पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/७२५

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


चाव जा र महादेवको भारतभूमिकी दुरवस्था फद्द सुनाई।। वरावर जिस प्रकार पूजा करते आते हैं, उसी प्रकार सह- शिव और पार्वती दोनों ही नारदकी बातोंसे विचलित मेश्वरको पूजा की, किन्तु वमने आ कर दूसरे तरी फेसे हुए। थोडी देर चिंता करनेके बाद शिवने सत्यधर्मका पूजा की। ब्राह्मण लोग इससे अपना अपमान समझ प्रचार करने के लिये नंदीको सेजा। बसब पर वड़े बिगडे, उतना ही क्यों उन्हें मारने पर भी वगुवरी नामक गांव में मादिराज नामक एक शैव | उद्यत हा गये। ऐसे समयमे जनमेश्वरने जलद गम्भीर ब्राह्मण अपनो साध्वी पत्नी मदलाम्बिकाके साथ वाम ! निनादसे सवों को कहा, -'तुम लोगोंको पूजा ध्यर्थं है, करते थे। उनकी कोई सन्तान न थी। पुत्र की कामनामे | बमवको पूजा ही ठीक पूजा है। इस घटनाले वसवका उन्होंने नन्दिनाथकी पूजा करा कर नन्दिनाथ ब्राह्मणको माहात्म्य सर्वत प्रचारित हो गया। वासना पूरी की। उसीसे ब्राह्मण पत्नी गर्भवती हुई। ____कल्याण-राजमन्त्री वलदेवकी मृत्यु होने पर विजल- ३ वर्ष वीत गरे। गर्भक भारसे ब्राह्मणीने बहुत पीडिता गजने बन्धुवाँ के परामर्शसे वसवको ही मन्त्री पर हो कर नंदनाथसे अपना कष्ट सुनाया नंदीने स्वप्न में भूपित रिया । ज्यों ही वसवने राजमन्त्री हो क्ल्याणमें ब्राह्मणीने छहा, मैं स्वयं तुम्हारे गर्भमें अवतीर्ण प्रथम प्रवेश किया, त्यों ही कल्याण-गजधानीमें मानलिक होऊगा कोई चिन्ना नहीं। कुछ ही दिनोंके पीछे ब्राह्मणीने चिह्न दिखाई पडे थे। विजलराजके यहां इनका खूब पएठसे लिङ्ग-मोमिन एक बालक प्रसव किया, जिसका | सम्मान तथा खूब चलती थी। चे राजमन्त्रोके सिवाय नाम घडावसव। प्रधान सेनापति और प्रधान कोपाध्यक्ष भी रहे। कहना थोडे ही दिनोंके अदर वसनने लिखना पढ़ना क्या, फरमाणपतिको छोड़ उनके ऊपर और कोई न रहा। सीख लिया। आठों वर्पमें उनके उपनयनका समय विन्जलराज उनके असाधारण गुण पर मुग्ध हो कर हो आया, पिता उपनयनका आयोजन करने लगे, किंतु वे अपनी कनिष्ठ भगिनी नीललोचनाको विवाह वमबसे यज्ञोपवीत लेनमें राजी न हुए। उन्होंने कहा- मैं शिव- कर दिया। चमक उन्नत चरित्न, सदाशयता और भन ह', ब्रह्मकुल नहीं चाहता। जातिभेदरूप वृक्षमूल- स्वाधीन धर्मोपदेशाने राज्यके सभी विमुग्ध थे, देश- च्छेदनमें मैं कुठार-बाप हूँ। विदेशमें उनकी कीर्ति विघोपित थी। ऐसे उन्नत- इस समय क्ल्याणपति विज्जलसे मन्त्री व ददेव भी चरित्न महापुरुषके मो बारह हजार कुकी लिङ्गायत वहां उपस्थित थे; वे वालककी अपूर्व शक्तिका आचार्य थे, वेश्याक हो घर वे लोग रहते थे। परिचय पा कर स्तम्भित दो रहे। यहां तक कि उन्होंने जब वे राजमनी थे, तव राजकीय कार्यके अलावा अपनी कन्या गंगादेवी वसवको व्याह दी। थोड़े दिनों में उनके द्वारा बहुत से अमानुषिक कार्य मी हुए थे। उन्होंने ही वसबका मत चारों ओर राष्ट्र हुआ । ब्राह्मणोंने गेहूं वजनके वटवरेको लिङ्गरूपमें और ज्वारके वस्ते- निग्रह शुरू किया जिससे उन्हें अपनी जन्मभूमि त्याग को मुक्तामें परिणत किया । पालीका दूध निकाल कर करनी पड़ी। वे कप्पडी गांवमें आ कर वस गये। उन्होंने शिष्योंको पिलाया, चित्रग्ने कटहल निकाला, का प्रसिद्ध सङ्गमेश्वरका मन्दिर था। सङ्गमेश्वरका | राजमभामे बैठ कर दो कोस पर गोपालनाझी कातर- प्रत्यादेश हुआ, " तुम्हें शैवधर्म प्रचार करना होगा। वाणी मुनी थी और उसका उद्धार किया था। अनमोकी मेरे ही समान समझना, हजार दाप करने पर विजलराजन जव एक दिन सुन पाया, कि मंत्री उन भी उमसे द्वेप न करना। पर-धन या पर-स्त्री पर का खजाना खाली कर जमको रुपये वांटते हैं, नव वे या न गड़ाना, सदा सत्य बोलना एवं सत्यका पालन वसव पर बड़े विगडे एन उन्हें बुला कर कहा,-'तुमने श्रना। अपने मनमे क्या सोच रखा है कि तुम्हारी जो इच्छा होगी प्पड़ी गांवमे उत्सव मनाया गया। इस उत्सव, उही कागे । मैं ऐसा आदमी नहीं चाहता।' वसवने हेस नन्द्रीमूनिकी भी पूजा करने की व्यवस्था थी, ब्राह्मणोंने कर उत्तर दिया, 'जब तक मेरे पास कामधेनु और कलर-