पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/५९६

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वररुचितीर्थ-वरसुन्दरी नही मानते । प्राकृत प्रकाश वररुविका असाधारण | परलो ( स० स्त्री० ) वरल डोप। यरटा। कृतित्व देख कर मालूम होता है कि प्रारत और पागेवरवत्सला (स० स्रो०) पर जामातरि वत्सला। श्वसुर मापामें इनकी अच्छी व्युत्पत्ति थी। उक्त प्रयफ छपते | भार्या, सास। समय उसकी भूमिकामें अध्यापक इ, यो, कावेलने लिया घरवराह (स.पु०) व्यर, घु घराले बालोंपाला जगलो है, कि वररुचि ली सदीफे भादमी थे। गारेट साहब | आदमी । भाषाविद्गण अनुमान करते हैं, कि इस शब्दसे के मतसे घे इसाम मसे पहले ४धी शताम्दाम तथा प्रोक Birbaroo रोमक Barbarus और अगरेजी चन्द्रगुप्तसे भी पहले विद्यमान थे। अभिधानकार हेम Barbarnan शादको उत्पत्ति हुई है। चन्द्रविरचित स्थपिरावलोचरितमें लिखा है, कि नन्द एरवर्ण (स.पु.) १ सुरण, सोना। २ श्रेष्ठ पण, घशीय राजा हम नन्दके राजत्यकालमें मगधके आत दिपारग। fत पाटगेपुन नगर, वररुचिने जामप्रहण किया। वरवर्णिन ( स ० स्त्री० ) सुन्दर वर्णशाली, वढिया रग ४६६६०सन्मे पहले नन्दा शका माविर्भाय हुमा । | पाता। इस देशके बहुतोका विश्वास है कि वररुचि महाराज यरवर्गिनी (स. स्त्री० ) पर श्रेष्ठो वर्ण प्रशस्त पोता विक्रमादित्यक नौ रत्नोमेंसे एक थे। इस सम्बंध चे दिर्यास्यस्या इति परवर्ण इनि डोप । १ अत्युत्तमा लोग ज्योतिर्शिदाभरणका एक श्लोक उद्धत करते हैं: | स्त्री। पर्याय-परारोहा मत्तकामिनी, उत्तमा, मत्त "धन्वन्तरि सपणकामरसिंह-शङ्क काशिनो । २लाशा, लाख । ३ हरिदा, हल्दी । ४ रोना। पतालमट्ट-घटकरकालिदासा । ५ फलिनी प्रियगु। ६ साध्वी स्त्रो। ७ गौरी। ८ लक्ष्मी । ख्याठा घराहमिहिरी नृपतेः समाया ६ सरस्वती। रत्नानि वे वररुचिष विमस्य ।" (नरल ) वरवारण (स.पु.) १ जागल जीवविशप, जङ्गली जान फितु उत नवरत्न जो पर ममयके आदमी नही | वर। २ सुन्दर हस्ती, यढिया हाथी। थे, यह श्लोक कविकी क्लानामाव है ऐसा प्रमाणित चरवामि (स.पु.) जातिविशेष । हुआ है। वराहमिहिर देखा। घरवाहीक (सलो०) कुङ्कम, फेशर । गन्दय शये उपाण्यानमें परचिका दूसरा दुसरा वापृत ( स० त्रि०) पर या आशीर्वादोरूपसे प्राप्त । पियरण लिखा जा चुका हैनन्द देखो। | यरवृद्ध (स.पु.) घरा श्रेष्ठो वृद्धः। पुरातन, पुराना। २शिय, महादेव। २शिव। घरचितीर्थ-प्राचीन तीर्थ भेद । परशठ-स्वर्णग्रामक भतर्गत एक प्रसिद स्थान । (स्कान्द नायरम्ब० १२५ म०) (भविष्य प्र०ख० ८।४३) पररूप (स.लि०) १ सुन्दरकपविशिष्ट, पूबसूरत । (पु०) [ घरशिन (स.पु०) एक असुर। इसे रदने सपरियार २घुद्धभेद। मारा था। घरल (स.पु. स्त्री०) घृणातीति पृ अलचा यरट, हस। परशात (स० को०) स्वच, दारचीनी। परलब्ध (स.पु.) वरा उत्कयों रन्ध्र पुष्पेषु पेन । घरप्रेणा ( स . सो०) हस्वमूया, छोटो मरोडफली। १ चम्पक्स, चम्पा पेट। २रतकाञ्चन, कचनाल । धरस् (स. क्ला०)सन। ३ नागकेसर चम्पक । (नि.) घरेण लाना। ४ घर | यरसद (स.पु.) मादित्य, सूर्य । प्राप्त पिसे घर मिला हो। परसान (स.पु.) (इन्दस्यज्ञानचसजृम्याम् । ठण. परला (स. सी.) घरल राप। १६सा। २ वटा, २०६६) इति गगनच । दारिक, पुत्र । गघिया कीड़ा। । परसुन्दरी ( स० स्रो०) १ सुन्दरी स्वा । २ छन्दोमेद ।