पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/६७९

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वलदपुर-बलभीराजवंश

मिलिटरी विभागके बहुतसे बंगरेज-कर्मचारी रहते हैं। वलमीराजवंश-सुराष्ट्रका एक प्राचीन राजवंश । राष्ट्र- विशालपचनले यह स्थान दीन मील उत्तरमे अवस्थित के (वत्तमान काठियावाडके ) अन्तर्गत, भावनगरक पत्रं उक्त नगरके यूरोपियोंकी वासभूमि भी उपकण्ठ १८ भील उत्तर पश्चिममे अवस्थित है। वर्तमान वाला कद्द कर परिगणित है। ममुद्रको तहसे यह स्थान | नामक स्थान पहले वलमो नामसे विस्वान था। प्राचीन २३० फीट ऊंचा एवं गण्डशैलमालामें पग्वृित है । बलभी-गजधानीका ध्वंसावशेष उक्त वाला नामक स्थान- इष्टकोट रेलपथ इस नगरके पाम हो कर मान्द्रानकी, मे विद्यमान है। यहांके प्राचीन नरपतिवश बलमी- ओर दौड गया है। इस कारण आज फल यहांको | राजवश के नाम निहासमे परिचित हैं। श्रीवृद्धि बहुत कुछ बढ़ गई है। पहले यहां पीने के ___ष्टोय ५वी तान्टो में मटार्क नामक पक सेना- जलका वडा अभाव था. अब उसकी उतनी शिकायत पतिय हआ। नवा मित्र शोय थे। नहीं रह गई है, परन्तु फलमृल और खाने की चीजका भटाई सम्भवतः सुराष्ट्र शमवंशीय राजाओंके किसी अब मा अभाव है। यहांके अंगरेज टोलासे चंगाली। सेनापतिक व अधर थे। वठभी राजाओं को बहुत मी टोला बहुत ही ग्वगाव है। गिलालिपि नया ताम्रशासनाने जाना जाता है, कि बलदव र-मान्द्राज प्रमिडेन्सीके दक्षिण आकर जिलेके भटार्क के अनुमार ही उनके ज्येष्ठ पुत्र प्रथम घरसेन भी बिन्नपुग्म् तालुर के अन्तर्गत एक गएडग्राम । यह अक्षा. नापतिको उपाधिमे भूपित थे। पाश्चात्य ऐतिहा- १९५८ ५०3० नया देशा० ७६४४ 30“पू० प डा- मिक लोग इन्हें विदेशी ही ममदने है। हम लोगोंदहो वेगासे : मोल उत्तर-पश्चिममे अवस्थित है। फरा- भी ऐसा जान पडता है कि, मटार्क मा एक शाक्टोपा मियोंने पडीवरी राजधानी सुदृढ़ करने के लिये यहा। मन्दिय भी थे। अति प्राचीनकालमे जो शाकद्वीपी पहले दुर्ग बना कर सेनानिवाश स्थापन किया था। १७६० ई० में अदरेज सेनापति कूटने पडीचेगे पर थाक। लोग भारतमें आये थे, वे मित्र नामक सूर्योपासक थे। मण कर इमे अगरेजाधिरुन कर लिया। इसी कारण कितने हा मैवक वा मिहिर उपाधि धारण १८८२ ई०सी ३०वीं बृन नक स्थलप यगामी पण्य- करते थे। अन्तमे वे लोग ही वगोपाधि रूपमें गिने द्रध्य पर शुल्क आदार करनेके लिये यहां फरासियों का जाने लगे। भटार्क भी इसी तरहसे किसी मैत्रक कुलम एक शुलझ-कार्यालय था। उत्पन्न हुए थे, उनके वजधर भी मैत्रक कहलाते हैं। वलद्विप (स० पु०) इन्द्र। इस बंगके बहुनसे ताम्रजासन पाये गये हैं। उनसे चलन (सं० क्ली० ) ज्योतिष शास्त्रानुसार ग्रह, नक्षलादिका ही वंशावली निकली है। सायनाने हटकर चलना या विचलन (deflection) सेनापति भटार्क चलनासना (सं० स्त्री०) ग्रहादिका अयनच्युति प्रतिपादन चलनाश (सं० क्ला० ) ज्योतिपके अनुसार अयनाशसे , घरसन द्रोणसिंह किसी नहका चलन अनि घट कर चलने या वक्रगतिको (सेनापति (महाराज) ध्र वर्मन घरपट्ट (महाराज प्रभृति (महाराज) दूर्गत्रामा (degree of deflection )| पञ्च महाशब्दयुक्त) वलनाशन (संपु०१चलध्वंसक। २ इन्द्र। [गुप्त सं०२०७] गुहसेन महाराज बलनिमूदन (नं० पु० ) इन्द्र । [गुप्त सं०२३७] चटन्तिका (सं० बी०) संगीतशास्त्रोक्त स्वरक्रममेट । चलपुर (मं० सी०) बल नामक दानवको पुरी। धारसेन सामन्त महाराज वलमि (सं०स्त्री०) बनभी देखो। [गुप्त सं०२५२ चलभी ( सं० स्त्री०) वलमि कृटिकारादिति वा डीप १ वह मण्डप जो घरके ऊपर शिखर पर बना हो, रावटी। जिलादित्य धर्मादित्य रम [गुप्तसं० २८६] खरग्रह २छानी। गहचहा, घरकी चोटी। ४ पुरीविशेष।