पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/५९९

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वगलक-वराह दुर्गा! बरालक (स०पु० ) बराज देखे।। कर उसका नव भरने लगे। भगवान उन लोगों के वरालि ( स० पु० ) १ चन्द्रमा। २ वराड़ी रागिणी। स्नयस परितुष्ट हो पृथिवीका उद्धार करने के लिये प्रलय- घरालिका (स० सी०) वग आलिका सम्नी जयादिस्याः । पोधि-जलो घुसे और पृथिवीका अन्वेषण करने लगे। पाछे रसातलमें जा कर यहां पृथिवीकी देग पाया। वराशि (सं० पु० ) ग्थूल यन्त्र, मोटा कपडा। पर्याय अनन्तर उन्दोंने प्रलयकालमें शयनेच्छु हो सर्वजीवाधार उस धगयो अपने जठग्में धारण कर लिया। इसके बाद स्थूलशाटक, दरासि, स्थूलमाटिका, म्धूलपट्टक। जटा-! घरके मतन्ने यह शब्द क्लोचलिन है। वे अपने दातासे पृथिर्गको पकड कर थोडे ही समयके वरासन ( स० क्ली० ) वगये दुर्गायै सम्यने क्षिप्यने दीयने | मध्य रसानलसे बाहर निकल थापे । वराहदेवने पृथिवी- इति यावत्. आसल्युट । १ ऑपुप, अड़हुल । घरं ! का उद्धार किया है, देर कर देवगण उनका स्नय करने श्रेष्टमासनं । २ श्रेष्ठ आसन, ऊंचा आसन, सिंहासन लगे। अनन्तर उन्होंने देत्यराज हिरणाका जलके मध्य (पु० ) वरां खीया नारी अत्यति त्यजतीति अस-ल्यु । वध किया। हिरयया देखो । ( भागरम ३१३ २० य.) ३ पिड ग, हिजडा, खोजा। वरानपि जनान यात कालिकापुगणमें लिया है, कि भगवान् वराहदेव दुरीकरोति। ४ द्वारपाल । पृथियोका उद्धार कर पृथिवी पर यथेच्छ विवरण परने वरासन-एक प्राचीन नगर । यह दुर्जयपर्वतके दक्षिण- लगे। पृथिवी उनका मार सहन न कर सकी और महादेव पूरव कोने में अवस्थित है। इसके दक्षिणमे झामक नामक । यो शरणमे पहुंची। महादेवने वगहरुपी विष्णु कहा महागेल और क्षोभक नगर पहता है। था, 'देव ! मापने जिस उदेशसे वराहदेवसो धारण किया (गाप्तिकापु० ७०११६३ ) है, वह सिद्ध हो चुका। अभी पृथिवी यापका भार वहन चरामि (म० पु० ) वरैःश्रेष्ट अस्यते क्षिप्यते इति अस-1 न कर सकने के कारण विशीर्ण हो रही है, इमलिये आप अन् । १ स्थूलशाटक, भोटा पड़ा । बगेऽग्निर्यम्य ।। बराह शरीरको छोड दीजिये । विशेषतः यापने जलमय २खड्गधर, तलवारधारी। प्रदेशमे कामिनी पृथिवीको कामना पूरी की है। स्त्री- परासी (सं० स्त्री० ) म्लानवास, मैला कपडा। । धर्मिनी पृथिवीने आपकं तेजसे दारुण गर्भधारण किया वराह (सं० पु० ) १ विष्णु । २ मानभेट, एक मान! है। उस गर्मसे जिसकी उत्पत्ति होगी, वह पुन देवो पो ३ एक पर्वतका नाम । ४ मुस्त, मोथा। ५शिशुमार, असुरभावापन्न होगा। अतः प्रार्थना है, कि रजम्बला. संस। बाराहीकन्ट। ७ अठारह होमिने एक सङ्गममे दुष्ट अनिष्टकारक इस कामुक बराइदेहका त्याग छोटा होप। कीजिये। बराह ( अवतार )-विष्णु का नृतीय भवनार । भगवान् । वराहदेवने महादेवका बचन सुनकर उनसे कहा था, ने दिए वगहन्पमें अवतीर्ण हो कर पृथिनीका उद्धार 'महादेव ! तुम्हारे वाफ्यानुन र मैं इस वराहदेवमात्याग किया। इस अतारका विषय भागवत में इस प्रकार पता और फिरसे लोकहितने लिये आश्चर्य वराह- लिखा है-प्रलयपयोधिजल में पृथिवी जर निमग्न हुई, देह धारण फरू गा।' इतना कह कर वराहदव अन्तहित तब स्वायम्भुव मनुने ब्रह्माके पाम आ कर स्थानके लिये। हो गये। महादेव भी वहांस चल दिये। प्रार्थना की । न ब्रह्मा अत्यन्त चिन्तित हो कर भगवान वराहदेव उस स्थानले जा र लोकालोक पर्वत पर विष्णुका स्तव करने लगे। इसी समय भगवान् ब्रह्मांक वराहरूपिणी मनोरमा पृथिवी के साथ रमण करने लगे। नासारन्ध्रमेशगूठा भरका एक बराहपोन निकला। वहुत समय अंडा करके भी वराहरूपो विगु नृप्त न निकलते ही वह बानको यानी इतना बढ़ा कि आकाश हुए । अनन्तर वराहदेयके वीय से पृथिवीके गर्भ से महा- को दलिया । उसका अङ्ग प्रत्यक्ष पत्थरके समान मज- बलिष्ठ सुक्त, कनक और घोर नामक तीन पुत्र उत्पन्न धूत हो गया । ब्रह्मादि देवगण भगवान का अवतार समम हुए। चराहदेव इन सब पुत्रोंसे परिवृत्त हो तरह तरह