पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/६१२

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वरुण ६२३ वृएिके कारण इनकी जो मना की जाती है उसका विमानचारो, धेगवान और पराक्रमशालो कहा है। उक्त म्वतन्त्र ध्यान है । यह ध्यान इस प्रकार है- राजा वरुण सूर्णक जाने के लिये पथ (उत्तरायण और "पुष्करावत कर्मच, प्याश्यन्त बसुन्धराम् । दक्षिणायम भाग का विस्तार करत है। मूलरहित विद्यु द्गजितसन्नर टोयात्मानं नमाम्यहम् ॥ अन्तरीक्षमें रह कर वननोय तजपुञ्जको ऊपर उठाये हुए हैं। यस्य केशेषु जामूना नद्य सङ्गसन्धिषु ।। वह रशिमपुञ्ज मधोमुख है जितु उमका मूल ऊपर है। कुतो समुद्राश्चत्वारस्तस्मै तोयात्मने नम ॥" इससे वे जोधका मरण रोक्ते हैं। उनके सौ हजार भोप इम प्रकार ध्यान करक मानसोपचारसे वरुणको धिया हे अर्यात् ये ओषधिपति हैं। वे नितिको परा आराधना करे और पाछे मूलमन जपे। जप पहले मुग्न करक मनुष्योक दुरित नाश करने में सम हैं। विनियोग कर लेना होता है। यथा-प्रजापतिमपि चे परमायुको दन और लेते भी हैं। इन्हीको मायासे स्तृष्टुप्छन्दो वरुणो देवता पतावद्राष्ट्रममिथ्याप्प सुर राको चन्द्रमा चमकने हैं ये विद्वान हैं, महिसित व धम घय जपे विनियोग ।" मन्न गुरुमुखसे ही जान लेना मोचाकारो भार मुचिदाता है। उनके सभी कर्म होता है। वह मन इस प्रकार है- अप्रतिहत है। हे वरुण ! नमस्कार करके तम्हारा फ्रोध 'मों हगिरिहानाग्यन्तरयाममतास्ती । शागत करता हूं, यहक दृश्य दान द्वारा तुम्हारा कोध दूर गन्ध वशारग्निद्दत्वा दिव गच्चत्त तनो दृष्टिमावर " परता हूँ। हे असुर । हे प्रचेत । हे राजन् । म लागोंक लिय इस याहम निवास करके हम लोगोंका रत पह मान हमार बार जप करनेक वाद निश्चय ही पाप शिथिल करो। हे वरण ! मरे ऊपरका पाश ऊपर वृष्टि होगा । दूसरेक मतसे कूर्ग लक्ष्मा मौर माया से, नीचेका पागनाचेस और मध्यका पाश मध्यस खोल पोज, हुश्री दा इन तीन अक्षरोंके मन्त्रसे यदि नाभि पर्याप्त अलम मग्न हो कर जप किया जाय, तो अनावृष्टि दो। इसके बाद है अदितिपुर ! हम लोग तुम्हारा प्रतखएडन न करके पापरहित हो पर रहेगे। दूर होता है। मनकी जपसमा आठ हजार है, कि तु उमस चौगुना अर्थात् बत्तीस हजार जप करना होगा। (मक, १२४।६ १५) इससे मच्छी तरह जान पड़ता है कि वरुण दिक ताम दिनके बाद चाधे दिन में इस जपको समाप्ति पति वा लोकपाल है। ये यमकी तरह पापपुण्यफ विचार होती है। पानिप्रहकर्ता हैं। पे धनाधिकारी (मुक ११४३४) कोरकोर अनावधिक समय परुणका एकाक्षर मात्र तथा धृतमत है । (ऋक २११४) कसहिताक १११६१३१४ जपनेको भी व्यवस्था दते हैं। एकाक्षर मन हैं 'घ' मन्नमें लिखा है, कि यरुण समुद्रजलक साथ भाग ____ मनुने कहा-महापातकोशोलो धनदण्ड किया मन परते हैं। ७८७६ मखम उनके द्वारा समुद्र जाय, साधुचरित्र राजा उस का भी प्रहण न करे। स्थापनकी वात लिखी है। उनके भीतर तीन प्रकारके होममें पर पर यदि वह प्रहण किया जाय, तो उस महा धुलोक विरानित हैं, तोन प्रकारको भूमि है। उन्होंने पातको दापो हो उग्दे लिप्त रहना पगा। इसलिये भरतराक्षम हिरण्मय दालाकी ताह दीप्तिक लिये सूर्णका राजाको चाहिये, कि जलमें प्रवेश पर यह धन पक्षणका निर्माण किया है। ये जलविन्दुकी तरह श्वेतरण और मयश सत्तिसम्पन्न शाखा प्राझणका दे दधे ।। मुगफ समान पल्यान, उदक निमाता और समस्त क्योंकि पदण दण्डका हैं, ये राजा के भी दण्डघर हैं।। सत्पदापक राजा हैं। ५४७ मनमें ये सूर्य द्वारा फिर जो घेदपारग ब्राह्मण है ये सारे ससारके प्रभु हैं। । स्तुत हुए हैं। भूक्साहिता ७ मण्डलके ८७८६ सूत में (मनु ६ प.)। परुणदयताको अना स्तुतिया हैं। अति प्राचीन कालम ही जलाधिष्ठाता वरुणदेवताको। एतद्भिग्न उक्त सहिताके १५५६४, २२७१०, उपासना प्रचरित है। अगदर्म इन्हे राजा, विशुर पल, श२८, १५, ४४१।१२, १०६६।१०, १०११३८