पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/६१९

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


वरणादिगण-बरेश और सहिजनके मूलका उण्या क्वाथ सेवन वरनेमे अश्वरी ढाल ! गृह, घर। ४ सैन्य, सेना, फौज । वियते और नवनित यन्त्रणा दूर होती है। वयोऽनेनेति वृ- वरणे उथन् । (पु०) ५ लोहेको चद्दर वरुणादिगण ( स० पु०) पेड़ों और पौधों का एक वर्ग|| या मीकडोंका बना हुआ आवरण या झूठ जो शत्रुके इसके अन्तर्गत वरुण, नीलभिएटो, सहिजन, जयन्ती, आघातले रथको रक्षित करनेके लिये उसके ऊपर डाली मेढ़ासोंगी, पृनिका, नाटाकरख, अग्निमथ (अगेंधू), जाती थी। ६ एक प्राचीन प्राम। बीता, शतमूली, बेल, अजगी. हाभ, वृहती और भट | (रामायण ११७१।११) कृष्टया है। (नुश्रुतव० ३८ म०) वस्थगस् (सं० अध्य०) सड्डयः बहुत सा। वरुणाद्रि (सं० पु०) पर्वतभेद ! वव्याधिप (सं० पु०) वरुयानां सैन्यानामधिपः, रक्षिता। वरुणानी (स स्त्री० ) वरुणस्य पत्नी वरुण (इन्द्रवरुण- सेनापति । भवति । पा ४११०४६ ) इतिढीप, सानुगागमञ्च । वरुण- वरुयाधिपति (सं० पु० ) सेनानी, सेनानायक । की पन्नी। वक्षथिन (सं० पु०) वरुथः अस्यास्नीति वत्थ इन् । वरुणापुर-सह्याद्रिपर्वतस्थ एक प्राचीन तीर्थक्षेत्र। १ गजोपरिस्य गजाकार काष्ठ या रथगुप्तियुक्त, हाथोकी वरण देखो। फाटी। २ वधार्थफ वस्तुमात्रयुक्त । वरुणालय (सं० पु०) समुद्र, सागर । वरुथिनी (सं० खी? ) सेना। वरुणावास (सं० पु०) ममुद्र, सागर । वल्थ्य (सं० त्रि०) १ वरणीय, वरणके योग्य । २ परि- वरुणावि (स.बी०) लक्ष्मी। गृत, वेष्ठित । ३गृहाई, घरके योग्य । ४ शीतघातातप- वक्षणिक (म पु०) वरुणदत्तका संक्षिप्त नाम । निवारक। ५ गृहोत्रित धन। वरुणेश (स० पु०) शतभिषा नक्षत, वरुण जिसके अधि | वरेण (सं० पु०) वोलता, वरोल। पति हैं। वरेणा (सं० स्त्री० ) वरेण्या शब्दका अपन्नश । वरुणेश्वरतार्थ (सलो०) एक तीर्थका नाम । वरेण्य (सं० पु०-) बियने लोकैरिति वृ-एण्यः, (वृज एपयः । वरणोट (स० क्ली०)सागर, समुद्रा उपा अहम) १ भृगुके एक पुत्र का नाम । २ महादेव । वरुणोपनिषद् (सं० बी०) पक उपनिषद्का नाम । | ३ कुंकुम, केसर। ४ पितृगों से एक ! (त्रि.) वरणोपपुराण (सं० पु०) एक उपपुराण । कूर्मपुराण और ५प्रधान, मुस्य। ६ वरणीय, पूजनीय । रेवामाहात्म्य में इसका उल्लेख है। वरेण्यऋतु (सं० त्रि०) वरणीय, प्रमायुक्त होता! वरुण्य (सवि०) वरुण-सम्मव. वरणसे उत्पन्न । (अक ८४३६१२) चन्द ( स० क्लो० ) वृणोति वृणोत्यनेनेति वृउन वरेन्द्र (सं० पु० ) १ राजा । २ सामन्तराज । ३ इन्द्र। ( याशिवादिभ्य सोनौ। उप ११७२) उत्तरीय वस्त्र, ४ बगालका एक विभाग। यह वरेन्द्रभूमि नामसे विख्यात टपरना, दुपट्टा। है। देशावलीमें लिखा है, कि एक समय नाटोर ही वयी ( सं० स्त्री० ) वामरूपके अन्तर्गत एक नदी। बरेन्द्रभूमिकी राजधानी थी। वारेन्द्र देखा। (भविध्य ब्रह्मख० १६५०) बरेन्द्रगति-परतत्त्वप्रकाशिका नामक वैदान्तिक प्रत्यक वरुल (नं० पु०) वृ-उल। संभक्त ।। रचयिता। वरुप (सं० पु० ) स्थानमेद । पुराणमें 'उरष' नामस वरेन्द्री (सं० स्त्री० ) गौड़ देश, बरेन्द्रभूमि । विख्यात है। बरेय (सं० पु०) सूर्य । बन्न ( स० वि० ) रक्षिता, रक्षक। बरेयु ( स० त्रि०) प्रणयप्रार्थी, विवाहके लिये कन्याको वस्थ (सं० क्लो० । वियने गरीरमनेनेति वृ-वरणे ऊथन् । यात्रा करनेवाला। (तम्यामुयन् । टण श६) र तनुनाण, दक्तर । २ चर्म, बरेश (सं० पु०) सर्वेश्वर, वर देनेवाले । भगवान् ।