पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/५३१

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वज्रक-यज्रकाली अबरक है। इनमेंसे बज नामक परफको अग्निमें डालने वकक्षार (स० पु० का० ) वजक्षार । ने यजकी तरह स्थिर मावमें रहता है, कुछ मी विकत । बजकर (सं० पु० ) वज: फङ्कटो देहावरणमस्य । हनु. नहीं होता! यह अवरक अन्य सभी सवरकोंसे उमदा; मान्का एक नाम । होता है। इससे ज्यरादिरोग प्रशमित होता है तथा इस- वज्रवाण्टक (सं० पु०) वजस्य एटकमिव नद्वारकत्वान् । से अकालमृत्यु नहीं होती। थपरकको गोधन करके / १ म्नुहीन, थूहर । २ कोकिलाल वृक्ष, तालमत्राना- काममे लाना चाहिये। शोधित अवरक ही गुणकारक का पेड़। होता है। | वज्रएटशाल्मली ( सं० स्त्री०) नरकमेद । मागवतपुराण के शोधितका गुण-कपार, मधुररस, गीतवीर्य, थायु.! अनुसार अट्ठाईम नरोमिमे यह नाक नेग्मयां है। जो सब र धातुवर्धक तथा विदोप, व्रण, प्रमेह, कुष्ट, प्लीहा, पापी सर्वामिगामी है, यमलोकम उमको इस नरक गति उदर, प्रन्धि, विप और कृमिनाशा नित्य सेवन करने होती है। मे यह गेगनाशक, शरीरको दृढता सम्पादया, वीर्यवर्द्धक, "यस्त्विह वै सर्वाभिगमस्तममुत्र निग्ये वर्तमान बापटक- अत्यन्त कोमलताजनक, परमायुवईक, पुत्रजनक, मिह मालमत्तीमारोप्य निष्कर्षन्ति ॥” (भागवत ५।२६।२१) सदृश विक्रमजन, अकालमृत्युनानक तथा प्रति दिन वज कन्द (नं० पु०) वजाफारः इन्दोऽस्य। १ वनमण, सौ स्त्री रमण करने की शक्तिजन होता है। नारद । २ वनशरण, जंगलो मूरण या जिमोकंद। अप्रोविनका गुण-पोडाजनक तथा कुष्ट, क्षय, पाण्डु, तालके वृक्षका फूल। शोथ, दृवगत और पार्श्वगत वेदना तथा शरीरकी गुरुना वन कपाटगत् (स० वि०) सुदृढ़ द्वारयुक्त। का उत्पादक। वन मन्द देखो। चन कपाली (सं० पु०) बज पोलोऽम्याम्तीति इनि ! १० मोफिलाक्षवृक्ष। १९ श्वेत कुश। १२ थूहर बौद्धोंकी महायान माग्नाके अनुसार एक वुद्धका नाम ! का पेड, सेहुंड। १३ वृष्ण पक प्रपात्र जो रुक्मिणी- पयांय-हेरम्ब, हरुक, चक्रसम्बर, देव, निशुम्भीश, शशि- गर्भजात प्रद्युम्नके पुत्र थे। १४ विश्वामित्र के एक पुत्र खर. बज टोक। का नाम । १५ भाला, बरछा । १६ ज्योनिपमे २२ बज कर्ण (सं० पु० ) यज बन्द, शकरकन्द । व्यतीपात योगोंमेसे एक। १७ वास्तुविद्याके अनुसार व काक्षिा (सं० क्ला०) स्त्रीरोगाधिकारका बायधविशेष। वह स्तम्भ जिमका मध्य भाग अष्टकोण हो । १८ विष्णु प्रस्तुत प्रणाली-काजी ? सेर, कलकार्थ पोपलका मूल, के चरणका एक चिह्न । १९ थालवीर नामका पौधा। पीपल, मोठ, अजवायन, जोरा, मगरेला, हल्दी, दामहल्दी, २० विम्मादि सत्ताईस योगों के अन्तर्गत पन्द्रहवां विलवण, सबल लवण, कुल मिला कर एक पल, पाकार्थ योग । ज्योतिषशास्त्रमे लिखा है, कि बज्रयोग आदि। जल ४ नेर, शेप १ सेर, नियमपूर्वा पाक करे। यह दएड निन्दनीय है अर्थात् इन नौ दण्डोंमें यात्रादि कोई कल्कके साथ पीना होता है। इसका सेवन करनेसे शुमर्म नहीं करना चाहिये। जिस वालकका इम स्त्रियों की अग्निवृद्धि और आमशल तथा कफ नष्ट हो कर योग जन्म होता, वह गुणी, गुणग्राही, बलवान्, तेजम्बी, बल, वीर्य तथा स्तनदुग्धकी वृद्धि होती है। रत्न और वस्त्रादिका परीक्षक तथा शत्रुनाशक होता है । (भैपन्यरत्ना०) (काटोप्रदीय) २२ बौड़के मतसे चक्राकार चिह्नविप।। चज कारक ( स० पु० ) नवी नामक गन्धद्रव्य । (त्रि०) २२ बजे समान कठिन, बहुत कड़ा या मज-वज कालिका (सं० नो०) वजोपलक्षिता वालिका । चूत। ३घार, दारण। १ बुद्धको माना मायादेवीका एक नाम। २ शाक्यमुनि- बत्रक (स०क्लो०) वन संझा कन् । १ वज्रसार । २. फी माता! फलितज्योतिपके अनुसार सूर्य के आठ उपग्रहों मेसे एक वज काली (संत्री०) १ जिनशक्तिभेद। २ हिन्दूदेवी- जो सूर्यले तेईसवाँ नक्षत होता है मूर्तिभेद।