पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/६८३

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६६६ बलि-वल्कल नाम । ५ सांपोंकी एक जाति जो वींकरके अन्तर्गत | श्यति, विनाशयतोति शो वाहुलकात् कि । वडिग, यंसी। मानी जाती है। ६ रमाके गर्भसे उत्पन्न फल्किदेवका चली ( स० स्त्री० ) १ श्रेणी, आवली । २ रेखा, लकीर । पुत्र । ७ श्रीकृष्णके रथके एक घोडे का नाम । ८ एक ३ शिकन, भुरी। ४ पेटके दोनों ओर पेटाके तुकडनेसे नदी नाम | | कुशद्वीपके एक पर्वतका नाम। पड़ी हुई लकीर । ५ चन्दन आदिसे बनाई हुई लकीर । चलि (२०४०)१ रेखा लकीर । २ पेटके दोनों ओर वली ( अ० पु०)२ स्वामी, मालिक। २ शासक, अधि पेटीके सिकुडनेसे पड़ी हुई रेखा, वल । जैसे-लिवलो। पति। ३ साधु, फकीर । ३ चन्दन आदिसे बनाई हुई रेखा। ४ पूजोपहार, देवता- | वलोभहन ( अ० पु०) युवराज, टिकैत । को चढ़ानेकी वस्तु। ५ राजकर। ६ एक दैत्य जो बलोक ( स० क्लो०) चलति संवणोतीति वल सम्बरणे प्रहलादका पौत्र था और जिसे विष्णुने वामन अवतार (अलीकादयश्च । उया ४१२५) इति कोकन् । १ शर, ले कर छला था। बलि देखो। ७ एक प्रकारका वाजा। सरकंडा। २घरकी छत या छोजनको ओलती। ८ श्रेणी, पक्ति । ६ राजकर । १० गंधक । ११ छाजनकी वलीदपुर-युक्तप्रदेशके आजमगढ जिलान्तर्गत एक नगर । ओलती। १२ बवासीरका मस्सा। यह अक्षा० २६३३५ उ० तथा देशा० ८३ २५ ३०" वलिक (सं० पु० ) घरकी छत या छाजनको ढालका अंत | पू०, तोंस नदोके किनारे आजमगढ़से ६ कोस दूर पर जहांसे पानी गिरता है, ओलती। अवस्थित है। नगर तो छोरा है, पर बड़ा ही समृद्धि- वालक्रिया (सं० स्त्री०) १ उपहार दान । २ किसी व्यक्ति शाली है। सप्ताहमे दो वार हाट लगती है। उस हाट- के गावमें लकार खोचना। में आसपासके गांवोंसे चीजें विकने आती हैं। यहां चलित ( स० वि०) १ बल खाया हुआ, लचका हुा । २/ करीव २५० घर जुलाहे हैं जो कपड़ा बुनते हैं । जौनपुर- झुकाया हुआ, मोडा हुआ। ३ लिपटा हुआ, लगा हुआ। वासी मखदूम शेख मुशेयियोंके वंशधर लोग यहाके जमीं- ४ परिवृत, आवेष्ठित । ५ युक्त, सहित । ६ जिसमें झुर्रियां | दार हैं। उन्होंने १५वों सदीके शेपमें जौनपुरके शेख पड़ी हों, जो जगह जगहसे सुकडा हो। ७ आच्छादित, राजा सुलतानसे यह जमीन जागीर-स्वरूप पाई थी। ढका हुआ। (पु०) ८ काली मिर्च । ६ नृत्यमें हाथ | वलीमत् (सं० त्रि०) अलकायुक्त। मोडनेकी एक मुद्रा। वलीमुख (सं० वि०) वली युक्त मुखौं यस्य । वानर । वलिन् (सं० वि०) १ बलशाली । (पु०) २ सिकुड़ा हुआ वलीवाक (सं० पु०) एक ऋषिका नाम। वलिवान देखो। गाल-मास । | वलूक ( स० क्लो० ) वलते इति वल संवरणे ( (वलेल्कः । वलिम ( स० त्रि० ) वलि मत्वर्थे (तुन्दिवप्लिवटेर्मः। पा उण ४१४० ) इति ऊक। १ पद्ममूल, कमलको जड़, ५।२।१३६ ) वलियुक्त, वलिविशिष्ट । भिस्सा। (पु०)२ पक्षिविशेष । वाल्मुख (सं० पु० ) १ वानर, वंदर। २ गरम दूधमें वल्क (सं० पु०) वलते वल संवरणे (शूकवन्धोल्काः । ... मट्ठा मिलनेसे उत्पन्न छठा विकार । उण ३४२) इति प्रत्ययान्तो निपातितः। वल्कल, वतिर ( स० लि०) वलते सवृणोति चक्षुस्तारामिति वल- छाल । वाहुलकात फिरच । बंकर या टेरा चक्षविशिष्ट, जो वल्कज ( स० पु०) पुराणानुसार एक जाति । डेरा हो। वल्कतर (सं० पु०) वल्कप्रधानस्तकरिति कर्मधारयः। वलियण्ड (स० पु० ) राजपुत्रभेद । पूगवृक्ष, सुपारोका पेड़। वलिश ( स० क्लीः ) वलिना गन्धबध्याधु पहारेण श्यति वल्क? म (सं० पु०) वल्कप्रधानो इमः। भूव क्ष, हिनस्ति मत्स्यानिति शो-क। वडिश, बंसी। भोजपतका पेड। घलिशान (सं० पु.) मेघ, बादल । वल्कल ( स० क्ली० ) बलते संवृणोतीति वल-चालकात् चलिशि (सं० स्त्री०) वलिना आहारोपहारेण मत्ल्यावोन् कलन् । १ त्वच, दारचीनी । (पु० को०) २ वृक्ष-