पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/६६३

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६७८ वधि-वर्ण उनके सरदार पिलाजी सिंदेने धेगमगजके अन्तर्गत जैसे-जम्वृ पक्ष, शाल्मलि, कुश, कोच, नाक तथा पुष्कर। गमघाटमें एक और पवित्र देवतीर्थ स्थापन किया। इन सातों दीपोरे मध्य फिर पकाएक द्वीपका विभाग भी दूसरी आख्यायिकासे पता चलता है, कि जयपुरके दक्षिण विभिन्न विभिन्न नाममै विमक्त है। उन्हीं विभिन्न पश्चिमस्थ मुगी पाचन या पाचनपुरमें वे रहते थे। यहां भूमिभागों के नाम वर्ष हैं । बाँके नाम संस्थानविवरण, उनके राजा शालिवाहन राज्य करते थे। यहामे चिता- परिमाण एवं उनके अधिवामियोंता वृत्तान्त फ्रमसे नीचे वनकारिया नामक स्थान आये और वहांसे भरजातिको | वर्णन किया जाता है। विनाडिन कर दिया । एवं कनोजराजको फन्या पमिनी श्रीमद्भागवनमे लिया है कि, प्रियव्रतके रथचक्रमे को हर कर दिल्लीश्वरके हाथ दे दिया। इमी पारि- मान लाइयों को उत्पत्ति हुई। ये सानो पाइयां हो सम्य नापिकमे उन्हें १६ कोसकी जागीर मिली थी। पा पर मात ममुद्रों में परिणत हो गई। उन्हीं सातों बचार लोग कन्या पैदा होने पर प्रायः ही उसे मार मागगेंके द्वारा हो पहले लिग्ये गये जम्बू प्रभृति सात देते हैं जिससे इस कन्याके विवाहमें उन्हें बहुन फट द्वीपोंकी सृष्टि हुई। ये सब द्वीप समुद्रोंके चारों ओर भुगतना पडता है। वे साधारणतः पालवार, फच्छवाह, | फैले हुए हैं। उसी तरहसे समुद्रोंके याहर भी एक एक कौशिक आदि पन्यायाने विवाह करते है। घलियाके समुद्र है। इन समुद्रौके नाम लवणोद, इक्षु रमोद, चार लोग उन्जयिनी, हैहयवंगी, नरवानी, फिनवार, सुरोद, वृतोद, क्षीरोद, दभिजल, दुग्धोद एवं शुद्धोद हैं। निकुम्भ, किनवार, मेनागार और खाटियोकी कन्या लेने ये सब सागर प्रथमोक्त ममुद्रोंये दादर असंकीर्ण रूपमें तथा हयवंशी उज्जयिनी, नरवानी, निकुम्भ, विपेन, बाई । दूर दूर तक फैले हुए हैं। ___ और रघुवशियोंको कन्या देते हैं। प्रियव्रतनी भार्याा नाम यहि मती था। उनके दिल्लीके आस पास चेर नगरसे वे आये हैं। इसलिये सात लडके थे। वे सातों ही सच्चरित्र थे। उनके नाम- साजमगढमे वे लोग छत्री या भूमिहार कहलाते हैं। अग्नीध्र, इध्मजिह, इध्मचाइ, हिरण्यरेता. घृतपृष्ट, मेधा. सग्दार गौरादत्तने (१३३६-१४५५ ई०) उन्हें आजमगढ़ तिथि तथा योनिहोत्र । इन सानों पुत्रोंको प्रियव्रतने एक लाया था। एक द्वीपका अधिकारी बनाया। पचि (नं० वि०) वृ (मृदभ्यां विन् । उण ४१५३) इति विन ।। प्रियव्रतको कीर्तिवर्णनप्रसंगमें प्राचीनकालमें इस वस्मर। तरहके श्लोक गाये गये थे कि, एक ईश्वर के अतिरिक्त और चवर (सं० यु०) बाहुलकात् दूरच । वृक्षविशेष, दवूल । फोन ऐमा था. जो प्रियव्रतके कार्यों का अनुकरण कर पर्याय-युगलान, कण्टालु, तीक्ष्णकण्टक, गोश्टङ्ग, पंक्ति । सकता ? उन्होंने अन्धकार दूर करने के लिये भ्रमण करते वीज, दीर्घण्ट, कफान्तक, दृढवीज, अजमक्ष । गुण-- फरते अपने चकान द्वारा पोद कर सात समुद्राँकी सृष्टि पाय, उग्ण, वफ, कास, आमरक्त, अतीसार, पित्त, दाह की। वे विभागक्रमसे हीप रचना करके पृथ्वीका संस्थान और अर्शरोगनाशक । निर्णय पर गये है एवं प्राणियों की विपद् या असुविधा वर्प (स० पु० क्लो० ) वृष्यते इति वृषु सेचने (अज्यिधौ. दूर करनेके अभिप्रायसे नद, नदी, पर्वत, वर्ग प्रभृति द्वारा भयादीनामुपसख्यानम् ) इति अव अथवा बियने प्रार्थ्याते प्रत्येक द्वीपकी सीमा निर्देश कर गये हैं। इति वृ-म । वृ तृ वदि इनि कमि कपिभ्यः सः । उण ३१६२) प्रियवत यथासमयमें परमाथचिन्तामें निमग्न हुए। १ वृष्टि, जलवर्पण । २ किसी द्वीपका प्रधान माग, जैसे पिताकी याज्ञासे पुत्र अग्नीध्र धानुसार जम्बू द्वीप. भारतवर्षे । ३ पुराणमें माने हुए सात द्वीपोंका एक वासी नजाओंका बालन पालन करने लगे। अग्नीध्रने विमाग । अप्सरा पूर्वचित्तिका पाणिग्रहण किया । पूर्वचित्तिके पौराणिक भू-वृत्तान्त पाठ करनेसे जाना जाता है कि, गर्भसे राजनि अग्नीध्र द्वारा पुत्र उत्पन्न हुए । उनके पृथ्वी सात द्वीपोमे विभक है। उक्त सातों द्वीपों के नाम ! नाम, जैम-नाभि, रिम्पुरुष, इरिवर्ण, इलामृत, रम्यक,