पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/६०७

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वराहपुराण-बरामिहिर राहपुगण (नक्लो०) वराहप्रोफन एक महापुराण । पामी वा आलराजको टोकामे उसका कोई जिक्र भी नहीं वराहभूम ( वराह भूमि )-मानभूम जिलान्तर्गत एक गण्ड- है। प्राम और पुलिस थाना । इस नामका एक परगना! फिर हलमञ्जरीको दोहाई दे कर कोई कोई महाराष्ट्र मी है। । ज्योतिदि निम्नलिखित बचनका पाठ किया करते है,- यराहमांम ( को०) शूकरमांस, सूभरका गोश्त । "सस्ति श्रीनृपसूर्यमुनुजसके याने द्विदाम्बर- जगली तथा ग्रामाण भेटले यह दो प्रकारका होता है।। प्रेमानादमिने त्यनेसि जये वयसन्तादिके ॥" जंगली चराहके मांसका गुण गुरु, वानहर, वृष्य तथा "चैत्रं श्येतदले शुभे वनुतियावादित्यदासाभूद वल और स्वेदकर और प्रामीण बराहके मांसका गुण वेदारी निपुणे वराहमिहिन विप्रो रंगमभिः॥" गुरु. मेद, बल और वीर्यवर्द्धक माना गया है। अर्थात् ३०४२ युधिष्ठिर के अन्द या विक्रमसंवत्के वराहमिहिर भारतवर्ष में जितने ज्योतिर्विदोंने जन्म लिया चैत्र मानमें मादित्यदासके चौरसस सूर्य के आशीर्वादसे , उनमे वराहमिहिरको ही सभी सनप्रधान समझने वेदानिपुण वराहमिहिग्ने जन्मनदण किया । दुम्नका है। जनसाधारणका विश्वास है, कि वराहमिहिर राजा विषय है, कि यह ठोक भी किसो प्राचीन न्योनियम विक्रमादित्यके नवरत्नमेंसे एक थे। न रहने के कारण विश्वासयोग्य नहीं है। वडतका कहना है कि रवंश कुमारसम्म आदि अप देग्नना चाहिये, कि बगहमिद्विग्ने अपने प्रथमें के प्रणेता कवि कालिदास उक्त ज्योनिविदाभरण रच. कैसा परिचय दिया है। उनके बहलान करके उपसहाग. यिता हैं। अतएव वे वगहमिहिरके समसामयिक थे। ध्यायमें लिया है - प्रमाणके लिये बहुतान ज्योतिर्मिदामरणसे यह श्लोक : "आदित्यदासतनयस्तदवासबोधः कापित्यो सनित नश्य- मी उद्धन किया है- वरप्रसादः। "वर्षे सिन्धुरदर्शनाम्बरगुण (३०६८) र्यात ग्ली समिते ।। थान्तका मुनिमतान्यवलोक्य सम्यग हारा वराहमिहिरी मासे माधवसभिते च विहितो ग्रन्थक्रियापक्रमः ॥" चिरांचकार" उक्त श्लोकानमार ३०३८ गत कल्पद में या विक्रम । उक्त श्लोकानुसार वराहमिहिरके पिताका नाम नवन में ज्योतिर्निदाभरणका रचनाकाल होता है, किन्तु मादित्यदाम धा । वे अवन्तीवासी थे । कापित्ध नामक पीछे ज्योतिर्वािदामरणके मध्य हो- स्थानमें उन्होंने सूर्यदेवको प्रसन्न कर बर लाम किया "शाकः गराम्भावियुगोनिता हृतो मान सतरैयनाशकाः स्युः ॥" था। पञ्चसिद्धान्तिकान्तर्गत रोमकसिद्धान्तये. अदर्गण इत्यादि र यलमे ४४५ का उल्लेख है तथा "मत्वा स्थिर उपलक्ष वराहमिहिरने लिखा है- वराहमिहिरादिमतैः" इत्यादि प्रसङ्ग रहने के कारण "सताश्विवेदसंख्य शकालमपास्य पशुलादी। ज्योतिविदाभरणत ईसा-जन्मकी पहली सदीका प्रन्य धाम्नमिने मानौ यानपुरे भौमदिवसायः ॥" अथवा इस ग्रन्धक प्रमाणानुसार वराहमिहिरको नवरत उक्त श्लोकके अनुसार ४२७ शकमें चैत्र शुद्ध प्रति- में एक नही कह सकते। पद् मङ्गलबार पायो जाता है। अपना समय मान कर फिर कोई कोई ब्रह्मगुमटीकाकार पृथुस्वामीकी दोहाई ही ज्योतिर्गिद्गण महर्गण स्थिर करते हैं। दे कर यह वचन उद्धत करते है- इस देशमे वराहमिहिर और सनाके सम्बन्ध अनेक "नायिकपञ्चशतसल्यशाके वराहमिहिराचार्यों दिय गतः।" गल्प प्रचलित हैं। कोई कोई वनाको वराहमिहिरकी ५०६ शकमे वराहमिहिराचार्य स्वर्गधामको सिधारे।। कन्या, कोई पत्नी और कोई पुत्रवधू मानते हैं । फिन्तु सन्कृत साहित्यके इतिहास लेखक प्रसिद्ध जर्मन पण्डित - चेवर (Icher)ने आमराजको दोहाई दे र उक्त ५०६ शक शङ्कर बालकृष्ण दीक्षित रचित "भारतीय ज्योतिःशास्त्र" पहण किया है। किंतु आश्चर्यका विषय है, कि पृथु | द्रटन्य।