पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/५६४

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


वनाद्देश-चन्दन बनोद्देश (स० पु.) १ वनसमीप, जगलके पास स्थान ।। वधन काटने के लिये भगवानम १६ प्रकारका भाग दिख २ वनक बीचका स्थान । । लायें। वनोद्भव (स० वि०) वन उद्यो यस्य। १ चन्यतिल, | "भाय तु ष्य प्राक्क शवचकाटून ह । जगली तिल। २ऋगारकोला कर्क । ३वनशूरण धारणश्चाद्ध्व पुपट्टा तन्मन्त्राणा परिमह ।। सागली ओल। ४ चनशेजपूरक, जगली विजौरा नीयू । अर्चनच जपो ध्यान तन्नामस्मरण तथा। वनोदवा ( स० खा०) १ घनकापासा शगली फरास । कीत्त न पञ्च व वन्दन पादसेवन ॥ २ काठमल्लिका। ३ मुद्पणी, मुगानी। तत्पादोदकसवा च तनिगदितभाजन । वनोपल्लन ( स०क्का०)१ यादहन । २ दावाठा तदायानाञ्च संसेवा द्वादशीमतनिहता ॥ रनोधी ( स० स्त्री०) चनक समीपका स्थान । तुलसारोपय विष्णोदेवदेवस्य शाणि । पनीरस् (सं० पु०) वनमेव ओको गृह यस्य । १ याार भक्ति पाडशधा प्रोक्ता भववन्धविमुत्य ॥" बन्दर । २ शुरुशिम्यो, केपाच । (नि) ३ वनवामी (इरिभाक्ताव०११ वि०) वह जिसका घर वनर्म हो। दवपूजार्म पोडशोपचारके मध्य यह अतिम उपचार चनीय (सपु०) १ धनसमूह। २ भारतके पश्चिम है। देवताको पोडशोपचार द्वारा पूना गनमे शेपमें निकस्य एक पर्वत और उसके पास का जनपद । वदन करना होता है। घनौपच (स० सा०) याको ओषधिया, जगणे जही पूरी ___हरिभत्तिपिलामम व दनका विषय इस प्रकार लिखा यति (स० वि०) यन समती उच् । समका। है। भगवान्गा स्तुतिपाठ करके वदन करने का विधान पथलि (वामनरूशलो)-वम्बइमदशक सौराष्ट्र प्रान्ताध है। दोनों हाथस भगवानके दोनों चरपा पा र गिर एक प्राचीन नगर । यह अक्षा० २१ २८ उ० तथा दशा० को का कर वदना करे कि, 'हे इश । मृत्युक साक्रमण ७० २२ पू०के मध्य अपस्थित है। जूनागढसे यह ४०१ प समुद्रसे त्रस्त और आपके आश्रित ई मुझे परित्राण कोस दक्षिण पश्चिम पड़ता है। स्थानीय प्रवाद है, कि कोजिये। मगार नारायण रामनरूपम इस नगरमें अवतीण हुप इस सिवा दोनों चाह दोनों चरण, वन, शिर, थे। उदोंक नामानुसार पीछे यह स्थान वामनस्थी दृष्टि, मा और वचन 47 भाद्र द्वारा वादन करना पहलगने लगा। यहा लोहे और ताये घरतन धनाका होता है। दोनों घुरने, दोनों बाहु, शिर उचन मोर जोरों कारवार चलता है। बुद्धि इन पञ्चाड द्वारा भी वदन किया जाता है। यह वन्दक (सं०नि०) यन्दने इति चन्द पवुल । वन्दनाकारी, पदन निखिल यछमें प्रधान है। एकमात्र यदन द्वारा मन विशुद्ध हो पर हरिके दर्शन हो सकते हैं। चादन स्तुति करनेवाला। कालमें भक्तोंके शरीरम जितनी धूलिकणा रहेगी, उती बन्दका (म० स्त्री०) चन्दक-टाप । चन्दा। माय तर उनका स्वर्गम पास होगा। जो व्यक्ति असण्य वन्दय (म. पु०) चन्दते म्तौनि वयते स्तूयते इति था | पाप करके अज्ञानम मुग्ध रहता है, वह यदि भक्तिपूर्वक भय (पदीड शपिगमिवश्चिनोवि प्राणिभ्योऽय )। हरिकी वदना करे, तो उसके सब पाप दूर हो जाता है १स्तोता स्तुति करनेवाला। स्तुत्य, स्तव या स्तुतिके और मनमें उसे स्वर्गकीप्राप्ति होती है। अतएव देय योग्य । वादन पापनाशक और स्वर्गजनक है। देवप्रतिमाको घदन ( स०सी० ) पदतेऽनेनति घन्द करणे ल्युट् ।। देखनेसे ही घदन करना होता है। महानवता यदि १बदन । वान भाये ल्युट् । २ प्रणाम स्तुति। देवव दन न करे, तो उसे एकमें जाना पड़ता है। हरिभतिविलासमें १६ प्रकारको मति धनलाह है, (हरिमतिवि०८वि) प्रणाम और नमस्कार शब्द देवा । उनमेंस बन्दन पर है। भत्तोंको चाहिये, कि ये मया ३शरीर पर बनाये हुए तिलक आदि चिह्न ४ यदान