पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/५५४

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वनमार-वनद् ५६५ तानहर, काठेरिया, पठान, तरान पठान, घोडी, घोडी । परते हैं। सर्व रिया ग्राह्मण मभी कार्यों में इन लोगोंको याल, धगांगेया, काण्ठिया तथा पहलीम। पुरोहितो करते हैं। घहरूप पननार लोग साधारणत हिदू है। इन चिाहफे समय ये लोग चार चार घड़ोंको उपर्यु परि मुसलमान भी हैं। मुसम्मान श्रेणीका तरह धनजार करके सात पाक सजाते हैं पर उनके बीच दो मूपल हिदू लोग गृहस्थाश्रमाचारी नहीं हैं। इनके मध्य राठोद | तथा एक जलपूर्ण फ्ल्सी रख देते हैं। इनके सामने चौहान पणार, तोमर तथा भुर्सिया नामक वश मृनिकालिप्त स्थानमें चौका करके पुरोहित होम करता विमाग देखा जाता है। इन सब घाम अव गोत्र विभाग है। तदन तर उसनादम्पत्तीको प्रयि-य धन परा पर निर्णीत हो गया है। राठोर नशा मुडारी, बाहुका, मुद उस मूपलक चारों ओर सात रपेट घुमना है। अनमें वित तथा पणोत नाम चार दल हैं, उनक वीच मुछारी उाके एक स्थान पर बैठ जाने के बाद स्न्याक पिता वर में ५२, वाहुको में २७ मुवितम ५६ पणोत; २३ गोल का पाय पूजते हैं पर्व क या सम्प्रदानक यौतुक म्वरूप प्रचलित है। चौहानों में ४२ गोत्र विद्यमान है, ये लोग मेन वरफे हाय दो या चार रुपये दते हैं। यही वडे घरों पुरोसे आ कर इस प्रदाम बस गये है। भुत्तिया लोग दायिवाह है। निम्न श्रेणीफे मध्य कायाको परके घर गौड ब्राह्मण मन्तान है। चित्तोरका राजधानीमें इन | रे जा कर 'धरीआ विवादानुसार विवाह करते हैं। लोगोंका वाम था। पहामे घे लोग दद्धिण प्रदेशवासो | इसके बाद स्वजातिभोज होता है। हो गये हैं। उनके मध्य २० गोत्र हैं। धनजीर (स.पु.) धनोद्भवो जोर । पनजात जोरक, __ये यहरूप बनजार लोग भन्यान्य जातियाका तरह कालो जारा । पर्याय-पृहत्पाली, सूक्ष्मपत्र, अरण्यनीर, सगोत्र में विवाह नहीं करत। नाट जाति की कन्या प्रहण | ण। गुण-कटु, शातल भोर व्रणनाशक । करते है सही, किन्तु अपनी कन्या उन लोगोंको वनजीयिन् ( स. पु० ) यह जो जगलसे लफडी ला कर समर्पण नहीं करते । नापक या नाय बननार लोग इन | जोरिका निगाह करता हो, लफडहारा । जातिक होते हुए भी साधारण श्रेणाकी अपेक्षा हो । धनतण्डुलो (स. स्त्री०) १ नण्दुलीयभेद । ( Amblogina उनत हैं। इनमें राजपूनोंको सण्या ही अधिक है। गोरख , polygonoudes ) २ धनतपदुलीय शाक। पुर विभागक नाएक दोग अपनेको सनाढर ब्राह्मण पातर (१००) भन्नु नवृक्ष । कहते है । ये अपनेको पिलिभातके आदिनिवासी बतात | वनतित (हा पु० स्रो०) पनेषु वनोद्भयपु माये तिक्त, हैं। ये कट्टर हिन्दू है । इनके समाज में बहुविवाह प्रच | तिका वा। हरतिको हड। लित तो है किंतु विधवा चिाह प्रचलित ही है। घनतिता (स० स्त्री०) प्रोमा नामा ठनाभेद । यदि कोई अविवाहिता वारिका परपुरुपके साथ भोध घनतिक्किा (स० स्त्रो०) वनतिका क्न् टापि मत इव । प्रणय करती है, तो उसके पिताको एक जातीय भोन१ पाठा। पाठा देखा। २ पथरी नामका साग । इसका देना पड़ता है पग उस बालिकाको सत्यनारायणकी कथा | गुण-तित और शीतल तथा षटु और षफपित्तन । सुना पर पवित्र कर लेते हैं । पियाहसमय वरक पिता यननपुप (स० पु०) १ मारण्यनपुप जगलो रागा।२ इद्र फे हायमें कन्या रिता तिलदान स्वरूप कुछ रुपपे देते, धारुणो। (ये यकनि० ) हैं। पचायतफ विगासे सभी अपना ध्यभिचारिणी पत्नो वनट (१० वि०) १ प्रशसाबारी, बडाइ करनेवाल । कात्याग कर सकते है । इस ममान विघमा विवाह न १ स्तोता, पूजक । होनेक कारण ऐसा रमणा पिर अपने बनातीय पुरुष दुर्गादासने 'वनद शब्दका 'वनदा: मर्थात् अभाट साथ विवाह नहीं कर सकती। ये लोग जम मृत्यु तथा पूजोपहार दानशारा अर्थ लगाया है। किंतु वर्तमान विवाह सम्कार यथाविधि सम्पन्न करते है । शयशे टीकाकार वनद' शब्दका प्रवल छायुक्त, ऐमा अर्थ जलानके पश्वान पर मणीचके अन्तमें धाम निष्पन । रगान हैं। Vol 2 142