पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/६२७

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वर्ण म प्रश्न के उनग्मे नाग्ने कहा था, 'राजन ! वर्णो- समाप्त करके पशुपालन और कृषिकर्ममे रत है, उन्हीका में कुछ विशेषना नही है । यह समरन जगन् ब्रह्ममय है। नाम वैश्य । ब्रह्मा लबोंके सृष्टिकर्ता है। ब्रह्मसृष्ट सभी एक ब्राह्मण | ____जिन्हें पाय अपायका कोई विचार नहीं है, जो अप. है, परन्तु कर्मानुमार एक पक सम्प्रदाय एका पक वर्ण वित्र अवस्थामै रह कर जिम वि.सी कर्मम जीविका हो गया है। जो सब ब्राह्मण स्वधर्म का परित्याग कर निर्वाह करते है, जो वेदार्जित है, सदाचारहीन हैं, वे कामभोग रत रहने थे, जिनका स्वभाव कठोर था, जो हो शान हैं। ( महाभा० और पमपु० सार्गवगट ) क्रोधी, प्रियसाहसो और लोहिनाङ्ग थे, वे ही क्षत्रिय गुप __चतुर्वाणके धर्मकर्म सम्पन्यीय विधि व्यवस्था मन्वादि थे। जो कृषिकर्मम लिप्त रद्द कर उसीसे जीविका स्मृतिमहिनामे तथा सभी पुराणोंमे सविरनार वर्णित चलाने लगे, गवाटि पशुपालनमें आमक्त हुए, जिन्होंने है, बहुत बढ ज्ञानको कारण उनका उल्लेख यहा पर नहीं म्वधर्म का परित्याग किया, जिनका शरीर पोनवर्णका किया गया । नरसिपुगणके ५६वं अध्याय में, माण्डेय. था, उन्हीकी वैश्यजानिमे गिनती हुई थी। फिर पुराण के मदालसा उपास्यानी, म पुराण के २२ और जिन्होंने हिमा और असत्यका आप्रय लिया, जो 3रे अध्यायमे, पागण स्वर्गवण्ड २५.२६ और २७ किसी भी कर्म ने जीविका निर्वाह करने लगे, जिन्होंने अध्यायमें, वामनपुगणके १४वें नथा गरुडपुराणके ४६ शौचाचार त्याग किया तथा जो अत्यन्त लुब्धावमावके । वें अध्याय चतुर्वर्णका विम्तुत विवरण देगा जाता हो उठे, जिनका वर्ण कृष्ण था, वे हिज होते हुए मभी शूट याहलाये । वर्ण (सं० पु०) १ गजचित्र रम्बल, दावोरी मृल । पर्याय-- इस प्रकार कर्मानुसार ब्राह्मण ही विभिन्न वर्गों प्रवेणी, आरतरण, परिग्नोम । २ जुध, कधरी, कंधा । विभक्त मुए। चारों वर्ण के लिये ही वेदवाणी कही गई। ३ पदार्थो के लाल, पीले आदिका भेद, रंग। यी। लोभ और अज्ञानमे पड कर बहुतोने उस वाली । यह वर्ण वा रग अनेक प्रकारका होता है, जैसे-ज्येत वाणी को गो दिया था। जो धर्मतन्त्रम एकान्त आसक्त पाण्ड, धूसर, कृष्ण, पोत, हरित, रक्त, गोण, अरुण, पाटल थे, वे ब्रामो वाणोको भूले नहीं नया जो वेदावलम्बन श्याव, धून, पिङ्गल तथा कवंर । ( अमर ) सुन्तबोधके वेदवोधित नित्य नैमित्तिक नियम और शौच मदा मतसं छठे महिनेमे गर्भस्थ बाल सका वर्ण होता है। चारादि माधुसेवित पथमें रह कर ब्रह्मस्पष्ट देवप्रति. ४ यश, कीत्ति । ५ गुण। स्तुति । ७ वर्ण, पाद्य परब्रह्मज्ञानको प्राप्त हुए थे, वे ही ब्राह्मण हुए। सोना । ८ व्रत । वति मिद्यते इति वर्ण वन (पु० को०) ६ भेट, प्रकार । १० गीतकाम । २१ चित्र, तम नारदने मान्धाताके प्रश्नोत्तरमे चार्ग वर्णको इस वीर। १२ तालविशेष । १३ थनगग। वर्गात भियने प्रकार लक्षण बनलाया, जैसे-जो जातकर्मादि दश अनेनेति वर्ण घन । १४ रूप। वर्णयति वर्ण-अन् । प्रकारके संस्कार गम्झन हैं, जो शुचि और वेदाध्ययन- १५ अक्षर । वर्णयते रज्यने पनि वर्ण-घन । १६ विले. सम्पन्न है, जो शौचाबाग्मे रत रह कर यजन याजनादि पन । १७ कुछ म, कमर । पटकर्मों में अवस्थित है, जो नित्य गुरुप्रिय, नित्यवती वर्ण दो प्रकार होना है, ध्वन्यात्मक तथा अक्षरात्मक । और सत्यरत है, वे ही ब्राह्मण कहलाते है । सत्य, दान, प्राणियोके मूलाधारमे ए नादी है। यह नाडी सांपकी आनृश स्य, बद्रोह, रूपा, घृणा और तपस्या ये सब जिनके तरह कुण्डलीभूत है। वह सर्वदा मूलाधारके मध्य निकट सबदा विद्यमान हैं, उन्होया ब्राह्मण कहते हैं। फुण्डलाकारमें रहना है, इस कारण उसका कुण्डली नाम जो वेदाध्ययन समाप्त करके क्षत्रियोचित कर्मका पड़ा है। कुण्डली चन्द्र सूर्य और अनलहरिणी, हिच- मदा किण करते हैं, जो टान नहीं देते, पर दान देने है। त्वारिंशद्वर्णमयी अर्थात् भूनलिपिमन्वशालिनी तथा उन्हें क्षत्रिय कहते हैं। जो पवित्र मावम वेदाध्ययन पञ्चागद्वर्गमयो अर्थात् मातृकावर्ण खपिणी है। यह