पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/६५९

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से उत्तर नहीं दिया, वरन् धीरे धीरे जलन्ने मध्य ! ने यहां अपना अपना शासन-प्रभाव विस्तार किया था, प्रवेश किया । बरवाहेने सोचा-यह बछडा नित्य यों ही इसमें संदेह नहीं। चला जाता है। इसे चरानेका कोई फल मेरे हाथ नहीं दाक्षिणात्यके विभिन्न मुसलमान-राजवंशोंक वाद, आता। आज मैं इसके पीछे पीछे इनके मालिक्के पास | जिस समय महाराष्ट्रको शक्ति प्रयल हो उठी थो, उम चल कर अपनी चरवाही वसूल करूगा । इस तरह सोच ' ममय यह धान महाराष्ट्र अभिनयका रंगस्थल हो रहा विचार कर उसने उस बछडे की पंछ पकड ली। बछडा था। अंगरेजो अमल में यह स्थान नागपुर जिलेके धीरे धीरे जलके अन्दर घुमने लगा। वह भी उसके पीछे अन्तर्मुक हो गया है। यहांके विचार-विभागका सम्बन्ध पोछे उम्म अगम्य जलराशिमें समा गया। । नागपुरके साथ हो गया है। पेन्धारी दस्युदलके उप- चरवाहेने जलके अन्दर जा कर एक अत्यन्त सुन्दर द्रवोंने यहां अधिवासिवर्ग वहुन पीडित हो उठे थे। मन्दिर देखा। उस मन्दिरसे निकल कर एक दिव्य पुम्प' इस समय यहांके प्रायः प्रत्येक घरके चारों ओर किले की उसके पाम आये और उन बछडे को बांधने लगे। चरवाहे, तरह मिट्टीको ऊची दीवारें स्थापित हो गई है। ने बडी नबनाने कहा,-प्रभो ! मैं नित्य इस बछडे नागपुर टेखो। को अपनी गोमण्डलीके साथ चराता हूं, परन्तु आज नागपुर, नन्दा, दराबाद प्रभृतिके साथ यहााध्यापार तक मुझे इसकी चरवाहो अझ न मिली। मै यह भी न । वृय हो चलता है। हिंगनघाटकी सपरिक वाणिज्य- जानता था, कि हनछडा सिका। आज मैं इसीका के लिये प्रसिद्ध है। वनभेलो स्टेट रेलपथ पव प्रेट पना लगानेके लिये इसके माथ साथ यहां तक आया इण्डियन पेनिनसुला रेलपथ इस जिलेसे हो कर जाने- है। आज मेरे परिश्रमके फल मिलने चाहिये। इस पर के कारण यहां व्यापार करनेकी यही सुविधा हुई है । उस महापुरुपने मुस्कुरा दिया एवं उन्होंने कुछ फल मूल। सोनगांय तथा हिंगनघाट के नाना स्थानों में प्रथमोक्त ला कर उसके हाथोंने रख दिया। वह इस क्षुद्र रेलये पथके दो एवं पालगाव, चों, देवगिरि, पावनाइ वस्तुकी प्रापिसे मन्तुष्ट नहीं हुआ। वह विरक्त हो तथा सिन्दी नामक स्थानो में द्वितीय लाइनके कई कर पुनः उस बछडे की सहायतासे जल के बाहर आया। स्टेशन इस जिले में अवस्थित है। रूईके अतिरिक्त यहां दूसरे दिन चरवाहा अनिच्छाने ही एक बार उन फल तीसी, चमड़ा इत्यादिका व्यापार होता है। मलोकी ओर दृष्टि निक्षेप करके बहुत ही आश्चर्यित २ उक्त जिले के मध्य में स्थित एक तहसील। यह हुथा। उसने देखा-वे फल मृट किनी ऐन्द्रजालिक अज्ञा० २०३० से ले कर २१.३० तथा देशा० ७८ शक्तिके प्रभावले सुवर्ण में परिणत हो गये थे। पहले ! १५ से लेकर ७८ ५६ पू०के मध्य अवस्थित है। भू. जब कभी कोई इस पुष्करिणी मे तंडुल उत्सर्ग करता था. परिमाण ८०६ वर्गमोल और जनसंख्या १५२५६५ है। तब वह पका अन्न पाता था। पीछे एक दिन किसी ; इन तहसीलमें तीन शहर व , देवली ओर पुलगांव एवं ध्वक्तिने अन्नव्यञ्जनपूर्ण थाल उत्सर्ग नही किया, उस १४ गांव लगते हैं। इसमे ५ दीवानो और ११ फौज. दिनसे अब उस पुष्करिणीसे वैना प्रसाद नहीं पाया। दारी अदालत है। जाना। 3 उक्त जिलेका प्रधान नगर और विचार-सदर इस तरहकी टासंभव किम्बदन्तीके अतिरिक्त वहांके यह अक्षा० २०४५ उ० तथा देशा० ७८.३७ पू०क विशेष कुछ इतिहासका पता नहीं चलता। महामारतीय बीच पड़ता है। जनस स्या ६८७२ है । इस नगरमें एक भीष्मक गजाके राजत्वकाल बाद इस स्थान पर क्रमशः मिडिल इंगलिश स्कूल, एक गर्ल स्कूल, तीन अस्पताल दाक्षिणात्यके विभिन्न देशोंके राजाओंका अधिकार हो और एक मवेशी अस्पताल है। गया। इस स्थान में कोई स्वतंत्र राज्य स्थापित नहीं नुया, वा-मध्य प्रदेशमे वहनेवालो एक नदी। यह नदी नाग- किन्तु आन्ध्र प्रभृति दाक्षिणायके सुप्रसिद्ध राजवंशियों । पुर तथा वेतूलके मध्यवती सनपुरा पर्व तसं निकलती