पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/५२२

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बङ्गला माहित्य ५२६ गन्के सामने प्रक्ट किया है। साहित्यके वर्तमान | का यथेष्ट उनति हुइ था। हीन विदेणीय दशन विज्ञान, युग प्रवर्तक इन महापुरुषको जीवनी 'इश्यरचन्द्र विद्या | भूगोल तथा इतिहास प्रभृतिके विविध अभिनवतत्त्यसे मागर" शब्दमे सविशेषरूरमे रिखी है। | व गला भापाको सम्पत्शालिनी बना दिया था। वङ्गता साहित्यमें य मेजा प्रभाव । डाफर राजेन्द्रलार मित्र मी कृष्णमोदनकी तरह कविवर इश्वरचन्द्रगुप्तही मृत्युके साथ साथ वगला अगरेजो भाषामं सुपडित तथा का शास्त्रों के जाननवाले साहित्य के प्राचीन युगका असान हुमा। अगरेना । थे। इनको भाषा अपेक्षाहन मार्जित तथा विशोधित निमाके बन्याप्रवाह गरेनी-साहित्यका उच्छलित थी । गजेदलाल के यनसे वगठा साहित्य नाना प्रकारके तरगर्म घगीय साहित्यका प्राचीन गेति एक तरहसे प्रयोजनीय तयोंसे परिपूर्ण हो गया है। उनके शास्त्रज्ञान, पित हो गइ। विद्यासागर महाशय सके पडित उनकी गवेषणा पर उनको लिपि क्षमताकी महायता न होने पर भो उमी महामनाहर प्रबर भारतमें मारष्ट हो पानेसे यगलभाषा इतने म प समय हा इस तरह शार गये थे। इस समय अहरेजो मार अगरेजी रोति, अन रत्नोंको सान नहीं बन सकती। रेनोसाहित्यमा भार पाटन वैभर अगरेजी माहित्यका डाकर कृष्णमोहन तथा डाकृर राने दाल विद्या काध्यमौन अगरेजा साहित्यमा उत्तेजनापूर्ण सागरक मममामयिक थे । कि तु इनकी रचनाये विद्या माधुर्ग पर महरेजो दशन विज्ञानादिका गौरवगाम्मौर्य सागरके प्रभारसे प्रभावित नहीं है। विद्यासागर महा घगाय माहित्यक्षेत्र में महमा प्रदर आधिपत्य विस्तार शयक समयस बगल साहित्य अगरेजीसाहित्यका पर बैठा। विद्यासागर स्वय भी अगरजी प्रथोंका प्रभार प्रतिमुत्तमें परिवर्द्धित घेगमें परिलक्षित हो रहा अनुवाद करफ इम दाम नगरेजो भाव प्रचार करनमें है। आधुनिक साहित्यको मजा मजामें गहरेजा रीति प्रत्तप । यहा तक कि उनकी माहित्यिक भाषा 'साधु यनुयिष्ट हो गई है। विद्यासागरके परबत्ती लेवगण मापा' के नामसे प्रसिद्ध होन पर भी उममें अगरेजी इस विशाल स्रोतमें क्रमसे अधिकतर माए हो गये हैं। रोति एव अगरेजी साहित्यक माय प्रकरन धैभव अच्छी अक्षाकुमारदत्तने स्वय गनुशीलन करके क्षेत्रतत्त्व, तरह प्रश कर गया। राजा राममोहन रायफे हृदयमें वीजगणित, त्रिकोणमिति, कोनि सेफ्मन कैल्पयूलम अगरेजा भाव यथेष्टरूपसे प्रविष्ट हो चुका था मही प्रभृति गणित एव ज्योतिष मनोविज्ञान तथा उसके साथ वितु उनकी रिपी हुइ भाषामें अगरेजी रीति अधिर ! साथ अदरेजोमाहित्य विषयक प्रधान प्रधान प्रयोग प्रवेश न कर सही । राजा राममोदनक बाद मोजा पति अश्या क्यिाथा। वे पहरे पद्यकी हा रचना करते थे, पगला रिखने में प्रवृत्त हुए उनमें डार मोइन बन्यो मितु जव उहे प्रभारसम्पादक इ वरपद गुप्ता साथ पाध्याय तथा डाकृर राजेदलाल मिन महायक नाम मालाप तथा म त्मीयता हुइ, तब उनक यनुरोधसे ये उल्लेखनीय है। मास्न भाषा तथा अगरेजो भाषाम, गया रचना करने में प्रशन हुए। उस समय का गद्य ये दोनों ही पूरे पडिन थे। डाफर कृष्णमोहन का। प्रवध प्रभारपत्रम प्रकाशित होता था। भागामोंमें सुपडित धे, किन्तु विद्वत्ताक गौरवसे गौरवा! १८४३ ३०म तयोधिनीपविश प्रकाशित हुआ। स्थित होकर 3 होने स्वदेशीय भाषाक प्रति उपेक्षा चा अक्षयकुमारदत्त ११ वर्ष ता उन पत्रिका सम्पादा आदान्य प्रदशन नहीं किया । यद्यपि ये अपने धर्मको काय करते रहे। इस कायाभार प्रण करके उ होन छोड इमाइ समाजमें नारन यापन करते थे अगरेजी। जिस तरहके पना, परिधा तथा अध्यनसायका अपल- पोषाक परिच्छद प्रहार करन थे तथापि उनकी भाषा म्बन क्यिा था, उसका वणन नहीं हो सकता। देशहित मनरेनी राति माज पराभापारीताह परिलक्षित नहीं र, समाजसशोधा पा वस्तुतस्यनिर्णायक भत्यत होना । णमोहन य धोपाध्यायकी रचनाप्रणाली सो उत्प प्रयय ये लिख गये हैं। इसी समय उन्होंने सुहट तथा मानल न होने पर भी उसे बगला साहित्य ! फरासो-मापाता शिक्षा प्राप्त की, एवं मेडिकल कालेनमें Vol 1 133