पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/६२६

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जिन- ६३७ यर्सिन (स.त्रि०)त्यन्य, त्यागा हुमा, छोडा हुमा।। वनप्रदेशमें या तीर्थादिमें वास तथा एकमात्र परमेश्वरको चर्य (स० वि०) न ण्यत् । पर्जनीय, छोडनेके लायक। आराधना। इसीका नाम सन्यास आश्रम है। वर्ण ( स. का.) पणयताति वर्ण अब । कुकुम, द्वितीय और तृतीय वर्ण क्षत्रिय और वैश्य है। इनके केसर। i लिये शेयोत स यास आश्रमको छोड कर पथमोक्त ब्रह्म वर्ण (स. पु० ) मियने (इति पृ दृषिद्धगुप यनिख चय, गाहस्थ्य और धानप्रस्थ पे तोनों हो आश्रम प्रशस्त पिभ्यो णित् । उण ३१०) स च णित् । १ जाति। ई। एद्भिन्न शुढ़के लिये केवळ गृहस्थाश्रम ही पत ___ज्ञानि चार है, ग्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र। इन लाया गया है। दूसरे किसी भी आश्रम में शूद्रका अधि चार वर्णों वा चार जातियांकी उत्पत्तिके सभ्यधर्म येदमें कार नहीं है। इम प्रकार रिखा है-जब भगवान् पुरुषरुपमें सृष्टि इश्वरको आराधना करना सभी वर्गों का मा करनेको तैयार हुप तक उनके शरीरसे चार वर्णों की आश्रमोंका साधारण धर्म है। इनमेसे जो विष्णुके उपा उत्पत्ति है। भगवानक मुनसे ब्राह्मण, वाहुसे क्षत्रिय स हैं वे वैष्णव, शिवोपासक शैव, दुगा प्रभृति शक्ति ऊरुस चैश्य और पादसे शूट उत्प न हुए थे। साधक शार, सूर्योपासक सौर तथा गणेशोपासक पारख में इन चार वर्णों का पृथक पृथक र्वार। गाणपत्य नामसे प्रमिद्ध हैं । यह पौराणिक मत है। बतलाया है। ब्राह्मण भत्रियादि चारों वर्गों को शास्त्रके चार वर्णों के विभिन को सम्बन्ध विष्णुपुराणमें सादेशम चलना होता है। कहा है कि ब्राह्मण दान घरे, घेदाध्ययनपरायण होये भगवान मनुने चारों यर्णो दा पृथा पृथक्, कर्म तथा यज्ञादि द्वारा देवताओंको मर्चना परे । ब्राह्मणको निदिए किया है-त्राह्मणका धर्म अध्ययन | नित्यादका होना पड़ेगा तथा अग्निपरिग्रह करना होगा। अध्यापन, यना, याजा दान और प्रतिमह । क्षत्रियका [ जाविकाके लिये ये याजन और अध्यापन करे तथा जिस धर्म-प्रजारक्षा दान यहानुष्ठान अध्ययन तथा नृत्य व्यक्तिने वैध उपायसे धन उपानन किया है। उसीस गीत और धनितोपमोगादिमें आत्यतिक अनासक्ति । "यायत प्रतिग्रह है। ब्राह्मण सोंके उपकारी बने, श्यका धर्म पशुपालन दान, यश, अध्ययन, याणिय! कभी भी किमीफा महित या अनिष्टाचरण करे । सब कुप्तादयत्ति और रूपिम । शूदका धम-अस्याहोन भूता पर मेलोस्थापन करना हा प्रामणका परम धर्म है। हो पर उत्त ताना वर्णों की शुरूपा । दूमरेके पत्थर भया रत्न दोनों ही घस्तुको ममान नादाण, क्षत्रिय घेश्य मीर शुद्र सभा वणों को शास्त्र | सममें। ऋतुकारम पत्नीगमन करे । शासा, यथाविधि भाश्रमा होना पड़ता है। उनम । माह्मण उपनीत हो कर घेदाभ्यासमें तत्पर होवे । से ब्राह्मणये आश्रम चार है, ब्रह्मचय गाह रध्य, इस ममय उहे ब्रह्मवयका अपमान कर एकाग्रमनस घानमाय और सन्याम । उपनयनके वाद मिनन्द्रिय हो गुरुगृहम वास करना होगा। इस समय चे शोर और पर गुरुगृइम पास और सायेदका अध्ययन करना होता थाचारवान् हो कर गुरुकी शुश्रूषा करे तथा नियमाय है इसी नाम ब्रह्मचर्याश्रम है । यदास्पयन समाप्त हो कर पवित चुद्धिस घेद पढे। दोनों हो शाम समा परफे विवाह परनप वाद स्वधर्माचरणपुर सर गृहस्थ दित हो पर अग्नि यौर सूयकी उपासना तथा गुरुको होना पड़ता है। इस आश्रमका नाम गाईस्थ्य है। मभिवादन करना होगा। गुरु यदि पदे हों, तो आप सनम्तर पुलोत्पारन के बाद धन बाम करना, मरएपय मो खड़े हो जाय, यदि पे बैठे तो आप भी शिनासन फगदि पाना सौर इश्वरकी आराधना करना यही हुआ| पर बैठ जाये । कमी भी गुरुफे प्रतिकुलरावरण न करे। पानप्रस्थाश्रम। इसके बाद गृशादि सभी वस्तुओंका गुरुक मादेशसे गुरुकी ओर चैट कर अनन्यचित्तमे घेद गरिन्याग कर मुएिडत मम्तर पर गैरिक कोपीधाध/ पाठ करे । उनकी मनुमतिरेर भिक्षाग्न भन्षण करे। पर दएडामएलु पर मिषायत्तिका मालम्या आवाय के स्नान करने पर पोडे आप म्नान परे । गुरु Vol x 160