पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/६२०

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वरपर वर्ग वरेश्वर (स.पु.) शिव वर्किग कमिटा (अ०सी०) कायकारिणी समिति । जैसे- घरोट (१००) ग्राणि श्रेष्ठानि उटानि दलानि अस्य । काग्रेस परिग कमिटी। . मक, मक्वा । वर्ग (म • पु०) वृज्यते इति वृजि वर्जन घम् । १ सजातीय मरोत्पर ( स० को०) श्वेत रक्तान। ममूह एक ही प्रकारको अनेक वस्तुओका समूह । घरोद-१ वम्बइ मेसिडे साफ झालावार प्रातस्य पर | २ आकार प्रकारमें कुछ मिन, पर कोई पक सामान्य धर्म साम तराय । यहाक सामन्तराजपा राजस्य २१ रखनेवाले पदार्थों का समूह। ३ शब्दशास्त्र में एक स्थान हजार २० है जिसमें उहे जूनागढके ननावको साला से उच्चरित होनेवाले म्पर्श व्यञ्जनयों का समूह २७८) रु० और वहौदा पतिको १२५२) रु० कर देना व्याकरणके मतस यग पाच है, यथा-कवग, चग, टवर्ग पडता है। तवर्ग मौर पयर्ग। फवर्ग कहनेस क, ख, ग, घ, ड, चवर्ग • उक्त मेसिडे साक गोहेन्याइ मा तस्थ ए छोटा कहनेसेच, छ, ज, भाभ, इसी प्रकार यग कहनसेट मा सामत राया अमो यह दो भागो में घर गया है। से 'ग' तक, तवर्ग कहनेसे 'त' से 'न' तक तथा पर्ग यहाके अधिकारी लोग वौदा गायकवाड और जूनागढ कहनेसे 'प' से 'म त पाया जायगा। कचरत प के नवावको कर देते हैं। आदि पाच पाच वर्ण ले कर ही ध्याकरणका वर्ग बना है। परोय ( स० वि०) वर करु कर्मधा०। १ जेष्ठ ऊर, "कवतपाः पञ्चपग' ते धर्म पञ्च पञ्च पञ्च इत्यादि । सुन्दर जाघ । (नि.)२श्रेष्ठ उरुशाली सुन्दर राघों ____ अभिधानम इस समष्टि चा समार्शमें स्वर्गपातालादि घाला ।३सुन्दरा। वर्ग, नानाविग, भूमिर नौपधि वर्ग, अव्यय वग, ब्रह्म । घरोल (स.पु० स्त्रा०) य उलच । १ वरट । २भृङ्गरोल। वर्ग, क्षत्रविर गदादि वर्गका मा उल्लेस देखा जाता है। घराशास्त्री (स० पु०) प्रक्षरत पाकरका पेड़। । (भग्निपु० ३६६ ३७५ अ०) यरीपघी (. खो०) १ मादित्यमता, हुरहुर । २ ग्राहो फलित ज्योतिपमें लिया है, कि अवगक अधिपति शा। सूर्ण, कघर्गके अधिपति मङ्गल, चवर्गक शुक, टवंगके बुध, 1 वर्कर ( स० पु० ) १ हायीका पधन जो लकडोका धना तवर्गके वृहस्पति, पर्णके शनि, य और श वगके अधि हुमा और काटेदार होता है। २ काटा, कील । ३ अर्गल, | पति चन्द्र हैं। इसके द्वारा गणना करनेसे नामादि जाने अगरी। जाते है। चकणा (स० स्त्री०) तरुण छागी, जवाज करी, पठिया। ४ प्रय परिच्छेद, अन्यका विभाग, प्रकरण, अध्याय। यर (स० पु०) वृश्यने गृह्यने इति या आदाने यहुल' | ५आयुर्वेदोक गण । ६ वह चौसूटा क्षेत्र निसको लम्बाइ वचनात् अर । १ युव पशु जवान पशु ।२ मेषशायक, चौडाइ दरावर और चारो कोण समकोग हो। दो समान भेडा वधा, मेमना। ३ डाग वारा। ४ परिहास, अकों या राशियोंका घात या गुणनफल। लीलावतीमें आमोद प्रमोद । इसका विषय लिखा है। इसका उद्देशक पा मन्तव्य वरकर (स.नि.) बहुत तरहका । | निमोक्त विधि द्वारा स्पष्ट किया गया है-- वराट (म० पु० ) वर्षार परिहास अटति गच्छताति सखे नानाच चतुद शानो हि विहीनस्य शत्रयस्य । अच् याप्। १ पटाक्ष । २ तरुण तपनप्रमा, मध्याह्नके पश्चातरस्यान्ययुतसा वर्ग जानासि श्रेदर्गविधानमागम् ॥" सूर्यको प्रभा। ३ स्त्रीक पुचके किनारे लगा हुमा नख' | ' (जीलावती) क्षता इस सूत्रका अवलम्यन कर ६, १४, २६७ चौर १०००५ परीकुएड (स० की.) काशीके एक सरोवरका नाम का पगफल निर्णय करनमें यथाक्रम पूर्वोक्न प्रक्रिया द्वारा यह एक पुण्यता है । काशी देखो। ८१, १९६, ८८२० और १००१०००२५ गशि पाई जाती व रातो --एक तोगका नाम । (कुमारीका १:१७) | मघया भन्यप्रक्रिया : सख्याका लण्ड ४ और ५ ले