पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/५५०

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वध्वतावनकका होते हैं। धध्यता (स. स्त्री०) घध्यस्य भाव तल राप । वध्यत्व याल तथा अपराजिता इन सब सुन्दर सुन्दर पुष्पवृक्ष मारने माघ या धम। | द्वारा जो वन लगाया जाता है, यह नि मदेव कल्याण बध्यपटह (स.पु०) चहदा जो यध समय बजाया! कर है। जाता है। वराहपुराणमें मथुराके वारद यनों का विवरण दिया घध्यशाल ( स पु० ) यध्य-बन्धनस्थान कारागार गया है। उन धनोंके नाम ये हैं मधुवन, तालपन कुमुद पाल यताति पध्यपार मण! कारागृह रक्षक, यह जो घन, काम्यकपन, बहुलवन भद्रधन, खादिरवन महा कारागारको रक्षा करता हो। घन, रोज धरलवन, वि पवन माण्डोरयन और पध्यमू (स. स्त्री०) यध्यस्य भू । वध्यभूमि, वध्य | घृन्दावन । इनका विवरण मथुरा श्व्दम देवा । बनविशपमें मृत्यु होनेसे उत्तम फल लाभ होता है। स्थान। यध्यमाला (स. स्त्रो०) यह माला झो वधपे समय देयोपुराणके भरण्यावर प्रशंमाम कहा गय है, कि सै धध पहनाई जाती है। दएडकारण्य नैमिप, पुष्कर, पुसमानत उपलावृत, जम्बू अध्यशिला (स० रखी०) यह शिला जिम पर रख कर | मार्ग और दिमवास आदि नौ घों या अरण्यों जिनकी प्राणिहत्या की जाती है। मृत्यु होती है, ये ग्रह्मलोक जा कर परमपदको प्राप्त पध्यम्यान (म क्लो०) यध्य स्थान | Vधान । घध्या (मस्त्रा०)वघयोग्या ! वध, इत्या। ___२ जल पानी । ३ आल्य, घर। ४ चमसा नामक पध्र (स.को०) यध्यतेऽनेनेति च ध्र (सर्वपातुभ्यटन । पापात । (भूक २१४६) ५ प्रस्त्रवण झरना । धन पण सम्मोतो म्मादि परम्मै बन्यते सेव्यते शीतादिवारणाय उष्ण १५८) इति छन् । सोसक, मीमा नामती धातु । यद्वा याति हिंसाथ पयते हिम्योऽनि तमः अथवा वनु घधा (स० पु०) सोसक, सीसा । पध्रि ( स०नि०) छिन्नमुक, वधिया। याचने तनादि गात्मने व पते पाच्यते घटिप्रदाय, पत्रिका (स.पु.) यह पुरुष को धधिश हो खोजा।। किचा यन श दे भू पर वयते यते स्तूयने स्तोतृमि घधिमस् ( स० लि.छिन्नमुली , जिम स्त्रोका | | रिति सि सहायां यन य । ६राशि रि(निघण्टु शश)७शाचायके शिष्यविशेषती उपाधि स्वामी ध्यजमङ्गरोगप्रस्न या रमण अक्षम हो। । जो सन्यासी सुखसम्पदाको तिलाञ्जलि दे कर सुरम्य यधिवाच् ( स० वि०) पल्पक, पक्रयादी। निर्मर निकर धनमें वास करते है, उहे वन रहते हैं। पधाव (स.पु.) १ आक्षता घोहा ।२ माखता घोडे ८म्तषक, फूलका गुच्छा, गुलदस्ता। पुनम पृल। को वापरम्परा चनाचु (म. पु०) जङ्गला कच्च। इस कच्चूत केयर घन (सं०को ना०) यनतोति पन मच या वन्यते सेथ्यते साग खाया जाता है । यह माना से मिग्न है। पति पनघ। (पुसि सायां ध प्रायेण । ११ ।।११८) पनष्णा (स.स्रो०) धनपिप्परी । २ यससर्मा यत स्थान, जङ्ग। पनकण्डल (स.पु०) मधुर शरण, मी जाति ___घर अपया घरफे समोप पिस प्रकार यन लगाना सूरण या निमोकन्न। होगा, इसका यिपय ब्रह्मवैवर्तपुराणके श्रीकृष्ण परमप्पण्ड पनादली ( स . स्त्री० ) यनोद्भग कदली। नगरीषग। में इस प्रशर लिखा है-आवास स्थलक मध्य सुन्दर यनपद (स.पु०) पनजाताः । बनारण, दरी तुलसीका पौधा गामा कर्तव्य है। इससे हरिमचि | ओर। पुण्य भोर धनपुत्रका राम होता है। यहा तक सिरे घनश्यीयत् (स.पु.) पुरहके पक पुवका नाम । सुलसीवन दर्शन करनेमे पदानका फल प्राप्त होता यनारिन् (म.पु०) यनहम्ती, अदरी हाशी। है। इसके सिया घरफ पूय और दक्षिणमें मारनी, यनारी (स. नो०) मारण्य कर्षरो नही पपिकाव, माघयो, पेतको नागेश्वर, मलिकाञ्चन, कही। Vol x 141