पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/५८९

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६०० वरवरा-वरचन्दन वरंवरा (सं० बी०) वरं वृणोनीति वृ-अच-मुम्ब । चक्र । प्रात इतिहास नहीं मिलता । १३०३ ई० में अल्ला. पर्णी, पिठवन। उहीनने तलिग पर यात्रामण किया। किन्तु ये सफ- बरफ (सं० लो०) वियतेऽनेन इति वृ-अप नम: मंगायां लीभृत न हो सके। टम लड़ादगे उनकी बडी क्षति कन् । १ पोताच्छादन, नायका आच्छादन । २माधा दुई। पोछे ये लाचार हो कर लौट गये। इस समयमे रण वस्त्र। वियते लोकैरिति यू-अप, ततः कान । (पु०)! ही मुसलमानों के इतिहासमै बरंगलका प्रकृत इतिहास ३ बनमुद्ग, वनमूग ४ पर्पटक, पित्तपापड । ५ प्रिय'गु | पाया जाता है। १३०६ ई० में मालिक काफूरने धरगल नामक तृणधान्यभेद, फाकुन। पर्याय-क्ल क गु, सक्ष दुर्ग पर अधिकार कर लिया पब यहाके हिन्दू राजाको और स्थूल प्रियगु । गुण-मधुर, मन, कपाय और घान कर देने के लिये वाधित रिया । गयासुद्दीन तुगलकके पित्तकर। ६ हम्बवदरीफल, जंगली वेग। ७ प्रार्थना राजत्व कालाई मुसलमानों ने पुनः वरंगल पर अधिकार विशेष । तो घर लिया पर अधिक दिनों तक वे राज्यपालन न चरक (१० पु.) १ पत्र । २ पुस्तकोंका पन्ना सोने, कर मके। क्योंकि, महम्मद तुगलकके शासनकाल में चादी आदिके पतले पत्तर जो कृट कर बनाये जाते हैं। हिन्दुओं ने पुनः अपने नष्ट गज्यका उद्धार किया। और मिठाइयों पर लगाने और औपधमे काम आते हैं। इसके बाद दाक्षिणात्य जब वामनी राजवणका वरकल्याण (सं० पुली०) राजभेद । प्रभाव फैल गया तब दोनों देशवासो हिन्द तथा मुसल घरकन्दा (सं० स्त्रो०) क्षीरीश वृक्ष, खिरनीका पेड। मानों में घोर मघर्ष उपस्थित हुमा। १५३८ ६० वर- वरकाष्ठका ( स० स्त्री०) १ वृक्षभेद, एक प्रकारका पेड। गल के राजाने अपने हुतराज्यकी पुनःप्राप्तिके लिये आये- २राटिका, टिटहिरी नामको छोटो चिडिया। दन किया इस पर फिर दोनों पक्ष रवाई शुरू हो वरतीर्ति ( सं० स्त्री०) पञ्चतन्त्रोक्त ध्यक्तिविशेष । गई । इस युद्ध वरनाल र राजा गोलकोंडा राज्यसे हाथ चरकनु (सं० पु० ) वग, श्रेष्ठा, तबो यस्य शताश्वमेधि धो बैठे और उनका पुत बामनी गजाके यहा बन्दी हो कर त्यात् तथात्वं, यद्वा वर, ऋतुर्यस्मात् शतक्रतुत्वात् मारा गया । उक्त हिन्दू राज्यका जो अंश शेप यचा था तथात्वं । इन्द्र। वह भी १५१२ ई०से ले कर १५४३ ई०के अन्दर ही कुली बरकोद्रव (२० पु०) कोविदार वृक्ष, कचनार का पेड । कुतुबशाहके हाथमे चला गया। इसने कुतुबशाही वंश- घरग (सं० ली०) नगरभेद । की प्रतिष्टा का । गोलकाएडामें उसकी राजधानी स्थापित वरवरिटका (सं० स्त्री० ) वृक्षमेद । इस वरघटो भी हुई थी। यहा भी हिन्दुओंको कीत्तिका ध्वंसावशेष कहते है। दृष्टिगोचर होता है। वरनाल-दाक्षिणात्यमें हैदरावाद राज्यान्तर्गत एक प्राचीन वरझाउन-बम्बईप्रदेशके तान्देश जिलान्तर्गत एक नगर । नगर । यह हैदरावादसे ४३ फोस उत्तर पूर्वमै अवस्थित यह भूपावल उपविभागके सदरले ८ मील पूर्वमे अवस्थित है और अक्षा० १७५८ उ० तथा देशा० १६४० पू०के है। पहले यह स्थान वाणिज्यमें खूब चढा वढा था। वीच पडता है। यह नगर निजामके शासनाधान है। भूपावलमें विभागीय सदर उठ कर चले आनेसे यह इसले पश्चिम करीमावाद (४५६५ जनसंख्या) तथा । स्थान श्रीहीन हो रहा है । १८६१ है में सिन्देराजने यह एक मील उत्तर पश्चिममें मतवार (८८१५ जनसंख्या ) रधान अगरेजोंके हाथ सौंप दिया। इसके पहले यह नगर आज भी वरंगलकी प्राचीन समृद्धिका परिचय दे। नगर यथाक्रम मुगल, निज म और पेशवाओं के अधिकार- रहा है। में था । म्युनिस्पलिटो रहनेले नहरकी शोभा और सुन्द- प्राचीन नेलिग राज्यके अन्ध्रवंशीय हिन्दू राजायों- रता नष्ट नहीं हुई है। को समृद्धिके समय यह नगर उन लोगोंकी राजधानो वरचन्दन (म० को०) वरं श्रेष्ठ चन्दनं । १ काला चन्दन । था। दुःस्त्रका विषय है, कि उस राजवंशका कोई | २ देवदारु।