पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/५४७

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वत्सभूप-वत्सल वत्मभूमि ( स० स्त्री०) १ जनपदभेद, वत्सोंगी वास-1 ३० अहोरात्रका एक सौरसावन माम हुमा करता है। भूमि । (भारत वन० २५३१८) २ वत्सराजके पुत्रका नाम। जिस किमी तिथिमे ले कर उसकी पूर्ण तिथि तक ३० वत्ममिन (स.पु०) गोभिलपि। तिथिका पफ चान्द्रमाम और उसके बारह महीनोंका वत्समुख ( स० पु० ) वह जिसका मुह गायके बछडे के एक सावनवत्सर होता है। विशेष विवरय मास, मनमाम जैता हो। और पटि संवत्सर गन्दमे देखो। वत्सर (म० पु०) वसन्त्यम्मिन अयनत मासपक्षवारा सौरवत्सर प्रभवादि ६० नामों में विभन , इम्म व्य इति, बस निवासे (वसेन्च । उण ७७१) इति सरन्, कारण पष्टि संवत्सर नाम है। (सः स्याई चातुके । पा ७४४६) इति सस्यतः । उतना २६ चके पक पुत्रका नाम । (भागवन ४११०११) ? एक काल या ममय जितनेमे पृथ्वी सूर्यको एक परिक्रमा पूरी | मुनि नाम । (तिप० ६३४१) करती है, जालका वह मान जो बारह महीना या ३६५ दिनोंका होता है। पर्याय-संवत्सर, अद, हायन, शरत् । वत्सराज (म० पु० ) वत्मोपा नरपनि । समा. शरदा, वर्ष, वरिप, मवत् । (शब्दरत्ना०) वित्मराज-एक राजाका नाम । इस नामके अने- गना । __मलमासनत्त्वमें लिखा है, कि सीर, सायन, नाक्षत्र हो गये है। एक तो कौशाम्बी प्रमिद राजा था जो और चान्द्रके भेदसे रत्मर चार प्रकार का होता है । इस- ! गोतम बुद्धका समनामयिक था। चौलागवंशमें भी एक लिये सौर, सावन, नाक्षत्र और चान्द्रके भेदमे मास भी पत्सराज हुआ। लाट देशका पर चौलुफ्यवंशी राजा चार प्रकारका हआ। इनमेंसे धारद सौर मासका एक । इस नामका हुटा है । महोवेके चदेल राजाओंका एक सौर वर्ष और वारह चान्द्रमासका एक चान्द्रव होता । मन्त्री वत्सराज था जो अल्दा गानेवालोंमें 'बच्छराज' के है। शिन्तु मलमास होने पर तेरह महीनोंका एक चान्द । नामम प्रासद्ध है। वर्ष होता है । "चान्द्रवत्सगेऽपि द्वादशमासंभवति चत्मराज-निर्णयदीपिकाके रचयिता । २ भोजपरन्ध मलमासपाते तु त्रयोदशमासैर्भवति । तथाच श्रुतिः- और हाम्यचूडामणिप्रहसनके प्रणेता। वाराणसीटर्पण द्वादशमासाः संवत्सरः, चित् त्रयोदशमासतः संच | और उसकी टोकाके प्रणेता । ये रामाश्रमके निर त्सरः।" (मनमामतत्त्व) और राघव विपाठीके पुत्र थे। १६४६ ई०में इन्होंने उक्त बारह नक्षत मामका एक नाक्षत्र वत्सर और वारह पुस्तक लियी थी। सावन मानका एक सानन वत्सर होता है। सूर्य जद वत्सराजदेव-एक पानीन कवि । तर एक राशि में रहने है, तब तक एक सौरमास होता वत्सरादि (स. पु० ) वर्गका आदि, मार्गशीर्ग, अगहन । है। सूर्यके गनिमे रहनेसे मास हुआ है, इस कारण | वत्सरान्तक (सं० पु० ) वत्सरस्य अन्ते कायति गोमते इनको सौरमास कहते है । साल, शकाल आदि । इति कै-फ, यहा वत्सरस्यान्तो नाशो यस्मात् । फाल्गुन सौरमासानुमार ही गिना जाता है। सास। तिथिवाटिन मालम चान्द्रमास कहते हैं। चान्द्रमास वत्सल (सं० वि०) वत्स्ये पुत्रादिस्नेहपात्रे कामो. मुख्य और गौणके भेदसे दो प्रकारका है। वारह चान्द्र ऽस्यास्तीति वत्स ( वत्सासाभ्या कामवले। पाNES) मामका एक चान्द्रवत्सर होता है । २७ नक्षत्रका एक इति लच । १ पुत्र गा सतानके प्रति पूर्ण स्नेहयुक्त, नाक्षत्र मास और इसके बारह नाक्षत्र मासका एक वच्चेकं प्रेमसे भरा हुआ। २ अप-से छोटों के प्रति नाक्षत्र वर्ष होता है। सौर और चान्द्रके भेदसे सावन अत्यन्त स्नेहवान या कृपालु । (पु० ) ३ साहित्यमें कुछ मास भी दो प्रकारका है। जिस किसी दिनसे ले कर लोगों के द्वारा माना हुआ दशा वात्सल्य रस। इसमे ३० महोगनका जो मास होता है वही सौर सारनमास पिता या माताका अपनी संततिके प्रति रतिभाव या है। जैसे १०वी आश्विनसे लेकर स्वों कार्तिक तक प्रेम प्रदर्शित होता है।