पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/६१६

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६२६ पर वाशी सात पुत्रोंके साथ स्वर्ग गई थी। ऋग्वेदके । परिश्यक्त देखा पाता है। स्वयं भगवान्ने कहा है- २१२१ मत्रमें ६ मादित्य तथा ४३ मन्त्रमें सात 'अनन्तश्चास्मि नागानां धरणा यादसामरम् । धादित्यका वर्णन है। तैत्तिरीय ग्राह्मणमें घाता, अध्यामा, पितृष्णामय्यामा चास्मि यम सयमनामहम् ॥ मित्र, वरुण, अभा, मग, घर और विवस्वान् इन साठ (गीता १०२६) थादित्योश हाल है। रितु महाभारत और विष्णु आदि फिर महाभारतमें कृष्ण और उरुणके विरोधको क्या पुराणों में बारह मादित्यफ नाम देखे जाते हैं। शतपय } रिनी है। श्रीरष्णने जलज तुममाकीर्ण समुद्रगर्भमें ग्राह्मणफे १२६३८ मन्त्रमें पारद महीनोंके सूर्य को बारह प्रवेश कर सरिलतर्गत यरुणको परास्त किया था। मादित्य कहा है। ऋक्स हिताके २१२७१ मन दक्ष (मारत द्रोणपर्ग ११.), थदिति पुत्ररूपमें उल्लिखित हुए है। निक्कमें (E२३)! __ भागयतम इस कृष्ण और वरुणा विद्वपको वर्णन यास्सने लिखा है, "यदित क्षो मजायत दक्षादु अदिति उपाण्यानकी तौर पर किया गया है। एक दिन नन्दन परि" अयाद दास ही अदितिको उत्पसि है। फिर क् एकादशीके दिन उपवास रह कर ननाई नको अपना ६५०२ मनमें सूर्य को दक्षसे उत्पन्न बतलाया है। इस! दो। द्वादशी तिथिको ये आसुरा कालमें कालिन्दोनल में दिसावले कुछ भी स्पिर नहीं किया जा सकता। परतु स्नान करने गये। ज्यों ही थे जल्म घुसे त्यों दी धरण उन सूक्तके १म मवर्म लिम्बा है, 'हे देवगण ! में सुधके का नौकर उन्हें परणालयमें घसीट ले गपे। भगवान् रिपे स्रोतके साथ अदिति यरुण, मित्र, अग्नि, अयमा,' धोरणको नव इसकी खबर रगा, तब उन्होंने यरुणके मग मीर सभा रक्षा गरी देयताओंको थाहान करता पास जा कर पिताका उद्धार किया। घरुणने इस समय इन सबकी मालोचना करनेसे पता चलता है, कि धोकृष्णको पदवन्दना को यो। ( १०१२८१५) .. वरुण मादित्यो मैस एक हैं। हसन्दपुराणके सह्याद्रिस्वाडके अन्तर्गत परुणपुरो मनुसहिता में ययणको अद्वितीय तेनसम्पन और । माहात्म्यमें लिखा है,- पाणाहस्त कहा है। उनके पागसे वद्ध व्यक्ति यदि पाप एक दिन शौनक्ने सूतसे यरुणपुरका माहास्य पदनेके प्रामनाथ यारुण प्रताचरण करे, तो मुक्ति पाता है। लिये प्रार्धाना का। सूतने कहा, नाना रत्नराजिविराजिता वाण मनके द्वारा सलिल विशरमें वरुणकी पूजा तथा मनोरमा घरुणकी एक पुरी था। यहाके लोग पापरापण उसके द्वारा नामिजल में घरे रह कर अप और होम और घेदाधानव थे। उन रोगोंन ज्योतिष्ट्रीम निधि द्वारा परनाहोता है। रामका आराधना की थी। इस यक्षसे देय और पितृगण ___अतिविकार पुर्षात पूर्वा वयस्य धारुप्पमन्तै ।" सभी मतुष्ट हुए । पीछे यदा उपस्थित हो कर रामने (तसं ४६।५१) । वरुणसे कहा था, हे जलाधिप परुण । तुम अपने मवन हरियाफे ४५ अध्यापमें यरुणदेवका रूपवणन सदा मेरा भी पर भवन निमाण करो। यह भयन नाना लिना। पेस पर बैठे हैं। हाथमें पाश यरन है। रक्ष विभूषित होगा और उमम मुनिगण याम रेगे। (सहत्रा ५८५७) यह पाग गरन काल पा ययण पाश | वरणदेयने परशुरामको यह बात सुन कर एक भवन का पहलाता है। (रामायण १२२७६) पहो मन पारण पाया और उसे परशुरामरो दे दिया। परशुरामन यद्द नाना कर पदेयामुरसमाममें देवपक्षाय दिक्पतिरूपमें भातीर्ण रसादि खचित सुरम्य गयन देख कर कहा था, कि यह हुए थे। ऐतरेय ब्राह्मणों (२०२४) इस युद्धका हाल | मन माजस वरुणपुर पायगा नथा परशुराम लिया है। रामायणमें मी ययणको युद्धकुशलताका परि इम पुरफ अधिपति होंगे। पर दिन मधुमासको शुत्र य दिया गया है। यार नवमी तिपिश सभी मनुष्य एकन हो कर सप्तदिन शायद विष्णु भौर चषणफे मत्रित्व या अभेटर । श्यापो रामका महोत्सव कर रहे थे। इसा समय एक का पो थामाम दिया गया है, गोतामें यह पूर्णरूपसे । मदादैत्य यहा पहुसयोर राम महोत्मवारी लोगोशे