पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/६९८

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वल्लमाचारी बलमाचाय ७१३ गाकुरनायके शियोंमें कुछ विमि नता देखा जाती है ।। र्त्तव्य और गुरुत्व मनुमन कर दैनन्दिन क्रियाकलापका वे लोग पाको छ समानक मठोंके प्रति जरा मा श्रद्धा याचरण करने में समर्थ होते हैं, तप गोसाइ लोग उन्हे नहीं रखत, अपने समाज गोम्बामाका छोड कर और दीक्षा देते हैं। दोझाके बाद यह बालक श्रीगोपालके किसाका मी सम्मान नहीं करते और न ग्मिीको अपना चरोम यपना मवस्व अथात् तन मन और धन समपण भाग्यरिहित गुरु हो मानते हैं। विट्ठलनाथरे और करना मीयते हैं। दिमागी पुत्रक मतानुवर्तियोम ऐसा पक्षगत नहरे देवावलमाय-बल्लभाचारा नामक वैष्णवमतके प्रतिष्ठाता पाता। पर आचार्य दोंन रमणभट्ट नामक एक नैराग्राह्मण नाना स्यानोक विशयन गुजरात और मालवा में द्वितीय पुत्ररूपमें १४७६ इ. (विक्रम सन् १९३९ किनन वणयणिक और यमायो यलम्माचार्य मता वैशायाणा एकादशी ) को नमःहण किया । लक्ष्मण परम्पो है। इसी कारण इस मम्प्रदायमें मनक धनाढय महमानों पीदास ले कर समा पुष्प मोमयत करत मनुष्य देखे जान हैं। मारतय सभा स्थानाम, विशे चरे आये थे। जिसके चशर्म १०० मोमयश पूरे होते हैं, पत मथुरा और वृन्दावनम, इन लोगोंक अन मठ और उपके कुलम सावत् भगरानका पादुभाय होता है, इस दघालय हैं। काम इस मम्मदायक दो प्रसिद्ध मन्दिर शास्त्राय नियमानुसार मणमजाक ममयम सामया है-लालजाका मन्दिर और पुष्पात्तमजाका मन्दिर । इन कोत सख्या पूण हुइ मार भगगगनने 'यल्लम' इम नामसे दोना मान्दरोंक विप्रद अनि विख्यात और बहु सम्पत्ति | यापक यहाजा लिया। सोमयाग उपलक्ष्यम पालाख गाला हैं। इस सम्प्रदायक अनक परिन तार्ध हैं। नग ग्राह्मण भोजन काशाम पाकर करानके अभिप्रायसे आपके नापत्र और द्वारका तथा मजमेरक धानापद्वारकामठ | मानापिता चले। रास्तम चम्पारण्यम (जिला रायपुर सयस महिमा रत मार समृद्धिसम्पन्न है। प्रमाद है, सा० पा० । श्रीवल्लमका प्रादुर्भार हुआ था। इस मठक विप्रहपहले मथुरामथे। मीरदजेच वादशाहन जय वाका मान्दर ढाहनका हुपम दिया, तव बह सवा । यहमके पिता विष्णुम्बामा मम्पायमुक्त थे। वारा स्तोमा विना हासे अजमेतो चल गये। यदाका णामी घाममै रहने ममय घमाचार ले कर पदारे अधि वर्तमान मन्दिर बहुन दिनोंका नहीं है, "तु मवक सियोंक मा त मतावलम्बियोंशा घोर विरोध उप निय हुए धनम उम यिनको प्रचुर सम्पत्ति होगा स्थित हुआ। इस कारण उहे वाराणसो छोड कर यठमाचारियोको कम कम एक यार मा धोनाय अन्यत्र जाना पडा था । उस समय उनकी पत्नो पूर्णगर्मा दर्शन परन होते हैं तथा कुदुदान देना पडा थी। योगदुर नक मीन गपे थे कि अकालमैं अपम मापदायिकवायाको गोमाग गरमतमोका। माम उनकी पत्नीने इम नमारको प्रमन किया। मारा पाना कर श्रीकृष्ण शरण म' यह अष्टाक्षर मन मातापिता चाहे अपने जीवनको पिपल जान कर पदर घम मम्मदायमुक्त करते है तथा बारह घा हो मारा पुत्र देवाथप लाभफ आश्यामस हो, उस उममे अधिश यरों में वह बालक जापनका कर्तव्या सद्य प्रस्त सनयो एक पक्षक नोचे फेंकचरे गयेस प्रकार कुछ दिन पीत नाके बाद जब उनका प्राणभय जाता रहा तय मोनों धार घोर उमी रासे यक

  • का मौरके पोदार प्रत्येक हुदोमें एक एक पैसा दवावक | ममाप आपे और पुत्रको उसो ययस्थामै अर्थात् शरीर

नामस देत है तथा वहाँ वस्त्र व्यवसाया प्रति पारके प्रय विक्रयमें | और नोषित देव पूले उममाये, गोदर्म उठा कर प्रेमाश्र दा दो पैस परफे। बहाने लगे। इमक वाद पुनको माथ ले ये धाराणमा प्रत्यक मन्दिरमें वान नगद दान देना होता है, जैस विग्रह आपे और पहा कुछ समय रहनेक पानर धारदारण्य के समीप, प्रार्च को गद्दामें धौर भेनापद्वारपे गसमें। ममीपरी गोकुल नगरम या पर पस गप। ____Vol 1 179 -