पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/५२९

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वचाचार्य-वज चन्द्र और सूर्यग्रहणके समय एक पल वच दुधके साथ। की मर्यादा आदिका भली मांति निर्वाद । सेवन करनेसे धी शक्तिकी वृद्धि होती है। | वजारत (अ० स्त्री०) १ वजीरी, मन्त्री या अमात्यका (गरुडपु० १६३ म.) पद। २ मन्त्री या जमात्यका कार्य। अमात्यका २ सारिका पक्षी, मैना। ३ सूर्ण। ४ कारण । कार्यालय। ५ वचन, वाक्य। वज़ीफा (२० पु० ) १ वृत्ति। २ वह वृत्ति या आर्थिक वाचार्य (सं० पु० ) भाचार्यभेद । महायता जो विद्वानों, छातों, संन्यामियों, दीनो या बचादिचूर्ण-गुलमरोगनाशक औषधविशेष । प्रस्तुत बिगडे हुए रईसों धादिको दी जानी है। ३ वह जप या प्रणाली-वच, हरीतकी, हिंगु सैन्धव लवण, अमल ! पाठ जो नियमपूर्वक प्रति दिन किया जाता है। वेत, यवक्षार और यमानी इन सबोंका एकत वरावर वरा- वजीफाक्षर (फा० वि०) वजीफा पानेवाला। वर भाग लेकर चूर्ण करे और प्रातःकाल ४ माशा ले कर वज़ीर (अ० पु०) १ वर जो बादशाहको रियासत के प्रबन्ध. गरम जलके साथ सेवन करे। ऐसा करने थोडे ही में सलाह या सहायता दे, मन्त्री, दीवान । २ सतरजकी समयमे गुल्मरोग दूर हो जाता और भून खूब लगती है। एक गोटी जो वादशाहसे छोटी चोर शेष सब मोहरीले वचार्ज ( स० पु० ) १ सूर्योपासकमान । २ पारसीजाति। बडी होती है। यह गोटी आगे, पीछे, दाहिने, वाए और बचादिवर्ग (सं० पु० ) वैयोक्त ओपधिसङ्घ। निरछे जिधर चाहे, उधर ओर जितने पर चाहे, उतने (वाभट सु० ३५) | घर चल सकती है। बचाद्यघृत (सं० क्लो०) गण्डमाला रोगाधिकारमे घृती- वज़ोरी (अ० स्त्री० ) १ वजीरका काम या पद । (पु०) पचविशेष । ( रस० ) २ घोडोंकी एक जाति। यह वलूचिस्तानमे पाया जाता चचि ( स० पु० ) १ वचन । २ नाम, अभिधान । है। इस जातिके घोडे वड़े परिश्रमो और दौडने में बहुत चचाग्रह (२० पु०) गृहानोति ग्रह-अच्-वचसा ग्रहः।। तेज होते हैं। इनके कंधे ऊंचे और पुढे चौड़े होते है। कर्ण, कान। वज़ (अ० पु० ) नमाज पढनेके पूर्व शौचाके लिये हाथ वत्रोयुज ( स० त्रि०) वाक्य मात्र । पांव आदि धोना । मुसलमानोंका नियम है, कि नमाज़ वचोदिद् (सं० त्रि०) वचसृ-विद्-क्विप् । निवेदित । पढ़नके पूर्व वे पहले तीन वार हाथ धोते, फिर तीन यार वच्छिकवाला-बगालके अन्तर्गत एक प्राचीन स्थान.! कुल्ली करके नयनों में पानी देते है। फिर मुह धो कर वच्छिय-निवन्धसारके प्रणेता। कुद्दनियों तक हाथ धोते हैं और सिर पर पानी ले हाथ वजन (अ० पु०) १ मार, बोझ। २ तौल। ३ मान, फेरते हैं। अन्तमे पाँच धोते है । इमी आचारका नाम पर्यादा। वजू है। चजनी ( स० वि०) १ जिसका बहुत वोझ हो, भारी। वजूद (अ० पु०) १ सत्ता, अस्तित्व । २ शरीर, देह । २ जिसका कुछ असर हो, माननेयोग्य । ३ अभिव्यक्ति, प्रकट या घटित होना। ४ सृष्टि। वजह ( १० स्त्री० ) १ हेतु, कारण । २ तत्त्व । ३ प्रकृति । वजूहात (अ० सी०) कारणोंका समूह, यह बहुवचन शब्द वजा ( अ० स्त्री० ) १ संघटन, रचना। २ आकृति, रूप है और इसका प्रयोग भी सदा वहुवचनमे हो होता है। ३ दशा, अवस्था। ४ सजधज, चालढाल । ५ प्रणाली, | वन (सं० पु० क्लो० ) बजतीति बज-गतौ (शृजेन्द्रोग्रवज- रोति। ६ मिनहा, मुजरा। रिप्रति । उपा २।२८ ) इति रन्प्रत्ययेन निपतितः । वजादार (फा० वि०) जिसकी बनावट या गठन आदि । १ इन्द्रका असाविशेष । पर्याय-हादिनी, कुलिश, भिदुर, बहुत अच्छी हो दर्शनोय।। पवि, शतकोटि, स्वर, शम्ब, दम्भोलि, अशनि, कुलीश, वजादारी (.फा० स्त्री०) १ फैशन, कपड़े वगैरह पहननेका भिदिर, मिदुः, खरुस, सम्ब, सब, अशनी, वनाशनि, सुन्दर ढंग । २ मजावटका उत्तम ढंग । ३ किसी प्रकार- जम्मारि, त्रिदशायुध, शतधार, शतार, आपोत्र, अक्षज,