पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/५७५

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५८६ वम्भ-वयनविद्या अर्थसे इस दस्यु-सम्प्रदायका नामकरण हुआ है। किन्तु , यन्टचालनासे सूता कातना, सूता रंगना, कपड़ा चुनना के लोग जिस प्रकार नाव ले कर समुद्रमे जाने माने हैं ' आदि मभी प्रकार के कार्य सोये जाने है। विभिन्न अरेजी में उस Burn boat रहते हैं। अधिक सम्भव है, प्रकारके तातोंका विवरण नया चालना एव उसकी निस वचोट' शब्दमे ही जलदस्यु सम्प्रदायका बम्बेटे । शिक्षा प्रणाली नीचे लिखी जाती है। नाम हुआ है। अति प्राचीनकाल से ही हम लोग च्या प्राच्य फ्या वस्म (सं० पु०) चंग, यांस। पाश्नात्य सभी सम्म देशों में वस्त्रका प्रचलन देखते है। रम्भारव (सं० पु०) हम्बारव, गाय या बैल मादिक प्राचीन काल मी लोग वस्त्र चुननेकी कला अच्छी तरह बोलनेदा शब्द, जानेका आवाज | जानते थे । असंहिताले ११४०११, ११५२११, २०६४।३, वम्मान (सही०)जनपद। ६८६, ६६६ प्रभृति मन्त्रीकी आलोचना करनेसे वन (सं० पु०) ? उजितु । (ऋक ८६२१) वन मालूम होता है, कि वेदी नधा रंगाध नको आच्छादित लियां टीप १२ उपजिहिका । ३ पक वैदिक ऋपि । आप। करने में बहुतने करोंका व्यवहार किया जाता था। ये ऋग्वेदके १०६६ सूक्त मन्त-प्टा ऋषि थे। पपडे प्रधाननः शुक्लवर्णके होते थे। (क. १।१३४।४ ) वट ( स० पु० ) छोटी पिपीलिया। ये पडे उस समय जनसाधारणमे धनम्वरूप समझे वम्री (मस्त्री० ) बल्मीक, दीमक । जाते थे ( शूक् ५॥४७॥२३ ) । माना स्यय पुवाटिके चत्रोकृट (मलो० ) वल्मीक, विमाट । रहने योग्य कपडे नैयार करती थी। (ऋक् ५१४७१५), चय ( स० पु०) १ तन्तुवाय, जुलाहा। २ वया पक्षी।। उनके अपडे गाढ़े होने थे। अथवट ।१।३, ६।२५, वयम देखो। ( बी०) ४ जुलाहों परयेम सूत पक १२॥३।२१, १४।२।४१ मन्त्रो में वस्त्रका उल्लेख पाया जाता जाल। है। इनके अतिरिक्त कात्यायन श्रौतसूत्र (१४।१।२०), वयन् ( वि०) ययनकार्य, बुननेका काम | याश्वलायन-गृपसत्र ( १।८।१२), गोभिलगृह्य (३ २१४२) वयन ( स ० पु. ) ऋग्वेटवर्णित व्यक्तिभेद । एवं पारस्करगृह्य ( ३१०) सूत्रोंम बत्रकी आवश्यक्ता (ऋक ७३३१२) तथा प्यदारादि बातें लिखी हुई है। कौपीतका ब्राह्मण में ययन (सं० क्लो० ) बल्लादिका मूत्रग्रहणरूप कार्यविशेष, (२६) काले वनका प्रचलन देख कर जान पडता है, बुननेकी क्रिया या भाव। कि उजले कपड़े को काले रंग रंग कर प्यवहारमें लाते चयनविद्या-ऊन या कपामादि सूत्रज्ञान वस्त्रनिर्माणरूप थे एवं वे रजनप्रणालोमे भी निपुण थे, इस मन्त्र द्वारा शिल्पविद्याविशेष। पाश्चात्य विज्ञानमे इसे Art of | इसका भी पता चलता है। rearing कहत हैं। किस तरह कितने परिमाणमे रूई पौराणिक समय नाना प्रकारके र गोंसे रंगे हुए ले कर किनने नम्बरका मोटा तथा पतला सूता तैयार कपडे का खूब ही प्रचार था । इसांसे श्रोवृन्दा. प्रिया जाता है, इसके बाद वह सूता किस तरह नरियेमें वन विहारी वनमाली अपने श्यामवर्ण शरीरका पाले लपेटा जाता हे पर्व किस तरह उन मृताले कपडा पार । कपड़े से ढके रहते थे। देवदेवियों को भी लाल तथा किया जाता है, इत्यादि बाते जिस विद्याके द्वारा सीवी! नीले कपड़े पहनाये जाने थे। श्रीरामचन्द्र भगवान्ने जाती है, उसे बयनविद्या कहने है। ब्राह्मणोंको पीप श्वन (रामायण २।३२।१६ ) दान किया वर्तमान समयमें पाश्चात्य जगत्वासी सम्प जातियों- था। अयोध्याकाण्डके ३७३ अध्याय श्रीराम तथा ने अपनी प्रवर बुद्धिक प्रभावसे इस देशीय तांताका लक्ष्मणको राजनीय कपडोंका त्याग करके बल्क ठनत्र अनुकरण करके लौड्यन्त्रका याविष्कार किया है। इन धारण करनेकी कथा है । फिर २१५२६८२ श्लोकमें लोक द्वारा सून-निर्माणसे ले कर वनवयन पर्यन्त सीताके द्वारा ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके वस्त्र तथा अन्न- शिल्प सभी कार्य एक बार ही सम्पन्न हो जाते हैं ।। प्रदान किये जानेका उल्लेख देख कर मालूम होता है, कि