पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/६७२

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वर्षप्रया ६८७ है । जाम और यमनम चतुर्थ, पष्ठ सप्तम, अएम, विचा। माथ कलह और गुप्त शत्रुकी वृद्धि होती है, कि तु द्वादाम मचारिन हान होने अथवा उसमें पाया। शनुम अर्थराम होनकी सम्भावना होती है। योग या दृष्टि रहासे अशुभ हाता है। नमकालमै प्रहगण तयादि द्वादश भारस्थ हो कर जैसा फल उत्पन्न करता है, यसप्रवेशकालम मा वह सब ___ मम ओर ना इन दोनों लगनोंसे उक्त स्थानको छोड । वैसा हो पर देता है। अथात् शुभग्रहोंक में ना अन्य पिमा गृहमें जामलग्न सालिन होसे शुभफर- त्रिकोण रवि और मङ्गला उपचयों पर शनि तृतीय का आधिषय हाता है। किंतु यद मचाठित ग्न नम पष्ट, पकादश और द्वादश स्थानम रहनम शुभफलप्रद लग्नसे शुभमानन्ध हो करणलग्नसे अशुम गृहगत होन होता है। सवपके प्रथमार्टम शुम पा शपाई में अशुभ होता है चपालग्नसे आरम्भ फरक द्वादा राशि द्वारा और यदि वह जमरजग्ने अशुभकाम्य हो र यालग्न द्वादश मामा फल स्थिर होता है। जो जा ग्रह यक्ष से शभगृागत हो, तो उपके प्रथमाईम अशुभ एव । लग्नम रहता था वपलग्नदो दम्नता है, प्रथम मामा शेषाद में शुभ होता है। मगठित जमलन चतुर्थ उसका दिया हुआ पल भोग होता। इस प्रकार नो किंवा सप्तम गृहगत हो कर यदि कोड शुभ प्रयुक्त हो । जो ग्रह द्वितीय तृतीय इत्यादि गृहमें रहता है माया तो प्रतिभाषसे अशुभ न हो कर वर शुभ होता है।' उमौ सब गृहको देवता है, द्वितीय, तृतीय इत्यादि मास यह लग्न रनियुक्त होने पर भी शुभफरराम होता है। । म उन सब प्रहौका दिया हुआ फर हुमा करता है। जम वपरम्नमें जन्म न समार होने मम्मान | गृहम किमी प्र.फा योग या दृष्टि नहीं रहता उस मामर्म अपत्य राज्ञप्रसाद और धनलाभ, प्रताका वृद्धि गरार ! उसा गृहाधिपतिकी स्थिति आर शुभाशुभ सम्य । अनु का पुष्टि तथा पालना नाश द्वितीय स्थानमें होनेसे। यायो फल होता है। सम्मान, यश गर्ग, वधु सुख एन स्वास्थ्य लाम ____ वालग्नसे द्वादश गृहक निस जिम में मङ्गः तृतीय स्थानम होनम 11 उत्माहम धन, यश गौर। और शनि रहता है, उसी एण्या मास पीडाचा मन सुखराम धमकी वृद्धि शरारकी धुधि पध राजसम्मान | ए होता है। जामकालीन न्द्रमे प्रदत्त शुभाराभ लाभ, चतुर म्यानम होनस पास शत्रु मय, स्व । फलका निरूपण करके देखना होगा कि कौन कीन वर्ष मनॉक माथ कलह मनस्ताप ननापत्राद और मन । रिटदायक है। उनमेंस यदि किसी वर्ष में बालान सचा पट, पञ्च स्थानम हानमै पात्मन, धन आर राज | लित नम्मलान और उनके अधिपतिगण पापयुस वा प्रमा- लाभ, प्रतापद्धि ती धर्मो नति पष्ठ स्थान में होने दृष्टि किरा अशुभ गृहगत हो तो उस वर्ष मृत्युको से मात द्धि, रोग चोर या राजभय, काया और अर्शनाश, मम्भावना रहती है। तथा दुद्धियात अनुताप सप्तम स्थान होनेसे पुत्र पर्षाधिपानयन वर्षप्रवेशक वर्गका अधिपति कौन फलन मित्र और अधानाश शद्धि , परद, दूरयाता प्रह है यह स्थिर करके फलाफल का निर्णय करना होता पय उत्साहभरा गम स्थानम होनेम्म शनुमय धर्म मार है। यपाधिप स्थिर करने जानेमें विरातिपनि कौन कौर अर्थषय परहानि, रोग, शोक विपद या मृत्यु सम स्थान प्रा एव उससे कौन ग्रह परवान् है यह निर्णय में होनस अर्यप्राप्ति, धमा ति पुन क्लय वधु यशो , करना पड़ता है। जब दिनमें प्रवेश होता है। तय न लाम पर भाग्योन्य दशम स्थानम होनेमे सोमाग्य पद प्रयेशलग्न मेप होनेमे रवि, वृष होसेशक मिथुन हाने और कार्ति ठाम तथा पराममको पृद्धि एकादश स्थानमं! सशनि, कपट होनेमे शक्र, मि ह होनेस वृहस्पति, कन्या दोसे मनस्तुष्टि म्वास्थ्य समिन पुत्र राजाश्रय, हए । होनेसे चन्द्र, तुला होनेस बुध और वृश्चिक होनसे महल यदि मौमाग्य और वाहनादि लाम और द्वादश स्थानमें निराशपति होता है। रात्रिमें वषप्रवेश होनस वर्ष होस प्ययाधियय ऋण या कारावास, रोग, मजनके । प्रधेश लग्न पद मेप हो तो य,इस्पति तथा व.प, पण