पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/६१७

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वरुगा-वरुगाघृत तंग करने लगा। वरणालयवासी बहुत डर गये और ३ स्वनामग्यान वृक्षविशेष, वक्षणका पेड। पर्याय - परशुरामका स्तव करने लगे। स्तवसे संतुष्ट हो कर चरण, सेतु, तिक्तशाक, कुमारक, टायमरीन, तुक, वराण परशुगम वहां उपस्थित हुए और उन्हें माबोधन पर शिस्निमण्टन, वेतन, श्वेत म, माधुप्रश्न, नमाल, कहा, 'हे ब्राह्मण ! यदि मेरे कथनानुमार कार्य करो, तो मारुतापह । इसका गुण-टु, उष्ण, रक्तदोष और तुम लोगोंका दैत्यभय दूर हो जायगा। मैंने दैत्यदानव-: शीतयातहर, स्निग्ध, दीपन तथा बिधिरोगन । . नाशके लिये वरुण-निर्मित पुरोमे महामायाको स्थापन (राजनि०) किया है, तुम सभी जा कर यदि उसकी शरण लो, तो __. राजबल्लभके, मनसे इसका गुण वायु और शल- तुम्हारे भय दूर हो जायेगे ।' वरुणालयवामी विनोंने | हर, भेरक, उष्ण योर यमगेनाशक ! वरुणका पुष्प परशुरामके आदेशानुसार महालसा नामक महामायाकी गुण-पित्तन और आमवातहर । (राजवल्लभ). शरण ली । वहां चे उनका म्तव और पूजादि करने लगे। जल, पानी। ५ सूर्य । सुनि गर्भजात श्यपके एक महामायाने ब्राह्मणादिके स्तवसे संतुष्ट हो कर उनसे कद्दा पुनका नाम । (भारत ११६५४३) 'हे विप्रगण ! तुम लोग भय न करो, मैं उस दैत्यका | चरणक (सं० पु०) वरुणवृक्ष, वरनाका पेड 1 (Cretacra विनाश करती हूं।' इस प्रकार उन्हें अभय दे कर वे | Roxburghil) दैत्यके साथ युद्ध करने लगी। घोर युद्ध करने के बाद वरुणगुड-योषधविशेष। महामायाने उसक्षा शिर काट साला और उसे बायें वरुणगृहीत (सं० वि०) १ वरुण द्वारा आक्रान्त । • उदरी हाथमें ले कर वह अपने घरको लौटी। इस प्रकार दैत्य | आदि रोगप्रस्त। भय दूर हुआ। देवगण आकाशसे पुष्पवृष्टि और गन्धर्व-वरुणग्रस्त (सं०नि० ) वरुणप्राप्त, जलमे डुबा हुआ। गण गान फरने लगे | राममहोत्सव निर्विघ्नपूर्वक वरुणप्रद (सं० पु०) घोड़ोंको एक रोग जो अचानक हो समाप्त हुया। तभीमे माघ मासकी शुक्ला पष्टो तिथिको | जाता है। इस रोगमे घोडे का ताल, जीम, आंग्न और सामना करके तथा भक्तिपरायण हो कर जो मब व्यक्ति लिङ्गन्द्रिय आदि अंग काले रंग के हो जाते हैं। उनका त्रिभुवनेश्वरी देवी महामायाकी पूजा करने है, देवी उन | शरीर भारी हो जाता है और पसीना छूटता है। यह फी अभिलापा पूर्ण करती है। रोग भयानक होता है और बहुत यत्न करनेसे घोडे के (स्कन्दपु० सद्याद्रिख० वरुणपुरीमाहात्म्य १२ २०) प्राप्त वचने हैं। जिस अन्तरीक्षको देख कर वैदिक युगकं आर्यों के | वरुणग्राम-एक प्राचीन प्राम I (भविष्य नदाख० ५७२५६) हृदयमें ईश्वरका अभिव्यक्ति उदय हुई थी, वेदमें उन्हींको वरुणप्राह (सपु०) वरुण द्वारा आक्रमण या वन्धन । वरुणदेव कहा है। उन अन्तरीक्षप्रख्यात देवताओंके गजा | ( तैत्तिरीयसः ६६५४) वरुण साय ग्रीक पुराणोक्त उरेनसकी अनेक सदृशता वरुणधृत अश्मरीका एक औपध। घी ४ सेर, काढ के देवी ज्ञानी है। वैदिक उपाख्यानमें द्यौस् कर्तृक जिस लिये कृटी हुई वरुणकी छाल १२॥ सेर, जल ६४ सेर प्रकार वरुणकी पदच्युति और जलपति रूपमे नियोगकी शेष १६ सेर। एल्कके लिये वरुण मूलरी छाल, केले कथा है, उसी प्रकार प्रोसके पुरातत्त्वमें ज्युस कतक की जड़, नीमके ऐडकी छाल, , कुशादि, पञ्चतृणका मूल, उरेनमको पदच्युतिका हाल लिखा है। वरुण वृष्टि- | गुलञ्च, शिलाजित, कर्कटीका वीज, दुव, ,तिलनालका दाता और जलगृहविहारा हैं, उरेनस भी उसी उसी | शार, पलाशक्षार, जूहीका मूल प्रत्येक २ तोला । रोगीके कार्यके अधिपति है। किन्तु यथार्शम मेना और अश्विनी अवस्थानुसार मात्रा स्थिर करनी होगी। रोग पुराना तथा अन्न और वरुणके साथ अन्यान्य विषयों में बहुत होनेसे उसके साथ पहले ठहीका पानी मिला कर सेवन प्रभेद देखा जाना है, वरन् जलाधिकारित्वमें नेपचुनके करना चाहिये। इससे अश्मरी, शर्करा गौर मूत्रकृच्छ साथ वरुणका विशेष संदृशना है । नेपचुन देखो। 'रोग दूर होते हैं।