पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/६११

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वरीयसी-बरुगा ६२२ पल-सम्पन्न होता है ।५ पुलह ऋपिके एक पुतका नाम ।। मूर्ति बना पर प्रतिष्ठा फरे, पीछे उनको अर्चना(२)। ( भागवत ४०।६।३४) इनका ध्यान इस प्रकार है- वरीयसी (सं० वी० ) शतमूलो। "प्रसन्नवदन सौम्य हिमपन्देन्दुसन्निभम् । चरीबई (सं० पु०) वलीमई । सर्वाभरयागंयुक्त सर्व कामय्यानदितम् ।। परीवृत ( सं० त्रि०) पुनः पुनः आवर्तन । किरणैःगीतातः सौम्यः प्रिणयन्तमवस्थितम् । परीपु (मं० पु०) कामदेव । लवण्यामृतधाराभिस्तर्प यन्तमित्र प्रणा ॥ पर (स० पु० ) १ राजा । २ सवों का वरणीय । राजह ससमाल्दं पाशय्यप्रकर' शुभम् । वक (सं० पु०) कुधान्यमेद, वरक, चीना धान । पुष्कराय गयौः सः समन्तात् परियारितम् ॥ __वरुट (स.पु०) एक म्लेच्छ जाति, वरुड। गोर्या कान्त्या चानुगत नदीभिः परिवारितम् । वरुड (संपु०) एक नीच जाति । पराशरपद्धतिके मतसे नाग र्यादीगणेयुक्त बामणामिव चापर ॥ फैवर्तकी कन्या तथा शौण्डिकसे इस जातिको उत्पत्ति सष्टिस हारकर्त्तार' नारायणमिवापरम् ॥" हुई है। यह जाति अन्त्यजमे गिनी जाती है। ब्राह्मण इस प्रकार ध्यान करके पीछे पूजा करनी होगी। बिना जान बूझ कर यदि इम जातिकी स्त्रीसे गमन करें परणका मन्त्र-ओं वौं। एवं इसके हाथका भोजन करें, तो वे पतित और जान "भष्टाविंशान्तवीजेन चतुर्द शस्परेण च । बूझ पर करनेसे एसी जातिमें गिने जाते हैं। अमानपूर्णक थन्दुविन्दुयुक्तेन प्रणयाद्दीपितेन च ॥" पाप करने पर प्रायश्चित्त करनेसे पापकी शान्ति (यशीप पञ्चगा) होती है। प्रतिमा प्राणप्रतिष्ठा करके प्रणय द्वारा नियोधमुद्रा परुण (स ० पु०) वृणोति सर्वे वियते अन्यैरिति या उनन्, दिखलानी होगी। अगुष्ठ और मुष्टिको अन्तर्गत करनेसे (कदाद्विभ्य उनन् । उग्ण ३१५३) १ देवताविशेष । अदिति ही नियोधमुद्रा बनती है। पीछे पागमुटाने देवताका तिके गर्भले कश्यपसे उत्पन्न । श्रीमद्भागवतमें लिखा है, सान्निध्य फरके गध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्यादि कि चर्षिणी नामयो पत्तोसे इनके दो पुत्र थे, भृगु और | द्वारा पूजा करनी होती है। वाल्मीकि । ये जलके अधिपति, पश्चिमदिक् पाल, वरुणका प्रणाममन्त्र- दम्युओंके नागफ यार देवताओंके रक्षा माने जाने हैं। 'वरणा धरलो विष्णुः पुरुप निम्नगाभिपम् । पर्याय-प्रचेतस , पाशिन, यावशाम्पति, अप्पति, यादः । पाशहस्ता महानाहुस्तस्मै नित्य नमो नमः ॥" पति, अपाम्पति, जम्बूक, मेघनाद, जलेश्वर, परञ्चय, । (जनाश्योत्सर्गतत्त्व ) दैत्यदेव, जीवनवास, नन्दपाल, वारिलोम, कुण्डलिन्, ___ देशर्म अनावृष्टि दिखाई देनेसे वरुणकी अर्चना और राम, सुखाम । (जटाधर ) वरणमन्त्रका जप करे। इससे अवश्य वृष्टि होगी। अना ___जलाशयोत्सर्ग आदि अनुष्ठानों में वरुणदेवकी पूजा करनी होता है । इयशीर्गपञ्चरातमे इनकी पूजा-पद्धति ! (१) 'मथ वाप्यामतः कुर्यात् सदमरत्नादिनिर्मितम् । लिखी है। पूजाकालमें मूर्ति बनाना आवश्यक है। याह । द्विभुजं हसपृष्ठस्य दक्षिणेनाभयप्रदम् ॥ मूर्ति छोटे छोटे रत्नोंसे बनानी होती है। इनके दो भुज वामेन नागपान्तु धारयन्तं सुमोगिनम् । होते है, ये इसके पृष्ठ पर बैठे हैं। दाहिने हाथमें अभय सलिन याममाभाग कारयेद् यादसाम्पति ॥ और याये में नागपाश है। वाई ओर जलराशि और ' वामे तु कारयेदृष्टि दक्षिणे पुष्कर शुभम् । दाहिनी ओर इनके पुत्र पुष्कर है तथा ये नाना नदनदी, . नागर्नदीभिर्यादाभिः समुद्र परिवारितम् ।। नाग, जलधि और विविध जलजन्तुओंसे घिरे है । जला कृत्वष वरुण देव प्रतिष्ठाविधिनायेत् ॥" शयके किनारे वा प्रान्तमागमें वरुणदेवकी इस प्रकार (यशीर्णपश्चदान)