पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/५६२

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वनस्पातसव-बनाश्रित ५७३ वनस्पतिसत्र ( स० पु.) एकाहमेद । | बनामल (स० पु०) वनस्य आमला आमलक चरण वनब (म० स्त्री० ) यनपुप्पोद्भया या प्रक् । वनमाग। पावफल, काला करौंदा । चनहदि (स.पु०) नगरभेद । घनास्विका (स. स्त्री० ) दक्ष या शतिमूर्तिभेद । वनहरि ( स० पु०) सिंह। धनान (१० पु० ) वनस्य आन्न इव । कोशान कोसम धनहरिद्वा (स. स्त्रो०) धनोनया हरिद्रा अरण्यहरिद्रा नामक पक्ष या उमा फल । नगली हल्दी। महाराष्ट्र-साली कोण-अद्विविशा यनायु (स.पु०) १ एक प्राचीन देनका नाम । यहाश गरिमिन : रङ्ग-स्तुरि पशुपु अडविपसुपु , पम्वर- घोडा अच्छा होता था।२ इस देश में रहनेवाली जाति । धनहन्द, कचोरा तामिल~स्तरि मञ्जल । सस्थत ३ दानपरिशेप। (भारत १६५।३०) ४ पुरुराक एक पर्याय-गोली शोलिका वनारिश। गुण-कटु, यचि पुनका नाम । का, तित, दोपन और गोल्य। वनायुज ( स . पु० ) बनायो दशे जायने जन ३ । बनायु यनहास ( म० पु०) बनम्य हाम इव प्रात्यात् । देशोद्भव घोटक, यनायु देशका घोड़ा। यनारपुर-एक प्राचीन नगरका नाम । १ काग, काम । २कुदका फर। (भविष्य ब्रह्मम्व०५८१७) वनहामक (स० पु०) धनहाम म्याथै क्न् । काश कोसा। यनारिष्टा ( स० बी० ) वननाता अरिष्टेय । वनहरिद्रा, पना गला-कलकत्तेके उत्तर उपएठस्थित एक प्रमिद्ध जगली हल्दो। गण्डग्राम घनाच क (स० पु.) यनम्य अश्व कप नियतपुष्पचारि चालान (म पु०) धनोर हुताशन । चनाग्नि।। त्वात् तथात्व। पुष्पजीवी, यह जो मा बा पर वनानु (म. पु०) धनस्याग्नु 177 खरगोगा अपना जीविका चलाता है। वनायुक (R० पु०) मुह मंग। बनादक (म० ए०) वनोदमर आद्रक । जगली अद घनाग्नि ( स०पु०) चनजात अग्नि वनाग। चनाचार्य-जद्रभरणदोरा नामर योति शास्त्र प्रणेता। यनाका (स. स्त्री०) वनादक, ज गली अदाक। बनान (म० पु०) यमस्य अज । वनछाग, ज गलगे पररा। वनालक (म.को०) गैरिक, गेरू। पर्याय-इडिक निशुवादक पृष्टयन। वनालय (१० पु.) यन बीचका रहनका घर। यनाटन (सी०) बने अरन । घनभ्रमण, जगल्में | यनालगनीदिन (म.पु०) यह जो ज गठी द्रश्य धारा घूमना। अपनी जाविशनाता हो। याटु ( स० पु०) पवन, नीठा मपत्री। पनालिका ( स० स्ना० ) वन अननि भूषयति अ? ज्युल. या (स.पु० घनस्य थ त । वनमा त न गली भूमि राप टापि अन । हस्तिशुण्डीरता दाधोसूमी। या मैदान । घनारी (म.सा.) धनराजि, बनकी श्रेणी। पना तर (संज्ञा० ) अन्यत् यन। अपर पन दूसरा वनानम ( स० पु.) धनमेय माध्रमः । वनरूप माधम । जगर। चनाधमिन् (म.नि.) बनाश्रम अस्त्यय इनि । जिमने यनान्तराल (स.को०) पनपारस जगरफे मास पासका यनाश्रय लिया है बानप्रस्थ धायरी। म्या यनाभ्रय (स • पु०) घनमेव माश्रयो यस्य । १ होणार वनापग (मो .) यनोदमय नदी। डोम कौया ।(वि.)२प्राण्याश्रयी. शिसो घामस्थ यनारिजनी (म० माजरपा । यनामिलाय (म० त्रि) वनध्यसारी जगरको उजाइन धनाश्रित ( स० नि०) याम्यापारी निसा धान पागा 1 प्रस्थ लिया है। Vol x 144