पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/७१९

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५४४ वसन्तरोग रोगीको कुल्ली करानी चाहिये । रक्तस्त्रावके लिये एमिन् कारण यह है, कि टोका ले लेने पर यसतरोग होने पर गलिक, नापीन तेल नथा आर्गट देना लामकर है। भी अधिक हानिकारी नहीं होना । वमनरोगको मवाद- यनिद्रा तथा प्रलापके लक्षण प्रगट होने पर कोई कोई पूर्ण अवस्था में निम्न ओषधियों का प्रयोग करना उचित है अफीम अथवा मर्फिया एक दो गत देना चाहिये । किन्तु | माडी सल्फेो कार्यलस १० प्रेन । पक्रघट सिद्दानी लिकिड १५ द । फफोलेके अन्दर प्रदाह रहने पर अहिफेन किंवा मफिया एकाया आम । का व्यवहार करना ठीक नहीं। चौथाई प्रेनकी मात्राम तीन नोन घंटे पर एक पक खुगक । वेलेडोना देनेसे कभी कभी उपकार होते देखा जाता है। देशीटीका ( Inoculation ) (५) विशेष चिक्त्सिाके मध्य साल्को कावॉलेटस, इसमें यसतके वीज द्वारा टीका देनी होती है । टीका कावॉलिक एसिड, हाइपोक्लोराइटस तथा साल्फ्युरस देनेके दूसरे दिन छिन्नाधान किचित् लालबर्ण दिखाई एसिड प्रभृति एन्टोसेप्टिक मोपधियोंके प्रयोग करने- पडता है। चौधे वा पाचवें दिन यह स्थान प्रदाहयुक्त की विधि है। कोई कोई सैलिसिलेट व् मोडियम होता है एवं उस म्यान पर प भेसीदल उत्पन्न होता देनेकी सलाह देते हैं। है। ऊपरोक्त दिवस उसके चारो और परिभोला हो (६) उपसर्गको चिकित्सा-नेत्रमे पीड़ा होने पर आँस्त्रों जाता है। इस समय प्राथमिक ज्या उपस्थित दाना है के ऊपर सर्वदा शीतल जल किवा कारोसिव् सास्टिमेट एवं तीन चार दिनके अन्दर ही गरीरमं गोटियां निकलते लोसन (६ सौन्स जलके साथ १ ग्रेन ) तथा सिक वस्त्र देना जाती है। इसी बीच में गोटियाँ क्रमशः मवादयुक्त संलग्न परेगे । अत्यन्त जटिभाइटिस रहने पर हो जाती है। इसमें गोटियोकी संख्या प्रायः न्यून पर्व' पोलमें लिटर देना उचित है। कर्णियामें क्षत होने पर लक्षण आनान देये जाते हैं मही, किन्तु कमी कभी यह उसके ऊपर नाइट्रेट आव सिल्भार पेंसिल अथवा रोग भो सांघातिक हो उठना है। उसका लोसन लगाना चाहिये । यांग्वोंके ऊपर सर्वदा । भेग्यिोलोड ( Parnolord )-टोका देनेके बाद हरे रंगका पर्दा लगाये रखना चाहिये। खांसी होने पर वसन्तरोग होने पर उसे भेरियोलोऽह पहते हैं। इसमें कफ दूर करनेकी ओपधिका प्रयोग करना चाहिये। दूसरे व्यर के लक्षण प्रायः प्रकाशित नहीं होने । गोटियों- स्फोटक होने पर छेद न करके कार्दोलिक नेलयुक्त 'लिन्ट' की गति मृदु एवं भेमिकेल गठित होने के साथ ही शुष्क की पट्टी देनी चाहिये। पड़ जाता है। समय समय पर पटियुल होने पर भी __ (७) प्रतिषेधक-जब तक रोगी अच्छी तरह आरोग्य | शीघ्र ही सूब जाता है। शरीर मे गनोर दाग पैदा नहीं लाभ न कर लेवे, तव तक उसे कहीं जाने देना नहीं होता। किसो स्थानमें गोरी निकलने के पहले समूत्रे चाहिये। इस देशमें इस तरहको प्रथा है, कि किसी शरीरमें बड़े बडे लाल दाग दिखाई पड़ते हैं, उसे राश प्राममें वसन्तरोगके प्रादुर्भाव होने पर अथवा देशी ( Rash ) कहते है। टीका लेने पर दूसरे प्रामोंके लोग उस ग्राममें पांच नहीं | ___ अक्षरेजी टीका ( Taccination) रखते । वसन्तरोगाकान्त रोगोके आरोग्य लाभ करने बहुत दिन पहले इटला देशीय चिश्त्सिकोंने पर उसके गृहको चूनेसे पोत कर डिस इनफेक्टेन्ट पता लगाया था, कि बछडे तथा अन्यान्य पशुओंके औषध छिडक देनी चाहिये। शय्या तथा वस्त्रादिको शरीरमें भी एक प्रकारका बसन्त बहिर्गत होता धुला लेना चाहिये या जला देना चाहिये। इस रोगके है । १७४५ ई०में इड्नलैण्ड देशमे पहले पहल प्रादुर्भाव होने पर जिसको टोका नहीं हुई हो, वह टोका। इस विषयकी आलोचना हुई। १७८० ई०में डाक्टर लेथे। समुद्रके मध्य जहाजके ऊपर वसतरोगके प्रकाशित जेनर (Dr Jenner ) ने टीका देने की उपयोगिता होने पर एवं मैकसिन् लिम्फ नही रहने पर जिसको टीका सम्बन्धमें एक प्रवन्ध्र लिखा था। उन्होंने इस प्रवन्धमें न हुई हो, उसको वसंतवाज द्वारा टोका देनी चाहिये।, उपदेश दिया था, कि मनुष्यके शरीरमें गो वोज प्रवेश