पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/७०९

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138 वर्यात-बसन्त १०में जेम्म मर्फीने अपनी 'पुर्तगाल-भ्रमण' पुरतकमे उन। वसनार्णवा ( स० स्त्रो०) भूमि, पृथ्वी। शिलालिपिकी प्रतिकृति प्रकाश की है। उनको इस वमना (सं० ति० ) १ वसन योग्य । (पु०) २ गाहेपत्य पुग्न्तक द्वारा पता चलता है, कि उस समय यह वई- या वासकादि आच्छादक वृक्षनाशक अग्नि । द्वीप बहुत हो उन्नत दशामें था। इस समय भी दमई (मृक ११११२३ ) अति उर्वर नथा शम्यशाली भूभाग गिना जाता है। यहां वमन्त ( सं० पु० ) वसन्त्यत्र मदनोत्सया इति वस ऋत्र टुंग्य, धान तथा ताम्वलकी यथेष्ट खेती होती है। . (तभूया वमिभासिमापिटिमपिजिनन्द्रिभ्यश्च.। उया ३१२८) ___ स्वास्थ्यार स्थान होने के कारण बहुत में लोग घायु' इति अन् । मृतुविशेष । मलभासनवमें उछ त धनि- परिवर्तनके लिये यहा आने हैं। । निर्देश इस तरह है-"मधुश्च माधवश्व यसान्तिकतुः। वमति (सं० स्त्री० ) वस निवामे भाषाधिकरणे अति।। अर्थान चैत्र पवं वैशाव, ये दो महीने वसन्तऋतु । ( वहिवस्यतिभ्यश्चित् । उण, ४६० ) ३ वास, रहना। कोई कोई फाल्गुन तथा चैत्रको वसन्तऋतु कहते हैं। २ निकेतन, घर। ३ नमाधुओंफा म:। ४ यामिनी, इसका पर्याय-पुष्णमाय, मुरभि, मधु. माधव, गत । ५ वस्नी, याबादी। फल्गु, ऋतुगज, पुप्पमास, पिकानन्द, मान्त तथा वमतिद्र म (१० पु०) वृक्षभेद । याममस। बरती (० स्त्री०) वमति कृदिकारादिति डोप । १ वाम, केवल माविकी पलाना अथवा वर्णनामें हो यमनकी रहना। . यामिनी, गत । निकेतन, घर। रमणीयता नहीं पाई जाती, मत्रमुच ही बसन्नके आग- बनतीवरी। ० स्त्री० ) मोम बनाने के समय व्यवहार्य मनमे प्रकृतिका रूप अत्यन्त दी मनोहर, अत्यन्त ही रम्य पानीयमेट। | पवं नयनमिकर हो उठता है। ज्यों ही वसन्तका वसन ( म० की.) वम्यने आच्छाद्यनेऽनेनेति वसन्युट ।। थागमनमा, कि साग ससार मौन्दर्या-सागरके स्निन्ध चन्छ। २ लादन, आचरण, ढकनेको वातु । बम- जलमें इव गया । ऐसा कोई मानव मानवी नही, पेमा श्राधारे ल्युट । ३ निवाम। ४ स्त्रियों को कमरबा एक कोई फीट पतंग नहीं, ऐसा कोई थल-चर नभचर जीव आभूषण। (क्लो०) ५ नेजपत्र, तेजपत्ता। (न्त्री०) जन्तु नहीं देगा, जिसके हृदय में बसन्तके आगमन समय ६ पीतकार्पास पोलो पाम । प्रकृतिका प्रफुल एवं मुकुलित नृतन कलिकाके समान बग्रनमय ( म०नि० ) वस्त्रमय । (नाट्यायन ८।११।२३ ) सुन्दर, सुवासयुक्त मुम्बडा देख कर आत्मतृप्ति वा आत्म- यमनवन् ( म० त्रि०) वसनशाली, वस्त्रधारी। प्रसादके सुग्वशान्ति मल्लिकी धाराका प्रवल प्रवाह वमनोगपुर-बम्बई प्रेसिडेन्मीके रेवाकान्था विभागके गरज न उठे। और तो क्या, वसन्त प्रकृतिकी ऐसी गग्नेडमेवामके अन्तर्भुक्त एक छोटा सामन्तगज्य । , महिमा होती है, कि चिरन्न, चिरभग्न, चिरविषाटमग्न यहांके सरदार दहिमा जित्वारा नामसे परिचित हैं। प्राणियोंके मनमें भी आनन्दकी ज्योति जगमगा उठती गजस्व दश हजार रुपया है जिनसे मालाना ४३२) रु० है। युवकयुवतीकी नो वात ही क्या, दूढे से बूढे वे बडोदा गायकवाडको करस्वरूप देते हैं। व्यक्ति भी वासन्ती प्रकृतिको प्रमोद-प्रवर्तनासे अपने वमनम्मेवढा-बम्बई प्रेमिडेन्सीके रेवाकान्धा विभागके। आपको भूल जाते हैं। साखेडमेवासके अन्तर्गत एक छोटा सामन्तराज्य । यहांके धन्य वमन्त-देव! तुम्हारा महिमाकी बलिहारी है। मरदाग्बंश राठोर कालूदाबू नामसे विख्य न है । ५७१०) तुम्हारे प्रतापसे भव प्राणियोंको शीत-निश्चरके कठोर रु. सालाना बडोदाराजको करमें देना होता है। स्पर्शकी असह्य उत्पीडना सहनी नहीं पड़ती एवं नीम- वसना (म० स्त्री० ) बस युच टाप। स्त्रोक्टोभूपण, दैत्यके उत्तर अत्याचार भी भोगने नहीं पड़ते। वस- स्त्रियों की स्मरता एक आभूपण । न्तागमनसे आकाश तथा दिशाएं प्रसन्न हो उठती है। वसनार्ण (M० क्ली०) वसन ऋण । कपडे का छोर, पाड।। दिनमे न नो अधिक उष्णता है, न तो अधिक ठंढक ।