पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/७१८

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वसन्तरोग विनाइन ( Benga ) हीन ( Horn) वा पार्ट , ना उचित है जिन्तु जिसस किसी प्रकार रोगाके पाक (Vart pock ) इममें गोरियोंके अदर मवाद। शरीरमें शीतल वायु स्पर्श न कर जाय, इसका ध्यान सत्रय नहीं होता पर ये गोटिया चार पाच दिनके अन्दर | रखना अत्यन्तावश्यक है। प्रथम अवस्थामें लघुपथ्य तथा ही शुष्क हो जाती है, इसमें दृसग ज्वर प्रकाशित नहीं लेमनेर वरफ इत्यादि दे पानीक साथ एच कमला नीयू होता। इस प्रकारका रोग वसन्तटाश देने के बाद उप | प्रभृति सुरस फल देनेकी पाया करे । मयाद सत्य स्थित होता है। होनेके समय किया रोगी दुर्घल होने पर 'निफ्टी' उपमर्गतथा भानुमगिक पोडाफे मध्य न्युमोनिया, 'सूप' जेली' तथा थोडा-मा मध देना चाहिये। प्लुरिसी, लामाइटिस, गैट्राइटिम परद्राइटिस, उदरामय (२) गोरिया सुचारुरूप में वहिर्गत परनेके लिये पर स्थानों में प्रदाह तथा स्फोटक, स्कोरम तथा रेपियामें कार्यालि कादित किया सल्फ्युरस् पसिद्ध लोसन क्षत या विलगन परिसिप्लैम मिया, एलमिनु द्वारा गान स्पन करे । कण्डयों के निवारणा, मैदा, रिया, हिमेटयुरिया पपिसटैपिमस पर मेनोरहेजिया आरारोट अथवा मय कोई टार्च शरीरमें लगाना चाहिये। प्रभृति विद्यमान रहता है। भविष्यमें जिससे चमफे ऊपर दाग न रहे, इसके लिये यह राग अत्यात साधातिब होता है। इसमें सैक्डे परिपक्क गोटियोंके ऊपर क्रमश नाइट्रेट अब सिल्भर ३३ को मृत्यु होती है। प्राय ग्यारह दिन हा मृत्यु पेन्सिल अथवा उसका लोसन लगायेगे।किया मापर्यु हो जाती है। अत्यत ज्वर, दुर्वलता यासकच्छ ता, रिटेल अथयो सलफर चाहन्टमेंट, टि आइडिन कारोसिय नगरमें मगद पर रचनाय प्रभूति लक्षणों के उपस्थित साब्लिमेट लोसन (६ औंस जलक साथ २ मेन ) पच होने पर रोग अत्यन्त कठिन हो जाता है। अति शिशु लाइकर गाटापश्चा इत्यादि लगाया जा सकता है । डाक्टर मध्यवयस्क तथा गर्भवती स्त्रियों के होने पर प्राय अमा- सै सम ( Dr Sunosm ) कहते हैं, कि कार्योंलिप ध्य हो जाता है। १० से १५ वपके मन्दरकारका एमिट थाइमल आयल मिश्रित करके लगानेसे इस रोगमें प्राय आरोग्य लाम करता है। स्फोट निक्लनेके बाद बहुत लाम होता है। यदि ऊपरोक्त मलहम द्वारा पत्र जव ज्वर विशेर चढ़ थाये कमर में बड़ी पोडा होने लगे। णा मालूम पड़े तो कोट कोम वा गुलाब जल मिश्रित पर अधिक उछाल नया रसनाय प्रमृति उपमर्ग उप ग्लोसिरिन लगाना चाहिये। काइ कोई प्रत्यकार भेमी स्थिम हो, तप रोग कठिन समझना प्राहिये। काफ्लु केल अपस्या कार्गेलिक एसिड लगानेकी मलाह देते पेर तथा करिवोन प्रकारका रोग सामातिा होता है। है। किंतु हाफ्टर मार्सन (Dr Marsan ) कहते हैं, चिकित्सा। कि मवाद निकलने पर गोटियोंके ऊपर कोल्ड कोम् या निम्नलिखित प्रणाली अनुमोर चमन्त रोगको ग्लासिरिन् लगानेसे यन्त्रणा तथा दाग नहीं होता। सापरी चिरित्सा की जाती है। (१) साधारण शु) | उप रसक द्वारा चमडे में उत्तेनना होने पर, उस स्थान पा, (२) गोटियाँ जिससे सुगायरूपमें बाहर निकल आये को उष्णमल द्वारा स्पक्ष रफ उसके ऊपर मैदा, मारा पच भविष्य में चमके अन्दर, वियेषतः मुखगल में दाग रोर, टापलेट पाउडर किया थैलेमाइन लगाये । न रहे। (३) ज्वरको अधिकता निवारण परना। (४) (३) उत्ताप निवारण लिये गानस्पक्ष पय मूदुविरे बलकारक औषधियों को ध्यास्था । (५) विषय विशेषको | पक तथा सुखकर शोपधियोंशीध्यवस्था करना चाहिये। चिक्मिा (६) प्रधान प्रधान उपसगों को चिकित्सा उत्तापकी अधिकता होने पर एण्टोफेलिन् दना उचित है। (७) प्रतिपेघा चिकित्सा। (४) मघाव पैदा होने के समय राइफायरफे लक्षण उप (९) पहले यस तरोगामात रोगाशे उत्तप्तमें स्थित होने पर एमोनिया तथा धार्फ प्रति उत्तेजक रखा जाता था, किंतु अप लोग ऐमा नहा करत । माज ओपधिका प्रयोग करता चाहिये। पाण्डा तथा प्रय ग्लक द्वारा मतानुसार रोगाको हयावार घर हो पथ्य दिया जा सकता है। गलेकी येदना निवारणार्थ