पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/५५२

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वनजार ५६३ धनतार-मारतवामो पपयनीवि जातिविशेष । उत्तर | तरहसे १५०८ इof दिल्लीयर सिर दर यादशाहके दोल मारतको अपेक्षा दक्षिण भारत ही लोगोंका अधिक | पुर पर आक्रमण करने के समय पहले पहल वाराज लोग तर वास है। यह जाति यहुत प्राचीनकालसे ही यहा मा वसे । चारण श्रेणीक लोग राठोरपशीय हैं। ये व्यापारमें प्राण है । परियन ( Indicr xn) ने इस | लोग १५३० ६०में मुगल सेनापति आसफ्नाफे अधीन जातिका उल्लेख किया है। दशकुमारचरितमें भी इन। इस प्रदेश आये। इस समय की श्रेणोके भगी तथा लोगोंश परिजय पाया जाता है। पाचात्य जातितच जगी नायफ द इस स्थानमें गापे। आसफमा मैना विदोका कहना है कि, वणिजार अथवा वनजार शब्द पतिने इन लोगो को कार्यदक्षता देख रहे ताम्रपत्र सस्त वाणिज्यकारका ही पाशमान है । एलियट | पर सोनेक अक्षरो से लिस पर एक सनद प्रदान की सादयो तो 'घोरार' पारमी शब्दसे ही हम नातिका थी । इन भगी वधरोफ पास अमो भी यह पन धरी नामकरण 'चनजार' होनेकी करपना की है। वे इस मान है। हैदरावादक निजामने उसे देख पर रहे शरदके द्वारा भारतवासियों के साथ पारमियों समर खिल्लत दी थी। को सूचनाको मीमामा पर गये हैं। अध्यापक काउपल पे लोग जादूविद्या पर विश्वास करो हैं एच कितने इन उर मतोंकी सत्यता स्वीकार नर्ग परते , ये कहते होर्म पारदर्शिता दिपाइ दता है। भूत प्रेतो पो भगाने के है--हिन्दा धन चालना यथा धनझारणा शब्दाथसे ही लिये ये लोग ना प्रकारफे मात्र पाउ रते हैं। पर, 'बननार' पदको व्युत्पत्ति सिद्ध होनेका अधि सभा । यातव्याधि तथा उदरामय प्रभृति रोगो को ये लोग डायन घना है। की दृष्टि गिरते हैं। किसी स्त्रीको डायनो लगी है इस जातिके नामोत्पत्तिके प्रमगमें पात्रात्य पण्डित, ऐमा विश्वास होन पर उसे वनमें ले जा पर मार लोग किसी भा सिद्धा तमें समुपस्थित फ्यो । देनेसे भी पुण्ठित नहीं होन। न होपे, पितु इसमें संदेह नहीं कि, यह जाति ये लोग साधारणत हिदु देवदेवको उपासना बहुत प्राचीन कालसे ही हिन्दू समानमें प्रतिष्ठा पाती किया करते हैं। घालाजी महाकाली तुल जादेवी, आ रही है । ऐतिहामिक उक्ति हा इसे समर्थन करतो मिटुभुग्विया तथा सतामूर्ति 1 लोगांकी प्रधान उपास्य है। दक्षिण प्रदेशनिवामो यमजार लोगों में माथुरिया, है। इनके गाये और भी कितने ही छोटे छोटे ठाकुगेकी ल्याण तथा चारण नामधारी तीन श्रेणीविभाग है। भी अत्यन्त भनिभायसे पूजा किया करते हैं। दस्यु ये लोग अपनेको वर्णश्रेष्ठ ब्राह्मण तथा राजपूत जातियों कार्यमें प्रदत्त होने पहले ये लोग अपने अपने उपनिवेश पेपशधर बताते है । माधुरिया श्रेणा गधुरास मा पर ये पायरुप मिठुभुखियाके मन्दिर में प्रवेश करते हैं। इस स्थानम एस गह है। अधिक समय है रि, राज | दस्युत्तिम लिप्त होनेको पूर्वसन्ध्याके अलावे कोरघाफे पूत चारण लोग तार्ययात्राके उद्देशसे पर्व लमाण श्रेणी | अन्दर गमन नहीं करता। अतपय पहले पेग दस्यु ये लोग एयण घ्यापारफे निमित्त इस प्रदेश में उप | पति मिठुका पूजा परके एक सतोमूर्ति निर्माण करते हैं स्थित हुए पप स्वजातीय याभो के अमापसे यहाके पथ पर घोका प्रदीप जला कर उस यत्तिकालोका शुभा अप पातीय क्यामो का पाणिग्रहण करके अपनी शुम निरीक्षण करने है। जब इस यतिकालोमें शुम पातिसे पृथक हो गये। ये लोग सिपनो क गुरु नान | रक्षण प्रतिमात होता है, तब पे रोग दल क साथ बाहर को हो अपना धम गुरु मानते हैं। होत है पय उच गृहर सम्मुन्नस्य पताकाके नीचे भूमिष्ठ मुसम्मानो इतिहासको मालोचना परनेसे जाना हो पर इष्टदेयको प्रणाम कर नोष्ठ पत्रको भोर पाना पास है, कि दिलाके सम्राटी का दक्षिणविजय मंगके करत हैं। उण्ठनक मार लोग किमी तरकी यात समयसे समयानुसार रामामो की माशासे रमद ले कर नहीं करन, यदि कोई भूल कर भी रास्ता पातर पे यननारगण दक्षिण भारत में मा उपस्थित हुए। इस! तो ये लोग यात्रा अशुभ लक्षणायुत मम र पुनः