पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/७०१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


७१६ वल्लभानन्द-बल्लिमय वाफ्य, सिद्धान्तमुक्तावली, सिद्धान्तरइस्य, सेवाफल | एक १४६६ ईमें रणसिहदेव महाराय नामक गजाके स्तोल और उसको टीका, स्वामिन्यष्टक। राजत्वकालको खोदी है। बल्लभाचार्यको मृत्युके बाद उनके द्वितीय पुत्र चल्लर (म'० क्लो०) बल्लते इति चल्ल-अरन् । १ कृष्णा- विट्ठलनाथ मठकी गद्दी पर बैठे। असीम यत और उद्यम- | गुरु । २ मंजरी। ३ गहन | ४ कुख। से तथा विशेष आग्रहके साथ वे दक्षिण और पश्चिम- वल्लर ( म० स्त्री०) बल्ल-क्विप, बल्ल संचरणं ऋच्छ. भारतमें अपने पिताके चलाथे धममत फैलानेमें सफल नाति -अच् १, कृदिकागदिति वा डी । १ मजरी। मनोरथ हुए थे। इस धर्मप्रचारमें उन्हें म्वधर्मभुक्त २५२ / २ वल्लो, लना ।३ मेथिका, मेगी । ४ वचा, वच । ५ एक साधुओंसे सहायता मिली थी। यह मव पवित्र चरित्र प्रकारका बाजा। वैष्णवों को जीवनी "दाशीवाभनवार्ता” नामक हिन्दी वारी ( स० स्त्री०) यालरि देना। प्रन्धमे लिपिवद्ध है। बल्लव (मं० पु० ) वल्ट-प्रीती झिप वल्ठ' प्रीति घातीति विट्ठलनाथ १५६५ ई०में गोकुल आ कर बस गये। वाक। २ गोप। २ भीमसेन । विराटनगरमें जब यहां ७० वर्षको उमरमें पवित्र गोवर्द्धन शैल शिखर पर अज्ञातवास अवस्थामें रहते थे, उस समय ये इमी नामसे उनको भवलाला शेप हुई। उनकी दो पत्नी तथा गिरि परिचित धे। ३ सपकार, सुमार, रसोइया । धर, गोविन्द, वालकृष्ण, गोकुलनाथ, रघुनाथ, यदुनाथ, वलम्वी (म. सी) बल्लव टीए । वल्लवजाति स्त्री, योर घनश्याम नामक सात लडके थे। उन सातों पुत्रों | वल्लयपत्नी ! पर्याय-भाभीरो, गोपिका, गोपी, महा- मेंसे गोसाई गोकुलनाथ विद्या और बुद्धिमें मोंमे बढ़ शुद्री, गोवालिका। चढ़े ये। गोकुलनाथने अपने पितामह वल्लभाचार्यके | वल्टापुर ( स० क्ली)पक नगरका नाम। लिखे सिद्धान्तरहस्यको टीका लिखी थी। वल्लभा- (राजतर०७१२२०) चार्यके वशधर गोसाई उपाधिसे परिचित हैं। बम्बई चल्लाह (२० अव्यः) ईश्वर की शपथ, सचमुत्र । मठके गोसाई उनके एक प्रधान प्रतिनिधि थे। वलि ( सं० स्त्री०) वल्लने संवृणोति बल्ल मर्वधातुभ्य वल्लभाचार्यका धर्ममत । हन् । १ लना । २ पृथियो । वल्लभाचार्य-प्रवर्तित धर्मतत्त्वका मूलमन्त्र ब्रह्म- वल्लाएटकारिका (२० स्त्री० ) वल्लिरूपा कण्टकारिका। सम्बन्ध है । यह बात उन्होंने भगवान्से प्रान की थी एवं अग्निदमनी, शोला । (राजनि०) यही वे अपने सिद्धान्तरदम्यमे लिग्ब गये है। | परिककएटारिका (सं० स्त्रो० ) अग्निदमती, जोला । विशेष विवरया बल्लभाचारी शब्दमें देखा। वल्लिका ।स. खो०) १ वृत्तमल्लिका, येला । २ उपोदको, वर टमानन्द-पटकारक नामक घ्याकरणके प्रणेता। पोई नामकी लता। इसकी पत्तियोंका साग बना कर बल्टमी ( स० पु० ) बन्नभी राजबश देखो। खाया जाता है। वल्लि स्वार्थ कन् टाप् । ३ लता। वल्रमेन्द्र-१ कौतुकचिन्तामणि, शिवपूजासंग्रह और चल्लिज (सं० क्लो०) १ मरिच, मिर्च। (नि.)२ वलिद- सनत्कुमारसंहिताटीकाके प्रणेता । इनकी उपाधि | जातमात्र । सम्बनी थी। २ वैद्यचिन्तामणिके रचयिता। ये वलिदूर्वा (सं० स्त्री० ) वल्लिरूपा दूर्वा । श्वेतदुर्वा, तेन्गू ब्राह्मण थे। इनके पिता नाम अपरेश्वर मट्ट था। सफेद दूव । इस दूर्वाका गुण निक्त, मधुर, शोत, पित्तन वरभेश्वर ( स० पु० ) राजपुत्रभेद । नथा कफ, वमि और तृष्णाहर माना गया है। बलम-मान्द्राज प्रेसिडेन्मोके उत्तर आर्कट जिलान्तर्गत ( राजनि०) एक गगङग्राम । यह बन्दीवाल नगरमे ४ कोस पश्चिममें वल्लिमत् (स० त्रि०) वल्लीयुक्त। अवस्थित है। यहां प्राचीन चोलराजवश द्वाग प्रनि-चल्लिमय-मान्द्राज प्रेसिडेन्सीके उत्तर आर्कट जिलेकी ष्ठित एक प्राचीन मन्दिर है। यहांको शिलालिपिमैले । चित्तुर तालुकके अन्तर्गत एक बड़ा प्राम । पहले यह दुर्ग