पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/५४३

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वड़व--बड़वानन सनृद्धि गौर जन्ताका उल्लेग्न कर गये हैं। बहुन दिनों । हो कर दौंड जानले यहां के वाणिज्यमें बडी मुविधा हुई से यहां बडौदा-राजके आश्रित दोनोज ब्राह्मणोंका वास है। १८०० ई०को सन्धिके अनुमार यहांके सरदार द्वितीय था। वे लोग कदाचारी और दस्युप्रकृतिके हैं। उनके श्रेणीके सामन्तरूपमे गिने गये हैं। अत्याचार और उपद्रव का परिचय पा कर बम्बई गवर्मेण्ट यहाके सरदार दाजीराज ठाकुरसाहब राजकोटके ने सयाजी महाराजके राजत्वकालमें उन लोगोंको राजकुमार कालेसमे शिक्षा ममाप्त करके पितृसम्पत्तिके बडौदा दरवारका अनुग्रह पानेसे बञ्चिन किया। आज अधिकारी हुप हे । यहाँका राजस्व ४ लाग्य रुपये हैं जिन- भी यहां करीव २ सी दीनोज ब्राह्मण रहते हैं। अभी मेंसे अगरेजराजको और जूनागढ़के नवाबको वार्षिक उन्होंने दस्युवत्ति छोड दी है। सभी वाणिज्य व्यव । २८६६२) रु० कर देना पड़ता है । यहांक मरदार झाला. माय अथवा नौकरी करके अपना गुजारा चलाते हैं। वशीच गजपूत है, बड़े लडक ही पितृसम्पत्ति के अधि- बड़व (सं० पु०) घोटक, घोडा! कारी होते है। किन्तु उन्हें गोद लेनेका अधिकार नहीं बड़भी (सं० स्त्री०) वडयने आरुह्यतेऽत्र ति बड़ वाहलकात् । है। राजाको सैन्यमस्या ५ सौ है। अभिच. कृठिकागटिनि कीप । गृह-चूडा, धौरहर, २ उक्त राज्यका प्रधान नगर । यह यक्षा० २.४२३० धरहग। पर्याय-गोपानसी, चन्द्रशालिका, कृटागार, तथा देशा० ७.४४३०“पू०के मध्य अवस्थित है। वडभि, वहभी, बलभि और वलभी ये चार प्रकार के रूप वम्बई-बडौदा और सेण्ट्रल इण्डिया रेलवे का यहां एक होने हैं। स्टेशन है । नगरके दक्षिण राजप्रासाद और दुर्ग है । खाई वहर (वरुड़)-दाक्षिणात्यवासी निरुष्ट जातिविशेष ।। और दीवारसे नगर नुरक्षित है। यहा घो, रुई, तरह ये लोग जानकादि अनेक विषयोंमें हिन्दू पद्धतिका तरहले अनाज और देशी मावुनका जोरों कारयार चलता अनुकरण करते हैं सद्दी, पर सूअर चूहे यादि घृणित मांस है। देश भास्करगण गिल्पविद्यामे बडे उन्नत है। भाव- भी खानेले बाज़ नहीं आते। इनमें गाढीवडर, जाता- नगर-गोएडाल रेलवे के साथ यहा उपरोक्त रेलवेका मेल बडर और माटोवर नामक यई एक दल हैं। अपनी खाता है, इस कारण शहरकी उन्नति दिन-गर-दिन होती अपनी श्रेणीकी वृत्ति अनुसार इन लोगोंका इस प्रकार या रही है। का सामाजिक नाम पड़ा है। ये लोग यल्लमा, जनाई, काठियावाड़ एजेन्सीका अगरेजावास ! यह वर्द्ध- सात भाई और व्यहोवाकी पूजा करते हैं। विवाहके मान रोज्यके मध्य उपरोक्त वउचान नगरसे ३ मोल वाट मारतिपूजा करनेकी विधि है। पश्चिममे अवस्थित है। यहासे रेलवे द्वारा बम्बई और वडवा ( स० स्त्रो० ) चलं वातीति बल धा-क-टाप डल अमदावाद तथा भावनगर और राजकोट जाया जाता यो क्वात् लन्य इन्वं। १ घोटकी, घोडी। २ वड है । पहले वड़वान दरवारसे वार्षिक २२५०) रुपये ग्वज्ञाने. वामपधारिणी सूर्यपन्नी । ३ अश्विनी नक्षद। ४ में यह स्थान और २५०) २० खजाने में दुधराज गिरासिया- नारीविणेप। ५दामी। वासुदेवकी म्वनामस्याता फा अधिकृत स्थान भाडा ले कर यह राजसदर (Civil- परिचारिका । ७ वटवाग्नि । ८ नदीविशेष । ६ नीर्थ भेद । Station ) स्थापित हुआ था। यहा कारागार, स्कूल, बड़वारुन (स० पु०) वड़वया दास्या कृतः। पन्द्रह प्रकार धर्मशाला, श्रीपधालय और घटिकास्तन्म ( Clock- के गुलामोमेंसे एक। tower) आदिसे सुशोभित अच्छे अच्छे महल हैं । गिरा- बडवाग्नि (म० पु०) बडवायाः समुद्रस्थितायाः घोटक्याः सियाके भूमिदानके कारण अगरेजराजने उनकी सन्तान- मुपस्योऽग्निः । समुद्रास्थित अग्नि, वड़वानल | संततिको राजकुमार कालेज में पढ़ने में अधिकार दिया है। वडवान-वम्बईप्रदेशके अलावार प्रान्तस्थ एक देशी वडवानल ( स० पु०) वड़वायाः अनलः । १ वड़वाग्नि । मामन्तराज्य । भूपरिमाण २३७ वर्गमील है । वम्बई- पर्याय-सलिलेन्धन, वड़वामुख, काकध्वज, वाणिज- बडौदा और सेण्ट्रल इण्डिया रेलवेके इस राज्यके मध्य | स्कन्दाग्नि, तृणधुक् काप्उधुक, सौर्य, वाइव । ( अमर )