पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/५४२

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घटदोप-बटुक यरद्वीप (स० लो० ) द्वोपमेन । (ररस हिता २६ ३४ २०) } यटिका (सः स्त्रो०) वटिरेय स्वार्थे कन टाप् । १ वटा बहुतेरे ययद्वीपको राजधानी यातावियाको वटद्वीप कहते | गोलो । पर्याय-निस्तली । २ प्यञ्जनोपयोगि द्रव्य यही। हैं। मषद्वीप देखो। यो ( स० खो० ) घर अच् गौरादित्वात् डोष । पटपत्र (१० पु०) वटस्पेय पत यस्य) १ मिताजक परिकशा, गोग। २ वृक्षविशेष । पर्याय-नदोघट यक्ष सफेद धनतुलसा। २ वरका पत्ता। साथै क्न् । ३ | पक्ष, सिद्धार्थ, वटक, अमरो भृङ्गिणा क्षौरका । गुण- वटपत्र । पाप, मधुर शिशिर, पित्तनाशक, दाह, तृष्णा, श्रम, यटपना (स. स्त्री०) वटस्येव पत्रमस्या । य नमलिश श्वास, विप और दिशाशक । (नि.)३ तरक्षु । नाम फूलका पौधा। (यटु (स.पु० ) यटनोति घट ( कटिघाटम्याञ्च । उष्ण १६) पटपलो (स.सी) वटस्पेध पत्र यस्या गोरादित्वात् । इति । १माणवक, ब्रह्मचारी । २ वालक । ३ युटनट दाप। पाखानभेद, पयरफो । पयार्य-इनानी, पेरा । पृष। वता, गोधावतो इरायतो, श्यामा सहाहनामिका। वटुक (सं० पू०) यटु स्यायें सहाया या वन। १ वाला। गुण-शीतल, रच्छ मेहनाशक, वरदायक तथा वण । २ ब्रह्मचारी | ३ भैरवविशेष बटुकभैरव । पिशोपक। ( राजनि०) मनुष्य जब विपटमें पड़ने है तब उससे छुटकारा चयक्षिणोताथ ( स.का.) तीविशेष । पाने के लिये घटुकभैरवको पूजा, बलि और स्तोत्रादि पाठ परर (त. पु०) १ कुक्कट, वटेर नामक पक्षो । २ मथानी। करते हैं। यहाभैरके प्रमादमे वे थोडे हो दिन । ४ चौर, चोर। ५ विस्तर। ६ पगडी।। विपद्से उद्धार पाते हैं । बटुकभैरव स्तोत्रका इसी ७चञ्चला कारण आपदुद्धारम्तोत्र नाम पड़ा है। तबमारम इस घरमासिन (स.पु.) घटे पटाये यमनीति यस णिनि ।। को पूजा, मात्र गौर स्तवादिका विषय लिखा है-- १ यक्ष । कहने हैं, कि यप यक्ष पर रहता है। (नि.) ___हो बटुकाय मापदुद्धारणाय कुरु कुछ यदुराय ऐ २ वटय क्षरासा, पटरक्ष पर रहनेवाला। हों" यहो इकोस अक्षर बटुक भैरवनाम । इस वटसागर-कल्के मतगत एक तीर्थ । मनसे पूजा करनेसे विपद्का नाश होता है। घटुक । (उत्तमस १६५१७७) | भैरसकी पूजा करने में समय पूजापद्धतिके अनुसार बरमाविद्रीयन (स० को०) एक प्रतका नाम। इसमें पहले पूजा करके पीठ घाम प्यादि पास और मृत्ति खिया पटका पूजन करती हैं। भ्यासादि करे। पीछे ध्यान करके पूजा करनी होनी है। घटारक (स० पु०) रख रस्सी। घटुक भैरवका ध्यान सात्त्विक, रानसिक और तामसिक घटारका (सा. स्त्री०) रजु, रस्सी । (भारत १२१३२६३९)| के भेदसे तीन प्रकारका है- घटारण्य-दाक्षिणात्यके अन्तर्गत एक महातीर्थ। यह ) सारित ध्यान- पारोफे पास इजालमयके आधे योजन पश्चिमें अब "वन्दे वान साटिकम-श कुन्तन्नोभासिवय । स्थित है। अग्निपुराणक चटारण्य माहात्म्यमें इसका | दिव्याकल्पनयमणिमय किक्षिणी पुराय । सविस्तर विवरण है। दोसाकारं विशदवदन मुप्रसन्न त्रिनेत्रम् घटायोक (.पु०) चौरविशेष, चोर। हस्तान्जाभ्यां बटुक्मनिश शुभदन्तौ दधानम् ॥" वटाश्यत्यविवाह (स० पु०) हिदूशास्त्रोक्त रियाविशेष।) राजस ध्यान- इसमें वट और पीपरके पेडको एक दुमरेमें मटा कर "उद्यद्भास्करसन्निम त्रिनयन रत्वानरागमन पूजा करते हैं। स्मेरास्य परद कपातममय शत दधानं करें । घटि (स० सी०) पटनीति वट ( सवधानुभ्य इन। उण नीमनीवमुदारभूषणात शीतोशुचूताज्ज्वन ४१११११८) इति इन् । उपनिहित, मालजिय। बन्धुकारुयावासस भयहर देव सदा भावये।' Fol xx 138