पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/५०५

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२ . ५१२ बगला साहित्य पुस्तक लेखकका नाम प्रमदास था, ये ब्राह्मण जानिके श्रीनिवास आचार्य प्रभुके पुल श्री गतिगोविंदने थे, उनकी उपाधि सिद्धान्तवागीश थी। इस प्रथमें महा- वीरतावलीकी रचना की। इसमें वीरचंद्र गोस्वामीके प्रभुका गृहत्याग तथा मन्यास एवं वंशीठाकुर नामक जीवन चरित्रको दो चार अदभुत घटनाओं का वर्णन किया महाप्रभुके अनुचरका जन्म तथा शिक्षाप्रसंग वर्णित है। गया है । इसके अलावे गतिगोविन ठाकुरका लिग्ना हुआ ____ उडियावासी गोपीवल्लभ दासने खुष्टीय १७वी | 'सन्तप्रकाशवण्ड' पाया गया है। इस प्रथमें वीरचंद्र शताब्दीके मध्यभागमे विशुद्ध बङ्गलाभापामें रसिक प्रभुको शेप लीलामों का वर्णन। इस प्रथको हम बोर- मगलकी रचना की थी । श्यामानन्दके प्रधान शिष्य रसिक रत्नावलीका शेपाश कद सकते है। आनंदचंद्र दास जग. मुरारिके चरितकी वर्णना ही इस प्रन्यका विषय है। दीण पण्डिनके चरित्रविजयप्रणेता थे। प्रसिद्ध कवि नरहरि चक्रवतीने अपने भक्तिरत्नाकर अनुवाद तथा व्याख्या गाला। में श्यामानन्दका कुछ परिचय दिगा है। कृष्णदासने संस्कृन गयोका बसलानुवाद करके प्राचीन कवियों- श्यामानन्दप्रकाश तथा श्रीजीवदासने श्योमानन्दविकाश ने बङ्गला माहित्य ती यथेष्ट पुष्टि की है। पारा. लिप कर इस धर्मजोवनके गौर भी कई अशोको स्पष्ट णिक साहित्यको बनातानुबाद जानामि इसके पहले किया है। इन दोनों प्रन्थों के मध्य भाषा, भाव तथा वर्णना- कितने ही सुविख्यात ग थकि नाम तथा परिचय दिये गये में श्यामानन्दप्रकाश हो प्राचीन जान पड़ता है। हैं। इस गथम आकारादि वर्णमाला क्रमसे पतिपय भक्त राईचरण दामने अभिरामवन्दनाकी रचना की गथकारों तथा उनके गथों के नाम तथा विषयका उल्लेख है। इस छोटो चन्दनामें अभिराम गोस्वामीके चरित्रका किया गया। कुछ वर्णन है। ____ अकिञ्चन दासने श्रीगौराग महाप्रभु नियपार्षद देवनाथ तथा बलरामदासने यथाक्रमसे गौरगणा रामानंदरायकृत जगन्नाथवल्लभ नाटकका पद्यानुवाद ख्यान तथा गौरगणोद्देशकी रचना की । संस्कृत भाषामे किया था। गौरगणोइ शदीपिका तथा बृहत् गौरगणोश नामक कविवल्लभका रस कदम्ब गथ वैष्णव समाज यदु- प्रन्थ प्रचलित है, उनके ही भाव ले कर ये दोनों ग्रन्थ नदनके विदग्धमाधव नाटकके रसकदम्बकी तरह प्रसिद्ध प्रायः दो मौ वर्ष पहले बङ्गला पापामें लिखे गये हैं । इन नही है। दोनों ग्रन्थों में श्रीगौराग महाप्रभुके पाश्च दगणोंका संक्षिप्त कृष्णदास, काशीदास तथा गदाधर ये तीन भाई भी परिचय दिया गया है। परम वैष्णव तथा प्रसिद्ध पंथकार थे। गदाधर दासके प्रायः तीन सौ वर्ष पहले देवकीनन्दन दासने वैष्णव- जगत्मसलमे इन लोगोंका विशेष वंश-परिचय दिया गया वन्दनाकी रचना की थी। इनके पहले गौड़ीय वैष्णव- है। कृष्णदासके श्रीकृष्णविलास गश प्राअल भाषामें समाजमें जितने महात्मा हो गये हैं, प्रायः उन सवोंके | हरिलीला वर्णन को गई है। यह धीमन्नागवतका ही नाम इस प्रथमें पाये जाते हैं। इस कारण यह ग्रंथ आंशिक अनुवाद है। छोटा होने पर भी वैष्णवोंका इतिहास लिखनेके समय ____ गदाधर सुविख्यात काशीराम दासके छोटे भाई थे । वहुत काम आयगा। इन्होंने जगत्मङ्गलकी रचना की थी। यह गध रकन्द तथा ___ आगरदासके शिष्य नाभाजी हिंदी-भक्तमालके | ब्रह्मपुराणके भाव ले कर अनूदित है। इस गथमें रचयिता थे। उनके शिष्य प्रियदासने इस प्रथकी टीका उत्कलखण्डकी वर्णना है। यह गथ १५६४ शकमे ( वा को थी। श्रीनिवास आचार्य प्रभुके शिष्य कृष्णदासने १०५० सालमै ) लिखा गया था। वगमाषामें इस प्रधका अनुवाद किया है। इसके अलावे जयदेवकृत संस्कृत गीतगोविद गीतिकायके बङ्गाला- इन्होंने और भी कई भक्तोंके चरित्न इस प्रथमें संगृहीत | नुवादको से गिरिधर एक हैं। १७३६ ई०में अर्थात् करके इसे सर्वाङ्गसुंदर बनाने की चेष्टा की है। भारतचंद्रके अन्नदामङ्गलकी रचना होनेके १६ वर्ष