पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/७१६

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वसन्तरोग ७४१ रहता है। मृतशरीरके कई स्थानों अर्थात् चाहे गले ] टकके दूसरे दिन कछुए सर्प की तरह ऊचे देय पडने आँख, नासिका मत तथा पायके मध्य स्फोटक देखा। हैं, इसे अगरेजोमें पैप्युन कहते हैं। तृतीय दिन स्पर्श जाता है । पिएड मूत्रय न, यकृत् तथा स्वाधीनपेशो । परनेसे कुछ कठिन मालूम पड़ता है। चौथे दिन गोटियों समा कोमट एच घसापहरताविशिष्ट होता है। प्लीहा । ये अन्दर रम (सिरम् ) पैदा होनेक कारण ये गोटिया विदित तथा कोमल हो जाता है। म्यान स्थान पर नर्म हो जाती है एवं मुक्ताकी तरह मेसिकेल रत्नावका चिह दिखाई पड़ता है। मृतदेह बहुत जरत । देव पहते हैं। पाचधे दिन उनके ऊपरी भाग सड नाती है। । कुछ निम्न हो जाते हैं, इसे अम्बिनाकेटेट् कहते हैं। अक्षण । स्फोटरको परिधि रेटिम्युकोसम ( Retemucosum) १ गुप्तावस्था-संक्रमण द्वारा रोगोत्पन होने पर १२ सिरम द्वारा स्फीत पय मध्यस्थ सब कोप पपिहामिसके दिनों तक एघ रोका द्वारा होने पर ७ दिनों तक इस ! साथ मिल जानेसे इसका नया माय उपस्थित होता है । अवाया रोगा कुछ असुस्थ रहता है। स्फोटक्के मध्यसे हो कर एक हेयर किया है पड २ आक्रमणायस्था-गीत तथा कम्प द्वारा अकस्मात् उफ्ट प्रवेश करने पर भी उक्त प्रकारमे चिपक जा सकता पोडा आरम्भ होती है एक रोगीको सरके सभी लक्षण! है। छठेसे सातवें दिए पर्यात स्फोटर मध्यस्थलम अनुमय होते हैं। स्फोटक निकलनेक पहले तापपरिमाण स्वच्छ तथा तरल सिरम् रहना है एव चारों तरफ क्रमश २०४से १०६ दिनो त बढ़ जाता है। इसके मवाद एक्त होते देखा नाता है। इन स्वच्छ रस तथा अगवे पेह नया कमरमं पीहा होना पर पहुन उद्धार मवादके अदर एक प्रकारका आवरण रहता है, जब मयाद होना ये का लक्षण देखे जाते है । स यतम क्षणोंक बढ़ जाता है तब वह अदृश्य हो जाता है इस अवस्था मध्य गिराचेदना, मुप्तमहल भारतिम, हस्तपदादिये । को पटिउल कहते हैं, इस समय गोटीके चारों गोर रपन्दन, भारस्य, अत्यत दुव रता, प्रलाप अस्थिरता लार रेखा दिखाई देती है । आठवें दिन स्फोटक मवाद तथा अचैतन्यादि क्षण भी दत्त मान रहने है। इसे माथ से परिपूर्ण हो जाने के कारण ये,गोल तथा ऊचे दिखाई पड़ने मिक ज्यर (Primary Fever) कहते है । उस अरस्थ हैं। ११से १८ दिनके मध्य गोरियोंके ऊपरके चमडे दो दिनों तरबतमान रहने के बाद स्फोटकावस्था परि । सूख कर झड जाते हैं। इसके बाद गोटियोंप स्थान पर णत हो जाती है। | लाल लाल दाग मालूम पडते है । जब स्फोटक कुछ बडे ३स्फोटकायस्था-ज्यरक तीसरे दिन मुह कपाल तथा| पड़े रहत हैं, तब घे दाग कुछ गहरे दिसाइ पडते है हाथों छोटे छोटे लाल दाग देखे जाते हैं। ये लाल दाग) हे Pits कहते हैं। बहुसष्पक उत्पन्न हो पर दो पर दिनके भीतर ही मारे गोटियोंकी र प्यानुसार माधारण लक्षणोंमें भी बहुत नरोरम घ्याप्त हो जाते है । इन स्फोटकोंकी सध्या प्रायः कुछ परिवर्तन दिखाइ पडता है।गोटियों की संख्या अधिक १०० लेकर ३००ता रहती है। कभीर रोगोके शरीरमें होने पर मस्तक गले तथा शरीरके कइ स्थान स्पोत हो १००० एर हजार स्फोटक देये जाते हैं। मुखममलमें हो उठते है, चाहा अधिक लाल एवं उसमें कण्डयन रहने के इसकास प्या अधिक होता है । रोका देने के बाद अपना । कारण नक्षाघात द्वारा पढे बहे फोह निकल आते प्रथा स क्रामक रूपमै यस तरोग उपस्थित होने पर स्फोरका इन्धानोम कैमिक झिल्लिया देखी जाती है, गलेके भीतर वल्याक पहले पेट तथा छातीम वृहदाकार लाल दाग | गोरिया हो जानेस वसो वेदना होती पथ खाने पोलेके यादर होत देखे गये है, उसे प्रोसोमल एक्जे थेम ( Pro | समय अत्यन्त कष्ट होता है। नासिकाम गोरिया निक dromal Exanthem)पत हैं। धस तरोगी गोटिया लनेम नाक पहन लगती है पर श्वास रुक रुक्के चलता स्वतल, स हिल्ट या मरे प्रकारको हो मरती हैं। गोटा ] है। रेरिस, टोकिया या प्रकार आक्रान्त होने पर पासा, होनके पहले छोटे छोटे लाल दाग उत्पन्न होते हैं। स्फो । स्वरमग प्रभूति उपस्थित होते हैं। मूत्रमार्गमे श्लैष्मिक Votra_166