पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/७२९

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५४ वसाकेतु-वसिष्ट । है। बेल और घोडे की चरबीसे वकर, हरिण आदि शरीरका सत निकलता है और रोगी बहुत क्षीण हो कोमल पशुओंकी चरबी मुलायम होती है और थोडे जाता है। नापन गल जाती है। ७२ से १२ डिग्री तापसे समी वसामेहिन् ( स० वि० ) बमामेहविशिष्ट ध्यक्ति वह जिसे चरखी गल जाती है। वसामेह रोग हुआ हो। मौतिक कार्य सम्पादन करते जाने में भी जातीय पशु घसार ( स० क्ली० ) १ इच्छा ।२ वश । ३ अभिप्राय । पक्षी आदिकी बसाका आवश्यक होता है। वसारोह (स० पु०) छत्रिका, कुकरमुत्ता, बुमी । ___मनुष्य, नाना जातिले पक्षी तथा जलचर मत्स्य- सावि (स. स्त्री०) वमुसमूह । “वसाव्यामिन्द्र धारय" नक्रादिके शरीरमे विभिन्न प्रकारको वसा उत्पन्न होती (मृक् १०१७३18) 'वसाव्यां बमुसमूह (मायण) है। इन सय बसायोंके गुण और स्वातन्त्र वैद्यकशास्त्र वसि (सं० पु०) वस्ने आच्छादयत्यनेन वस्यते आच्छादन- में लिये हैं। पूर्वक धियते इति वा वस आच्छादने ( घनिम्थ्यजीति । घसाकेतु (मपु०) एक प्रकारके धूमकेतु जो पश्चिममे | उण । ११३६) इति । वमन, वस्त्र । उदय होते है और जिनको पृछा विस्तार उत्तर की ओर यसिक (सलि०) शून्य । वशिक दखा। होता है। ये देखनमें स्निग्ध जान पड़ते हैं और इनके सितव्य (म०नि०) परिधानयोग्य, पहनने के काबिल ।। उदयसे सुभिक्ष होता है । ( ऋ० स० ११।२६) वसितृ (म० वि०) आच्छादयितृ, वस्त्रसे ढकनेवाला।। वसाव्य (संपु० ) बसया आठ्यः प्रचुरवसाववादस्य वसिन (सपु०) वसा, मेद 1- नथात्व। गिशुमार, मुस। शुशुक देखो। चसिर (स० क्लो०) बस किरच । १ सामुद्र-लवण । २ गज- वसाढ्यक (सं० पु०) शिशुमार, मूस । ( Dolphinus | पिप्पली । (पु०) ३ लाल रगका अपामार्ग, लाल चित्रहा। Gangeticus) ४ वारिनिम्ब, जलनीम। वसाति (संग्त्री० ) १ उत्तरके एक जनपदका नाम । वसिष्ठ-एक प्रसिद्ध मन्नद्रष्यापि। ऋग्वेटके ७म (पु०)२वसाति नामक जनपदका अधिवासी। जन्मे- मगडलका अधिकांश ऋक् ही वमिष्ट रचित वा वमिष्टोंका जयके एक पुत्रका नाम। ( भारत थादिप० ) ४ इन्वाकु दृष्ट है। वसिष्टके जन्म सम्बन्धमें वृवता नामक के एक पुत्र का नाम । (हरिवंश) वैदिकप्रथमें इस प्रकार 'लिखा है- वमानिक (संपु०) वसानि नामक उत्तर जनपदका यस्थलमें उर्वशीको देन कर मित्र और वरुण ऽन अधिवासी। (वृ० स० १४१२५) दोनों आदित्योंका रेनासानलिन हुआ। वह रेत वस- बसानीय (म त्रि०) बमानि जानि-सम्बन्धीय । (पु.)। तीवर नामक यनीय कुम्भमें गिरा। उसने क्षण भरमें २वमानिगा अगस्त्य और वसिष्ठ नामक दो वीर्यवान् तपस्वी ऋपि वसादनी (मन्त्री० ) पीतशिगपा, पीला शीशम | आविर्भूत हुए। वह रेत कलममे, जलमे और थलमें घसापायिन् (स० पु०) वसां पिवतीनि पाणिनि । कुष्कुर, गिरा था। 'ऋषिसत्तम वसिष्टमुनि स्थलसे, अगस्त्य कुत्ता । कुम्भसे और महाघ ति मत्स्य जलसे उत्पन्न हुए थे। चसापावन (सं० पु० ) पर प्रकारके वैदिक देवना, पशु- जलके ढाल लिये जाने पर वसिष्ठ पुष्कर में ( जलमें) थे, भाजा। (शुतपशु० ६१६) उस समय देवताओंने सभी दिशाओंसे उम जलमै उनको वसामय ( स ०नि० ) वसा स्वरूप मयट् । वतास्वरुप धारण किया था। ऋ संहितामें वसिष्टमी उत्पत्तिके चसामर (मपु० ) पक जनपदका नाम । सम्बधमें इस प्रकार लिना है- "वसामेह (सपु० ) एक प्रकारका मेहरोग जिसमें मूत्र- हे वसिष्ट ! तुम मित्र और वरुणके पुत्र हो। हे के साथ चर्रवी मिल र निकलती है । आधुनिक डाकृरी ब्रह्मन् ! उर्वशीके मनसे तुम उत्पन्न हुए हो। जव चिकित्मामे यह वहुमूत्रका भेद है। इसमें मूल के साथ (मित्र और वरुणका ) रेतास्पलन हुआ था, उस समय