पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/५९७

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वरसुरत-वराट इसके प्रति चरणमें १४ अक्षर होते हैं जिनमेसे १, ५, ६, ११ विष्णुका एक नाम । १२ एक प्रकारका नक्षत्र वत्सर। यह १२४ दिनोंका होता है। १३, १४ वर्ण गुरु और वाकी लघु होते हैं। चरसुरत ( स० वि०) सुरतक्रियाभित, उछल। ' वगणक (स० लो०) वरमगामम्य कप् | १ गुडत्यक, दार- वरलेन (संपु०) गिरिसङ्कटभेद ! चीनी । (१०) २ श्रेप्टावयवयुक्त । वरस्त्री (स. स्त्री० ) सुन्दरी नारी, खूबसूरत औरत। वराङ्गदल (म० क्ली०) प्रियंगुपन, फैगनीका पना। . वराहना (म' स्रो०) वग श्रेष्टा अहना स्त्री । अनि प्रश- चरख्या ( स० स्त्री०) वरणीया, वरणके योग्य स्त्री। __स्नागयुक्ता स्त्री, सर्वाङ्गसुन्दरा स्त्रा। “घरम्या याम्यधिगूहु वे" (ऋक ५/७३।२) 'वरस्या घर- '२१२ ) परस्यावर बराङ्गरूपोपेत (म त्रि०) अनानां पाणि अनामयाणि पोया'। ( सायण) घराणि अाणि तेरपेनः । श्रेष्टरूपयुक्त, सुन्दर । चरनज (स. स्त्रो० ) वह माला जो कन्या परके गले में पर्याय-सि हस हनन । डालती है। वरागिन (सं० लि. ) वगङ्गमम्त्यम्येति बराङ्गानि । १ वरहक (स० क्ली०) एक जनपदका नाम । श्रेप्टाङ्गयुक्त, बगनविशिष्ट । (पु.) २ साठवेतम, अमाल. वहि- पहाडी जाति । वेत । ३ गज, हाथी। वरही ( हिं० पु०) १ सोने को एक लम्बी पट्टो जो विवाह- वरागिनी ( स० स्त्री०) श्रेष्ठानयुका, बराङ्गविशिष्टा । के समय वधूको पहनाई जाती है, टीका। २ वरपी देस। चरागी (स० स्त्रो०) यमनामन्तरवयबो यारा १ हरिद्रा, चग ( स० स्त्री० ) तृ-यच -टाप । १ त्रिफला । २रेणुका हल्दी। २ नागदातो। ३ मजिष्टा, मजीठ। नामक गन्धद्रव्य । ३ गुडूची, गुरुव । ४ मेदा । ५ ब्राह्मो। वगजीयो (मं० पु०) ज्योतिषी, गणक । ६ विडङ्ग। पाठा। ८ हरिद्रा, हल्दो। श्रेष्ठा। वराज्य (ri० क्ली०) उत्कृष्टघृत, बटिया घो। १० शणपुप्पी। ११ वानिदन, बैंगन। १२ ओड पुष्प, वराट (म' पु०) घरमन्दमटनीति अर फर्मणि अण । अडहुल । १३ वन्ध्याककॉटकी। १४ मद्य । १५ श्वेता- १ रूपई क, कीड़ो। श्रेष्ठ, मत्र्य और कनिष्ठ के भेटमे पराजिता । १६ सोमराजी । १७ शतमूली । यह तोन प्रकारका होता है। पीतवर्णको गाउदार छ माशे की फोडो श्रष्टचार माशेको मध्य और तीन माशे घराक (सं० पु०) वृणोते तच्छील इति (जलपभिन्नाट- लुगठबृहः धारन् । पा 3२११५५ ) इति पाकन । १ शिव ।। की कौडी फन्टि मानी गई है। वैद्यकके मनसे इसी प्रकारकी कौडोको वराटक पहा है। २ युद्ध, लडाई। ३ पर्पटक, पापडा। (नि०) ४ गोच- ___घराट या कोडोकी शोधनप्रणाली-कौडीको एक नीय । ५ नीच। पहर तक कांजी में म्वेद देनेने यह शुद्ध होती है। दृमरा वरामपुर--पप्राचीन प्राम। बारिकपुर देसो। तरीका-जमीनमें गड्ढा बना कर पत्ता बिछा दे। पोछे घरानाम-बम्बई प्रमीडेन्सोके महीकान्या विभागान्तर्गत उमको भूमीसे भर कर घरले चूहे रख पालिका' नामक ए- छोटा सामन्तराज्य और उसका प्रधान नगर । यम्नमें गोइठेकी आग जलानेसे कौडी भस्म वा विशुद्ध यहां के ठाकुर उपाधिधारी सामन्नराज रायसिंह बेह- होती है। यह शोधी हुई कौडा सब रोगों को हग्नेवाली चाड वशीय राजपूत हैं, ज्येष्टपुत्र ही सम्पत्तिका अधि- है। दूसरेके मतसे-जोगे नी मथवा किसी दूसरे कारी होता है। स्न्तुि दत्तक लेनेको क्षमता नहीं है। अलरसमें कीडीको भिगो रखे। जब वह पीनी हो जाय, यहाँका राजस्व ६५०० रु० हैं। तब उसे निकाल कर धो डाले। इसमे कोड़ी विशुद्ध हो वरङ्ग (सं० क्ली०) वरमझानां । १ मस्तक १२ गुह्य, गुदा। जायगी। शोधित कौडीका गुण परिणामसूल, क्षय और ३ यानि । ४ श्रेष्ठ अवयव । ५ चोच, दारचीनो। पाठा। प्रहणोनाशक, टु, तिक्त, अग्निदीपक, शुक्रवद्धक तथा ७ हरिद्रा, हल्दी। ८ मेदा । ई पेडकी रहनीका सिरा। वात और ककहर माना गया है। (पु०) बराणि स्थूलानि अङ्गानि यस्य । १० हस्ती, हाथो। २ रज, रस्सो। ३ पद्मवीन ।