पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/५६६

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वन्दिनौका वधुर ५७ लिखा है, कि श्राद्धक याद दियोको यथाशक्ति दान । के मध्य ही लगभग ३ हजार मराठी सेनाके साथ घुशी देना उचित है। कहनका तात्पर्य यह कि श्राद्धके पहले | रणक्षेनमें गा डटे । फरासी सेनाने दुर्गको घेर इनके लिये भोज्यादि उनसर्ग करके श्राद्ध के बाद रहे वह ! लिया। निरुपाय हो कर सर आयरकूटने एक दिन सय वस्तु दवे । दुर्गका द्वार उमोचन करके सशस्त्र सेना के साथ दुर्गम यदिनीका (स. स्त्री०)एक दाक्षायणीका नाम। प्रवेश किया। दोनों दलमें घोरतर समाम हुआ ; मत पन्दिपाठ (सा० पु.) मट्टय शियोक गात या व शकीर्शि ! में फरासीगण पराजित हुए । युशो अगरेजोंक हाथ दन्दी वर्णना। हुए। फरासियोंक साथ अप्रेजोंको भारतवर्षभं और, पदिमिश्र-पालचिकित्साफे रचयिता । कभी ऐसी लडाइ नहीं हुई। १७८० १०से ले कर प्राय पन्दियास (वदिवासु)-१ महान प्रेसिडे सोके । तीन घा तक लेपटानेट पिल्टने अन्य त कौशल के साथ उत्तर आट जिलान्तर्गत एक उपविभाग या तालु महिसुरगति हैदर अलीकी चढाइयोस इस दुर्गकी रक्षा की भूपरिमाण ४६६ यगमील है। यह स्थान शस्यशाली नहीं थी। हैदरावाद पर आक्रमण करनेके ममयमें सेना है। समतल प्रातमें परिभ्याप्त होने पर मा यहाकी पति मायरकूटन 3 हे दो उडाइमें सहायता दी थी पर्व अधिकाश मिट्टी दातुका तथा ककडोंसे परिपूर्ण है। दूसरा दूसरा लडाइमें उहोंने अत्यत दक्षताके साथ वीर वोचम लाल अथवा कृष्णवर्ण भूमिमएड दखा जाता अपना सेनाका रक्षा करने हुए शन्न दलको मार भगाया है। मितु वह क्षार मिश्रित होनके कारण शम्पोत्या दनफे उपयोगी नहीं होता। इस उपविभागर्म दो एक व दो ( ० रा. दि 'इदिकारादक्तिन' इति डोप । उन्नत शिखरवाला परत भा दण्डायमान है। । बन्दा रतुतिपाठ । २ उत्त' जिलका एक नगर । यह अक्षा० १२ ३० उ० | वदीक (स० पु०)द। तथा देशा० ७६ ३८ पू०के मध्य मपस्थित है। यह वन्दाकार (स० पु. ) वन्दीयत् गृहस्थ करोतीनि अण। स्थान इतिहास में प्रसिद्ध है। विगत कणटक युद्धके । वन्दिप्राह डकैत । पर्याय-माचल, प्रसह्य चौर चिलाम । समय इस स्थान भी युद्ध हुआ था। माटफे नवाध पदारत (स०नि०) कारापरुद्ध, जो कैदम बाद हो। पशके आत्मीय पर मुसलमान सामत घदिवासदुगके वादोजन (स० पु०) गजाओं आदिका या वर्णन करने अधिनायक थे। १७५२६०में प्रेज सेनापति मेजर याला एक प्राचीन जाति । लारेन्सने वन्दिमास पर आक्रमण किया था। मदनन्तर पदीपाल ( स० पु०) कारारक्षा (Jailor )। १७५७ ६० में कप्तान गल्डरकोम नगरको जला कर मी | वय (स०नि०) य ते स्तृयते इति पदि ण्यत्। बन्द दुर्ग पर अधिकार न कर सके। तत्काल हा दुर्ग मध्य नीय, वन्दना करने योग्य। भयस्थित फरासी सेनाने अग्रेजोको भगा दिया । १७२६ वयता ( स० स्त्री०) ययस्य भाव तल टाप् । धन्धन, १० मनसोनने अत्यात तीजगतिसे दुर्ग पर आक्रमण किया बन्यका भाव या धर्म । तो महो, frतु दुग विजय करनेसे असमय दो अपनी | चन्द्या (समा०) १ वग्द, घाँदा १२ गोरोचना । सेना ले कर प्रत्यावृत्त हुए । इसी समय दुर्गस्य फरासी बद्र ( स० वि०) यवते स्तौति देवादीन् पूनाकाले इति सेनादल विद्रोही हो उठा। मगरेज सेनापति मायरकूटने वदि टम् । पूजक । सुअवसर पा र दुर्ग पर आक्रमण पिया। दुर्गवासि वधुर (स. क्ली०) १रथया गाडीका आश्रय जिसमें गणने कुछ दिन अवरोध करनेक वाद स गरेजांको आत्म दोनों हरसे भौर धुरा प्रधान है। २ गाडीक यह स्थान समर्पण किया। फरासियों मुबमाम हस्तच्युत दर कर जहा सारयो या गाडीचान बैठ कर उसे चलाता है। १७६० १०के पहले सेनापति रालो अपने दायर के साथ मायणाचार्यने घेदभाग्यमें इसा, यथ यो रिया है:- दुर्गके सामने या उपस्थित हुए। देखने देखते दो दिन / माह पधनाधातभूकतम, उन्नतानतरूपन्धनकाष्ठम्, Vol Xx 143