विवरण पच ऐतिहासिक तथ्यवर्णन ही जया इसे छोड कर गनिपिगमर्म पत प्रमुको चात्य नन्द चैतन्यमगरका विशेषर है। रोशनदासका चैतन्य लादि वर्णन की गई है। इस प्रयके रचयिता रहार मगठ, मुरारिगुप्त द्वारा लिखे हुए सस्टन चैतन्यचरित । दास थे, पे श्रीखण्डवासी नरहरि सरकार नहीं थे। पायगानुपाद है। इसक अलाये उन कपियोंने दुलभ अद्वैतको याल्यलोलाके मम्म धमें कृष्णदामी लिनी क्रपनार्म मुरारिके कडचाका अनमोष्ठर सम्पादन किया । हुइ एक छोरा पुस्तक पाई गई है। श्यामदासा निवा है। लोचनदासके चैतन्य चरिता विशेषत्व यही है कि, हुआ एक अद्ध तमंगल प्रथ देखा जाता है। लोकनाथ महागमुके चरित्र ठेलफोम इम तरदके मधुरभावमें | दासो सोताचरित्रको रचना की। इस पुस्तक में अत किसाने भी उनी जीत पर्णना नहीं का है। धोचैतन्य । प्रभुका स्त्रा सीताठाकुराणीके चरित्रका वर्णन है। चरितामृत प्राय वैष्णव समाजम अधिक यादरणीय है।। नन्द वशमाठानामा पक रचितप्राय पाया गया है इस इसमें एक ओर जिस तरह महाप्रभुके महीयमी मधुर | छोटा पुस्तके रचयिताका नाम वृन्दायनदाम था । नर रोगमाय्यका सरल वर्णना है दूसरो मोर वैष्णहरि चा पत्ती प्रसिद्ध भत्तिातार प्रथके रचयिता थे, दर्शन तथा पैष्णव शास्त्रक सूक्ष्मनरवका समावेश देना इनका दूसरा नाम घनश्याम दास था। माता है । गोविन्दक पडनाफे महाप्रमुके चरितकी दूसरी नरहरि चमतोंने नरोत्तमविलास पामक एक और कोइ घटना लिसा नहीं गई है, सिफ गफे दाक्षिणात्य | प्रथी रचना की थी। इस प्रथम नरोत्तम ठाकुर महा भ्रमण हा इस प्रथमें पित है। शययी जायना लिखी है। प्रेमक्लिास नाम अथक इनफे मराय चूगमणि दासा चैतन्यचरित, रचयिता लिस्यान ददाम ये। यदुन दन दासने प्रसिद्ध शकरभट्टका निमा सन्यास, मनःसन्तोपिणी एच कणान दशे रचना की घो। इसमें श्रीनिवास आचार्य गोविन्दवासका क्या मादि मय मा पाये गये हैं। तथा उनके शिष्योका वृत्तात लिखा हुमा है । घशाशि