पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/६

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मसूया मोर मात्सर्ज मादि। इसके सिवा अपस्मार,, कारण कहा गया है। अतएव दीप और कर्म इन उमाद मूछा, भ्रम, मोह, तम और सल्यास आदि भी | दोमोसे उत्पन होनेके कारण इसे कर्णदीपज रोग भाग तुक है। पाण्डु प्रभृति रोगको कायिक कहते हैं। । कहते हैं। ___ यह रोग फिर कर्मज, दोपज और फर्मदोपजके भेदसे | दुर्गका क्षय होनेसे दुष्कर्मरत गेगोंका, उपयुक्त तीन प्रकारका कहा गया है। औपके सेवनसे दोपज रोगका तथा दुष्कर्म और रोगक्षय वर्मज राग-पूर्वजन्मकृत प्रवल दुष्कर्मसे जो सब होनेसे कर्मदोपज रोगोंका क्षय होता है। उपयुक्त उत्पन्न होता है उसे कमज रोग कहते हैं । यह फर्मज औषधके सेवनसे दोपज रोगों का क्षय होता है, इसका रोग तीन दोषोंके विगडनेसे उत्पन्न नहीं होता है। यह तात्पर्य यह कि दोपज ध्याधिका मूल कारण दुष्कर्म है। रोग फेवल भोग और प्रायश्तिादिके द्वारा शात होता | औषध बनाने में जिन सब द्वयों की आवश्यकता होती है। है। यह चिकित्साध्य नही । शास्त्र में कहा है, कि | उनके अभावजनित केश भोग द्वारा तथा कटु, तिक, गारमानुसार यथाविधि रोगका निणय कर दयार करनेसे | पाय आदि मनके अप्रीतिकर द्रष्य भक्षणादि जनित भी जो राग नही दयनो उसे फर्भज रोग कहते है। क्रश भोग द्वारा दुर्गका हास होता है। इसके बाद "यथाशास्त्रन्तु तीतो यथा व्याभिचिकित्सितः ।। | औषधके सेवनसे रोगके प्रत्यक्षीभूत हेतुका अर्थात् मम पाति यो म्याधिः स शेयो कमजो बुध । कुपित दोपका क्षय हुमाकरता है। (भावप्र.) गेग साध्य, असाध्य और याप्यके भेदसे तीन दोषज रोग--अनियमित आहार और विहारादि । प्रकारका है। इनमें से फिर साध्य रोगके भी दो भेद द्वारा वायु पिस और कफ कुपित होकर जो सब रोग है, सुखसाध्य और कप्टसाप । पो रोग चिकित्सा उत्पन्न करता है उसे दोपज रोग कहते है। इस पर द्वारा प्रशमित होता है उसे साथ जो चिरित्सासे कार कोई प्रश्न करते हैं, कि पूर्वज मरत प्रवल सुस्त भारोग्य नही होता उसे असाध्य और जो रोग चिकित्सा रहनेसे आहार और विहारादिका नियम लदान करने पर द्वारा स्थगित रहता है तथा निरिसा नही करनेसे भी कोई रोग नहीं होता, ऐसा देखा जाता है । मतपय प्राण नाश होता है उसे याप्य रोग कहते हैं । यत्नपूर्वक दोपज व्याधिको कारण भी पूर्व मस्त कर्ग है। खमे लगानेसे जिस प्रकार गिरता हुमा घर खडा रहे समें जरा भी सदेह नहीं । तब फिर से दोपज ष्याधि | माता है, उसी प्रकार गोपधादि द्वारा सुचिकित्सित किस तरदे कह सकते ! इस प्रश्न उत्तरमें यहोवा होनसे याप्य रोगीका भी शरीर रक्षा पाता है। जा सकता है, कि पूर्वज महत दुष्कर्म दोपज प्याधिका | रोगोत्पादक दोपके प्रकोपसे गन्या जो सब विकार मूल कारण है सही, पर अनियमित आहार विहार धारा उत्पन्न होते हैं उनका नाम उपद्रव है । (भावम० पूषख.) भी रोगोंको उत्पत्ति देखी जाती है, इसी लिये उसको रोग, रोगके कारण और उनके निरूपणादिका विषय दोपज व्याधि कहते हैं। सुचूत में इस प्रकार लिखा है- ___कर्मदीपज रोग!-यदि दोष थोडा दूपित हो और पुरुषों सुख दुःखका सयोग होनेसे ही उसको रोग उससे अति प्रवल रोगकी उत्पत्ति देखी जाय, तो उसे | कहते हैं । यह दुख तीन प्रकारका है, आध्यात्मिक, कागदोपज रोग कहते हैं । प्रबल दुकर्म ही इस रोगका आधिभौतिक और भाधिदेविका यह तीन प्रकारका दुख मूल कारण है। दोपको अल्पताके कारण रोगको म पता सात प्रकारके रोगोंमें परिणत होता है। सात प्रकारफे होना उचित था, लेकिन ऐसा न होकर प्रयल रोग रोग ये सब है-१ आदिपलजात, २ जमवलजात, उत्पन्न होता है। दुष्कृत क्षय होनेसे यह रोग भी दोपवलजात, ४ स घातवलजात, ५ कालवलमाता ६ भय होता है। इस रोगमें स्वल्प दोष हो उत्त दोषका देवधलजात और स्यभाववर जात | कारण है। पोंकि, भाा दोपको भी रोगोत्पत्तिका मादिवलजात रोग दो प्रकारका ,-मातदोपत्रात - -