पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/६२४

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वात्तम-वर्जनीय वोत्तम (स०ए०) धर्गेषु उत्तम । फलित न्योतिष - राजा अन, मकान, वढाका अन, कुम्हारका राशियांक वे श्रेष्ठ अश जिनमें स्थित ग्रह शुभ होते हैं। मग्न, गणान्न, वेश्यामा जान एव शुदका मान वर्ग पाराशि (मय, कपट, तुला मार )का प्रथम अश, | नीय हैं। स्थिर राशिप, मिह, वृश्चिक, कुम्मा पञ्चम आश मनुमहितामें लिखा है नि उदय वा अस्न अवस्था और धारमा रात (मिथुन, कन्या, धनु मोन)का नवम में सूर्यका दर्शन घन नोय है। राहुमस्त सूय, जल वर्गात्तम कदा नाना । इसके अतिरिका राशियों । प्रतिविम्वित स्य एवं आमएडर के मध्यगत सूर्यका का नाम भी यगोत्तम कहा जाता है। दर्शन नहीं करना चाहिये। बडगाधनेको रस्साको य(मालिक) १ पग सम्बन्धीय। (पु.)२ समारा लाघना, पर्याके समय दौड कर रास्ता चलना पच जलमें सम्म, सहयोगी। - . अपनो छाया देखना त्याज्य है। कामपोदित होने पर भी वर्चो ( स०सी० १ धान्यभेद । २ येश्या, रहो। रजस्वला नाफे साथ दिनमें सहयाम करना घचस् ( स ० को०) पर्चते इति वर्ग (माधातुभ्य'ऽमुन् । भोनन करती हुई रजस्वी नाका दशन करना बह उण ४११८८) इति भसुन् । १ ।।२ मिष्ठः । ३ तज ! हाम करते समय, आह भरते समर पय अमावधान ४ मन। (पु.) ५ चन्द्रमाके पुत्र । - - यैठो हुइ भाग्यों की ओर लक्ष्य करना मार्म जल यचा (स.पु० को०) वचस लायें कन्। १ विष्ठा। प्रदान करते समय देहर्म तेल गाते समय सन्तान २वीमि तेज। प्रमय परते समय ली पर टिनिक्षेप करना पाप है। पर्न स्थान (म. पु०) पाखाना। ए पत्र पद्दन पर मोनन नगे स्नान रास्ते वर्चभ्य (म.नि.) यच से दित गत् । तेनरक। पर भस्मक ऊपर गोवरभूमिम, दल जोते हुए पेतर्म, पतम्बत् (सवि०) १ जीवशक्ति सम्पन्न । समुहाल | पलम, अग्नि में, समानस्पचिताओंमें, पानों पर, पुराने तेजगन् । मन्दिरों में, कोडे द्वारा लगाये हुए मिट्टोके ढेर पर, जिन धस्विन् ( म० पु०) पर्णोऽभ्यास्ताति पचम (मसमाया दिलों में जोवाका घाम हो, उनके अन्दर मूत्रत्याग करना मेधेति । पा ५२११२५) इनि यिनि । १ चन्द्रमा । (वि.) निषेध है। चलत चालते सई हो कर अग्नि, प्राक्षण, २ तेजस्था, योप्तियुक्त। सूर्य जल और देखते हुए पेशाय नहीं करना चाहिये। गिन् (स पु०) अग्येदके अनुमार एक असुरका नाम मुपसे फूंक मार र अग्नि प्रचलित करना मायाको इण्डने इस समूठ सहार किया था। (ऋक् २१४६)। नगी देखना तथा अग्निमें अपचित्र यन्तु डालना वन पिर मायेदमें (०६६५) दूसरी जगा लिखा है कि नीय है। पाय पसार कर भाग तापना नही चाहिये । द और विष्णुने इस निहत पिया था। - शप्याफे नोचे आग रखना निषिद्ध है। मिस कामके रोम (म.पु.) मलरोध । परनेसे आत्माको आघात पहुचे, उसे करना उचित योंदा (स.नि.) शनिद बल देनेगला। नही । सध्याफे समय भोजन करना, भमण परता पन" (म त्रि०)जयतीति पृम बुल। यज नारा, एव शयन करना पाप है। पृषी पर रेखा नही स्था परनवाला। पी चनी चाहिये। मलमूत्रादिसे लिप्त पोका पहाना, पनन (म मी०) पूज ल्युट । १ त्याग, छोदना । २ हिमा. यासन्यगृहमें अपेला शया करना, थेट पुरुषाको मारण। ३ग्रहण या माचरणका निषेध मनाही, मुमा निद्रावस्था, जगाना, रजम्ब ठा ना माध पातचीत नियत। ।।। 13 करना तथा विना निमरवणके या राना पजनाप (म०नि०) पूज यनीयर ! १ धननयोग्य, छोहने | निपघहै।- पोग्य, न प्रहप करते योग्य, त्याज्य ।। निषेध योगा। जल या दुग्धपान करत समय गायना पाप निपिद्ध, मना। ।1 ।। भिम प्रामम विधर्मियोनी मण्या अधिर हो उस बाल्या