पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/७००

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मल्लमाचार्य उपासनारूप गाना मत प्रचार किया। उत्तर भारतमें । वा उपामनाकी एक मिनर प्रथा नागनेका हुकुम दिया अपना मन फैराने से पहले ही दे पदार मातृभूमिके | और कहा कि उस प्रथामें सी बालमृतिशीही उपा मान वाभिया जाना पक्षाला पा सनाको व्यवस्था जानना 1 तदनुमार वालण या दाल थोडे ही दिनों में इनका पीर्तिम्तम्म सुप्रतिष्ठित हुमा।। गोपाल नामसे यह उपासनापद्धति प्रचलित हुई है। यहा दामोदर दास TIम एक प्रतिष्ठित व्यक्तिने सवसे । __आपकनिध्य लोग गुजरात, मारवाद मेवाड, मिध, पहले इनमे दीक्षित कर हा धर्ममतका आध्रप पक्षाघ उनयिनी वाराणमो हरिद्वार प्रयाग आदि प्रसिर और पवित्र धर्म ववमें हैं। इनके मतानुमार आजो रिया: इमर दाद विजयनगरम अपने मामा घर वन ब्रह्मचयापसम्बन न्यायमदन या धर्मप्रणोदित नहीं गये। यहा राजा ध्यादेव इम मतल्यमे कि 'सर्वधर्म है। इसी कारण होन विवाह कर लिया था। पादिया मास्त्रार्थ करा कर निसका जय हो उस मम्म पाराणमीमें इनका पाममवत था। यहा ये रहते थे दायका मैं तुयाया बनू" मरधर्मक प्रतिनिधियोंको मान और वाच पाच थोरणको लाभूमि श्रीयदायनमें पूर्वर युत्या पर नागार्थ करवा रहे थे। उस ममाम मा कर अपने धममग प्राणशे भगवत् में मसलिलमें जब आप पधारे उस साय सम्र ममा आपको नजो निषित कर ले जाते थे। वाराणमा में रहते ममय होने रागिसे चक्ति हो उगे। सर्वाने सागका सच्चि मान थाने मतप्रतिष्ठापर बहुतसे धमथ रिसे। उनमेस पर विरानमान दिया। राजाश प्रार्थनाम सानियों सुबोधिनी नामकी सुविस्तृत भगन्दगोताटोका बहुत का आपोपानित किया और राजा कृष्णदेवो अपना सिर १५० -भानार्य परलोक्यामो हुए। Fra बनाया। मातर होन सर्यचारियोंमे तधा राना । घे जनमाधारणम चै चाना कह र पूजित थे। प्रधादि से बहे ही मान और ममारोह के माथ दा गई 'मागर्य' में उन पररभदाधिन नाम मा पाया जाता है। उपाधिको साकार कर दिग्पिनप परनेकी इच्छामे भारत उनका रचित प्रधावला-अन्त करणप्रयोध और भ्रमण प्रारम्म किया। छ यम ए पार भारतका उमकी का आचार्यकारिका, आनन्दाधिकरण आया, परिक्रमा लौर एक बार दिग्विजय करना इस दिमायमे एकान्तरदम्य प्रणाय तुलाक्मिागरतटीका नल वीस की आस्था सापने तीन बार भारतको परिक्रमा भेद, मिनिसूत्रभाष्य (म मामा) तत्वदार का तरवार्य तथा ताग यार सब तरह के वादियोंसे प्राग्वार्थ र दिग्धि दाप और उमीर का निविधानामावना नारत नय किया था। जब आप सृनीय धार परिक्रमा कर ) और उसका टाका निराकरण पार विवृत्ति पवार रहे थे उस समय पहरपुरम सिराजमान थ्रोनिहाय रम्बा, पद्य परित्याग परिपृढाटक, पुरुषोत्तमसहस्रनाम, पाण्डरह मगवान्ने आपका आशा दा 'आप पिवाद | पुष्प्रिवाहमयादामद और टाका, पूर्वमीमासाकारिका करिये, मैं पापफ यहा पुत्ररूपसे प्रकट होना चाहता है।" | प्रेप्रामृत और टासा प्रौढारितनामन बालचरितनामन्, इस मामाका तिरोधाय कर काणीनिवासी पा स्वपातीय | याग्वाध ब्रह्मसूतत्ति नहासूत्रातुमा य भक्ति पर्शिनी कमाण्डा नाहाणशी महालक्ष्मी नामक न्याफ साथ और रामा भारमितात भगवद्गीताभार, भागवन मापने मायरियाह विधिम निगाह पिया । १५११ १०में | तत्त्वदाप नामका टाका निवघ मोर भागयतपुराणराका गोपीनाथ तथा १५१६ १०में घिट्टठनाय नामक इनके | सुयोपिना। इनक अलवे मागनपुराण दशमन धानु हो पुत्र हए । प्रमणिका, भागवतपुराण पञ्यम स्यन्घटोका भागवत इन्दौन शेर जीयनमें प्राप यज्ञभूमिका त्याग नहीं पुराणकादास पार्थकिपणारिका भागवतमारसमु किया। यहा १५२० इ०में होन गोपनशैलम पाश्य में | चय, गङ्गालवाद मयुगमाहात्म्य मधराएर, यमुनाएका, धोनाया पुमिद और सुबह मन्दिर बनवाया। ए| गजीनामन्, यियाधैयाश्रय, वेदानुतिवारिका, श्राद दिन पृन्दापनम भगयध्यानम निरत रह कर रहे अरण, ध्रुनिसार मन्यामनिण्य और उसकी टोका, श्रीकृष्णाक दर्शन हुए थे। मगवान्न रहे अपनी पूजा | मध्यत्तिम नावाटप्पण गार दाग मामात् पुग्पोसम