पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/५५७

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वनमानुष Duram

UPATrm SIVE 68-18 PATRI Pr ___ इस चन्दर जातिके मध्य S Satyrus श्रेणीके वन-। करते हैं, ठीक उसी तरह ये भी अपने घरों को पाटते हैं। मानुष नामक पशु कुछ लाल रंगका होता है। इसका उन पाटयों पर ये वृक्षा के कच्चे तथा कोमल पत्ते विछा चेहरा चौडा, मुख गोल एवा नुकीला, कपालका पिछला फर चित्त लेटा करते हैं। निद्राकालमें ये हाथ वा पांव हिस्सा निपटा तथा आखें छोटी होती हैं एक हृद्कोप बढ़ा कर पासकी मजबूत डाली पकड़ कर आनन्दसे छोटा होता है , दोनों पार्श्व में वारह हड़ियां होती है; सोते हैं। जब तक वे पत्ते सूग्न कर छिन्न भिन्न न हो छातीकी हड़ियां दो भागोंमें विभक्त रहती है। हस्तद्वय जाते ६, तब तक वे उसो शय्या पर स्वच्छन्दतापूर्वक गुल्फग्रन्थिविलम्बी, पद लम्बा तथा पतला होता है , इन सोते हैं। में कभी नाखून दिग्वाई नही पडते। ये प्रायः पाँच फीटसे ऊचे नहीं होते। सुमात्रा तथा वोर्नियो द्वीपमे । इनका वास है। ___ जीवतत्त्वविद्गण कहते हैं, कि जीवजातिके पशु श्रेणीके मध्य 'गोरिला' प्रथम स्थानका अधिकारी है। शिम्पाजो उसके निम्न आसनके और ओरंग उटान तृतीय स्थानके अधिकारी है। कारण यह है, कि इन लोगोंके प्राकृतिक ज्ञानमे भी इसी तरह कुछ पृथकता दृष्टिगोचर होती है । आश्चर्यका विषय यह है, कि ओरग उटान इन सबों की अपेक्षा दीर्घाकार होता है एव मनुष्यकी आकृतिसं बहुत कुछ मिलता जुलता है । इसकी छाता, भुजाएं तथा हार्थोकी बनावट मनुष्य- के समान ही होती है। मनुष्यजातिमें जिस तरह सव की आकृति एक-सी नहीं होती, उसो तरह इनकी मुखा- कृतिमे भी कुछ न कुछ अन्तर अवश्य दिखलाई पड़ता है। ओरंगों में जो विशेष बुद्धिमान होता है, वह मुखके भाव तथा रंग-ढगसे विशेष विचक्षणताके साथ हृदयके मावोंको प्रकट करनेमें समर्थ होता है एवं कितने ही वनमानुप तो मनुष्यको तरह हर्पक्रोधादि विभिन्न मान भोरंग उटान। सिक वृत्ति भी प्रकाश कर सकते हैं । ये भारतवर्णके द्वीपो के वनमाला-परिध्याप्त समतल नियो-द्वीपवासी मोरग गण अत्यन्त झगड़ालू होते प्रान्तमें घूम-फिर कर समय विताते हैं। वहां ये मझोले हैं। जब वे वनके अन्दर फल फूल खाने के लिये जाते हैं, वृक्षके ३०, ४० फीट अंची डालों पर वृक्षों के पत्ते तथा तब किसो सामान्य कारणले भी झगड़ा कर एक दूसरे- दूसरी फटी डालियां इकट्ठी करके छोटे छोटे झोपडे, को क्षत विक्षत कर देते हैं। इनके दान इनकी आत्म- यनाते हैं। इनके झोपडे का व्यास प्रायः दो फीट रक्षाके अस्त्रस्वरूप हैं। झगड़े के समय वे शत्रुके हाथ होता है। ये वृक्षकी डालोको चटाई की तरह वून कर तथा माथा खींच कर दातोंसे नोच लेने हैं। यदि किसी विश्राम करनेकी शय्या तैय्यार कर लेते हैं। वनमें | समय कोई मनुष्प वा हाथी अचानक उनके झोपड़े के यापन करनेके लिये मनुष्य कुठार वा छुरीके अमावसे | पास आ पहुंचते हैं, तो वे उन्हें वहासे भगा देनेके अभि- जिस तरह वृक्षशाखाओं की छतरी बना कर सुखसे शयन | प्रायसे उन पर वृक्षोंकी डाल तथा पत्थरोंके टुकडे बड़े META SHRITIVANI