पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/६९२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


पालपुर-पलम ७०७ तुमने इस रास्तेसे किसीको आते देखा है ? उस राक्षसकेअकृत पक्के अपराध पर विचार करो लगे। मन्तम भोपण रूपको देख कर यक मन ही मन मोचने लगा, उहाँने दण्ड स्थिर र पक्से कहा, तुमने जिस 'यदि मैं इस राक्षमको महेश्वरका पता नहीं पताता , तो| अगुली द्वारा निर्देश पर मेरा पता राक्षसको दिया था, इसो समय यह दुष्ट फ्रोधके आधेशमें निश्चय हो मेरा में उस अगुलोको नष्ट कर दूगा। ऐसा कह पर संहार करेगा और यदि शिय इस विषयको जान पापे गे| महादेव उप्तको अगुठी काटनेको तैयार हो गये। इसी तो मुझे उनके कोपानलमें दग्ध हो। पडे गा । सुतरा समय मास्मात् उस कृषकको नी भोजनको सामप्रियां किस पशष्यका अनुमरण करनेसे इस दारुण यिपदसे लेकर उस क्षेत्रमें उपस्थित हुए। यह महादेवको अपने छुटकारा पाऊगा।' एपको चिरतानिमान देख कर पतिकी अगुल्लगे काटनेक लिये उद्यत देख उन चरणों राक्षसो विश्वास हुआ कि, अपर निश्चय ही महादेवका पर गिर पढो एप बहुत ही कानुनय विनयक साथ पता जानना है । तब यह वार यार हुकार द्वारा छपक धोला-"नाथ | जब आप मेरे पतिको अगुरी नष्ट पर को भय दिखाने लगा। कोई उपाय न देख कर परने देगे, तो मेरा ददि परिवार म नाभासे परालकालके चिला पर कहा-'मै महादेवा कुछ भी पता नहीं। गालम समा जायगा सुतरा उसके बदले में अपनी दो मानता।" फिर पोछे उसने धीरे धोरे महादेयके गुप्त य गुलिया दनेको तैयार हू।" महादेव पा रमणीकी स्थानका सारा भेद उस राक्षमको २६ सुनाया। इस प्रकार पतिमति देत कर योले-'तुम्हारी पतिभक्ति तब यह राक्षम घक उस वनमें नाकर महादेवको देख कर मैं भति प्रमान हुमा । नाज दिनसे तुम्हारे पटनेक रिपे अप्रसाठा ऐसे समय मगवान् विष्णु यशर्म जितनी रमणियां पैदा होगा, ये हमारे मन्दिरके महादेयका उद्धार करने निमित्त मोहिनी रूप धारण | सामने अपनी दो गुपियाँ बलि चढा पर तुम्हारी पति कर उस राक्षसके सामने उपस्थित हुए। युयतोके सुन्दर भक्तिको घोषणा करे गो। इसीलिये उमके वका कथाएं रूपाने दखते ही उस राक्षसके हदयसे महादेयका ध्यान अपनो म गुलियाँ दलिदान करती आ रही हैं। ये राज जाता रहा। यह घोरे धीरे उस सुन्दरीको मोर वढा | नियमका उल्धन रफ राजदर ग्रहण करतो है कि तु जितु यह लाख चेष्टा परने पर भी उसे स्पर्श न कर तथापि देवताको माहा उघन करनेको इच्छा नदी सा। राक्षमको प्रेमविहलता देख कर सुन्दरीब करतीं। ममी भी मदिसुरफे मापा दो सहघ्र परिवार माटे म्वरमें कहा-मैं ब्राह्मणका कन्या ई सि तद को रमणियां इस तरह अ गुटियोका बलिदान परता है। तुम्हारे ऐम अपवित्र शरोरयाले राक्षमकी प्राना पूरी घलपुर-माद्राज मसिडेन्सीफ सरेम जिला तर्गत एक ! तुम पहले सपायन्दनादि द्वारा अपने परोरका | वटा प्राम। यह कोल्लिमल पयतके ऊपर स्थापित नाम पषित करो, तब तुम्हारी वासना पूरी होगी और नमा लगिरस १६॥ माठ पश्चिम उत्ता में स्थित है। तुम मुझे स्पर्श कर सकोगे। पहा तोरियूर उपरयका सम्मुनस्य पन्दरके सामने और विष्णुको छलना राक्षस नहीं समझ सका। नारीफ ) पलेश्वरम्यामोका मन्दिर तथा पोखर है। इस पर रूप पर मुग्ध हो कर यह अपने हाथका प्रभाष भूट गया। बहुत-सी मछलियां हैं। प्रतिदिन चंदा धजा पर उन मण साध्या करनक समय यह राक्षस भ गग्यास अपने रियोको भोजा दिया जाता है। घटना सुन कर अगादिको यथाक्रमस दाहिन हायको अगुलियों द्वारा मछलियाँ बधिर ऊपर चली जाती है। इसलिये स्पर्श करने लगा पय जिस समय अपने दाहिने कितने ही इस मन्दिरको मत्स्यमदिरा कहते हैं। उस हापको मस्तक पर रखा, उसो समय पद भस्म हो गया। मन्दिरम भनेकी शिलालिपिया उत्कर्ण हैं। उनमेसे इसफ बाद महादय भपने गुप्तम्यानका परित्याग पर एक १३५० ६०म उत्तीण हुई थी। चारले १५ उन्होंने विष्णुके पास जा कर मपनो याहम (स.नि.) वल्ल गमव । १ पिय, प्यारा। (पु.) साता प्रकट की। फिर ये उस विश्यासघातक तथा २ अध्यक्ष, मारि।३ सम्पन्त प्यारा पचि, प्रिय मित्र,