पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/६३८

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वर्णाश्रम-वर्णासा ६५३ तो वह जूठा गादि पानेके सिरा शूद्राति द्वारा जोषिको उत्तय बताया गया है। सपो के ७ प्रकारके धनागम धम निर्याह कर मक्ता है शूद्र यदि अपनी गृत्ति द्वारा पुत्र सगत हैं, यथा-दाय प्राप्तधन मित्रमे लब्ध धन F" करवादिफे मरणपोषणमें अक्षम हो, तो वह कारकरादि और घान्यादि गृद्धि र धन, सपि वाणिज्यादि कर्मयोग फर्ग द्वारा जोविधा निर्वाह करे, जिम कर्माचरणसे द्विज | म लय धन तथा मत्प्रतिमह रम्ध धन। इन सात को शुश्रूषा हो मक्ती है, वैसा ही कारर्म और मिला | उपायो मे प्राप्त धन धेय कहा गया है। विद्या शिल्प कर्म करना चाहिये। कार्य सेवा गोरक्षा, वाणिज्य, थोडे में मतोष मिक्षा विपन्न ब्राह्मण ममीसे दान ले माते हैं। ब्राह्मण वृत्ति तथा सूदमे धन लगाना, ये सब जोयिकाके कारण भारत नर और अग्निको तरह पवित्र हैं। आपत् । हैं। ब्राह्मण वा क्षत्रियको कभी भी सूद पर रुपया नहीं काम ग्रामण यदि निन्दित व्यक्तिका याजन अध्यापन लगाना चाहिये। शितु धमक धमें थोड सूद पर और प्रतिप्रड करे तो कोई पाप नही होता । भूयमे यदि किएकर्माको रुपया दे मरते हैं। धे मर रहे हों, तो उस समय चे नीच जातिका भी भग्न | प्रिसेनासे यदि शटको जोविका न चले तो यह प्राण र मरते हैं। आकाशमें जिस प्रकार पट्ट लिप्त क्षवियको सेवा, इसके अभावमें घेश्यकी मेगा करके तही होता उसा प्रसार उहे भो क्सिो पापी माझा जाविका निर्वाह कर सकता है। म्यर्ग और जोत्रिका नही रहती। लाभार्थ ब्राह्मण शूदके आराध्य है। शृट त्राह्मणसेक प्रभक्षित ऋषि मनोगत अपने पुत्र प्राण लेनेको यह विशेषणमात्र हो सतायता ठाम करता है। ब्राह्मण तैयार हो गये थे तथापि युतप्रतिकार उनका उद्देश्य सेवाके अतिरिक्त शुद्रका और मभा काय निकल है। होने के कारण ये पापमे रिप्त न हुए। वामदेर पिने ब्राह्मण शूद्रभृत्यकी परिन, सामथ्य कायनैपुण्य तथा क्षुधात हो कर प्राणरक्षा के लिये कुत्ते का माम ar लिया उसके परिवारवर्ग को सख्याको विवेचना करके वेतन स्थिर रे। ब्राह्मण आधिा शूद्रके भक्ष्याथ उछिष्ट था इसमें ये पापलिप्त न हुए। मतपत्र प्राह्मण आप कारों अतिनिन्दिन काम करने पर भी पापमा जन नहीं मन परिधानार्य जीर्ण पत्र, शयनाथ नीण शय्या तथा धान्यका पुलाक प्रदान करे। होना ग्राह्मण निन्दताध्यापन याजन और प्रतिग्रह न लहसुन आदि अपदव्य पानेस शूदके पाप नीं होता । उपनयनादि सस्कार तथा अग्नि तीनो में प्रतिग्रह हो अति निरष्ट है। उपायन सकार होन दि यश धृष्टको अधिकार नहीं है। किंतु पाr में मस्कृतात्मा ग्रामणो याजन और अपन फर्म यमादि कार्य निपिद्ध नहा है। धर्म शूद्र धर्मेन्दु हो नित्य तय है। आपत्कारम निट जानि नाशय जमा से भी प्रतिग्रह विधेन है। ब्राह्मए जप और कर ग्रहणादिक अनुष्ठेय पञ्च महायज्ञादि मात्रको त्याग कर सस्ता है। अस्याान्य शट सदरमानुष्ठान जिम होम द्वारा शनितिर जातिका याजनाध्यापन जनित भावमै प्रवृत्त होता है उमोक अनुमार इगर में माय पाप नए हाता है । वयत्ति द्वारा जीविका निहम अक्षम और परलोको म्वग लाम होता है। राजाश चाहिये, होने पर ब्रह्मण उपगातो आदिसे गिलोयत्ति द्वारा कि घे शूद्रको अथ मार करने न द । पोंकि शूर धन जोकि निमा परे । गाभिमन् प्रतिप्र से शिल मदसे मत्त होकर ब्राह्मणी अरमानना कर सत्ता है। पृत्त भ्रष्ट है गौर शिरत्तिमे उति और मोघे इमासे शुदका भय सञ्चय निन्दनाय है। है। धनामावमें अपमान ब्रह्मण धान्यपत्र हि तान वर्णाश्रमयन् (स. नि०) वर्णाभ्रम नरय मतुप मस्यय । और काश्यादि निर्मिन द्रव्य क्षत्रियमे माग माने । | वणाश्रम विशिष्ट । जोतो हु जमीनसे दिना गोना पमीना अनाज मानणामिन् ( स०नि०) वर्णाश्रम अम्त्यर्थे नि । यणा करना मला है। गाय धरे मेडे, हिरण, पान और श्रमधर्म युक्त। सिद्धाग्न इनसे पहले चारका अपेक्षा पिछले दोका दान वर्णामा-मासामके अतर्गत पर नदी। valI 162