पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/६६२

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वर-पार १७७ पेरिप्लाम Barbiniron द म भातिका परिचय मिगदूमरे देशयामियोंको 'माजिमा' नामपे पुकारते हैं। in पाश्चात्य भौगोरिको मिधु नहरे मुहाने आम अरवो पारसो अथवा मुगल रोग भारतक प्राचीन पाम प्रदेशे नया मारनीय कुछ प्रकारो ने महाराष्ट्र अधियामिपाको अयक्षा र उहै 'काग भाभी बहते देशो एक विशेष भागो ग्रानोन पर जनपद कहा है। थे। पाश्चात्य यमित सम्प्रदाय तथा उरङ्गन पुगर हि पात्रोक्त पर जनपद पर तत्र अपन | गण भी भारतामिया 'काला आदमी' कह कर हास भाषा भी प्ररित थी। यथा-- घृणा करते हैं। " राषन्त्याला मानवक्या ।" परक (स० क्लो०) पाठार स्वार्धे वन । च दनभेट, पर (प्रातन्द्रिका) । प्रकाराचदन | पयाय- रोत्य, श्वेत घर शीत, हर लोग प्राचीन रोष जातिका इतिहास पढ पर सुगघि पित्तारि सुरभि । इस गुण मानल, नि, जान माने कि कार (Batherian) नामक पक। पफ वायु पित्त पुष्ठ कण्ड सौर प्रण तथा विशेषत दुप वानिने गेम माम्राउय तहम-नहम कर रतदोषनाक माना गया है । (रामनि०) डाग था। उम या नाशि यामधान मम्मयता । यक्षरा ( स० स्रो०) पुषस्येर भारतिररस्यन्या इनि पशिशम मीर मध्य एशियागा। प्रोक रोग Barlimros घर मच राप। १ पुष्पमेद। कभेद । वा इनि गरसे कि यनि या यम्नु हो ममझने थे। जो शाद रानीति राक। ३ मक्षिाामेद, एक प्रकारको प्रल भाषा न। जामता था उसे घे पार' कहा काने मषम्वो। थे। प्रोग्यामीको तह गेम लोग भी औरतो घर घरी (स.सी.) यर्पर टाप पक्षे पित्वान् टीप।१ करने गे। इस तरह नक हण आ-ि अमर नातिया! वनतुरमी। पर्यायकयरी तुङ्गो खरपुष्पा, अनधिका भी पाशात्य रोममे यार कहलाने लगों। । गमगया क्यरा, घरपुस्ति। (भावप्र०) (पु.). __ वैदेति सापक Rarharos नदको तर पुराणानुसार एक मुनि नाम (लिङ्गपुराग्य ७४७) विभिन्न जानित्र मध्य मा ऐमी एक म्यनन भिधा पपरोक (स.पु.) गृणुन इति वृक्ष परणे ( वृना दे प्रारित है। गहनियों के Contile Tदम सक दोन र चायासस्य । उप ४१६) इति इान् द्विचन अभ्या एयरिमोफे मय 'ग्लेज' शरदप्ते द्विजस्वहीन व्यक्ति सस्य रुगागम च । १ मााणयटिका गृथ, भारगो । २ समझा जाता है। इस प्रकार पिर शरद भी इस्लाम कुटिठ करतल । ३ गधा बनतुलमा ४ महामार। धर्मम अविधामो व्यक्ति मात्रा निशा। चीनी लोग घर्ग (म. स्त्री०) वारी यनतुलसी। पन या इससे पय भोट जानि ग्या शसे वैदेशिक यार-चैस राजपूनाका एक गाग्वा । पेलोग रामगे समिति करते हैं। अरवियों का विश्वास है कि वाणिज्य के पहले दुभियपेरा नामक स्थानसे यरियारमिह और ये अभिप्रायमे जिन मय भारतीय पणिोंने भरवा भाषा चालसिह अघोन फैजाबाद घरमा कर बम गये मौसी : येरव नही जाने दरगित यायो भाषा हैं। यरियारसिहके अधीनस्थ दलम व्यार शाम्या धारण नग कर माने हैं ऐम मारतवासियों, एवं चाहसे चाहशाखाको उत्पत्ति है। अधया स्पy उधारण गद्दी रोगाले कीनदामाको वे कहते हैं-दोनों भाइयों को स्वर शाहने फैद कर वळाराम् र हुनुद कही थे। पाश्चात्य पहिनाको लिया था। फैदसे छुटने के बाद स्वप्न होने के कारण दोनों धारणाशिमोक' वरोद सस्हन परवराह भूगर्म से देवप्रतिमा उठाकर परिश्रम राठ पररान का अनुमान है। पारा मे घु घराले बालपारी। यतर्गत ताबा नाम स्थानम रे गये और यही उली या पाडी असभ्य जाति माझो जाती है । भरवको' उस देयमूत्ति की प्रतिष्ठा दी। आज भी दोनों शाखाक घोड उसके भासपास स्थानाफे भाश मुमलमान ऐसे । लोग इम निको पूजा कर रहा है । जव अयोध्या सूर्य मगुपको वामम पहत हैं। ये अरबके वालिदोक र वशीय ठाकुर मरदागी भयो पासे भगा दिया, तब ___Vol x 170